संपादकीय@Advocate Haresh Panwar
गलतियां: जीवन की अनिवार्य पाठशाला और मन के भ्रमों से मुक्ति का मार्ग
मनुष्य होने का अर्थ है—सोचना, समझना, निर्णय लेना और कभी-कभी उन निर्णयों में चूक जाना। इसलिए गलतियां सिर्फ एक घटना नहीं, बल्कि मानव जीवन की निरंतर चलने वाली प्रक्रिया हैं। कोई भी व्यक्ति, चाहे वह कितना ही बुद्धिमान, अनुभवी या शिक्षित क्यों न हो, गलती करने से मुक्त नहीं हो सकता। दरअसल, गलतियां हमारी परिपक्वता का आधार बनती हैं, हमारे निर्णयों को सुधारती हैं और हमारे जीवन को दिशा देती हैं। लेकिन समस्या तब पैदा होती है जब गलतियां हमारे मन में भ्रम, आत्मग्लानी और अनिश्चितता पैदा कर देती हैं। यही वह मोड़ है जहां व्यक्ति को समझदारी, धैर्य और आत्मविश्लेषण की सबसे अधिक आवश्यकता होती है। यह हमें बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।
जीवन में हम दो तरह की गलतियां करते हैं—अनजाने में होने वाली और जानबूझकर की जाने वाली। अनजाने में हुई गलती इंसानियत का हिस्सा है, लेकिन जानबूझकर की गई गलती, गलती नहीं बल्कि चरित्र का दोष और सोच की कमजोरी कहलाती है। अनजानी गलती में सुधार की गुंजाइश होती है, परंतु योजनाबद्ध गलती व्यक्ति के संकल्प और मूल्य प्रणाली पर प्रश्नचिह्न लगाती है। इसलिए हमें पहले खुद से यह ईमानदार स्वीकार करना चाहिए कि गलती कब भूल थी और कब वह एक गलत इरादे का परिणाम।
गलतियों से उत्पन्न सबसे बड़ी समस्या यह है कि वे मनुष्य के दिमाग को भ्रम में डाल देती हैं। एक छोटी सी गलती भी हमारे भीतर संदेह, भय और मानसिक तनाव पैदा कर देती है। इसे मनोविज्ञान में संज्ञानात्मक विसंगति कहा जाता है—जहाँ हमारे निर्णय, हमारे मूल्य और हमारी वास्तविकता आपस में टकराने लगते हैं। कोई भी गलती व्यक्ति को दो राहों पर खड़ा कर देती है—या तो वह खुद को दोष देकर निराशा में डूब जाए, या फिर वह गलती को स्वीकार कर उसे सुधारने की प्रक्रिया शुरू कर दे। पहला रास्ता व्यक्ति को अंधेरे में धकेल देता है, जबकि दूसरा रास्ता उसे मजबूत बनाता है, परिपक्व करता है और जीवन के लिए अधिक योग्य बनाता है।
समस्या यह नहीं कि हमसे गलती हो गई। समस्या तब पैदा होती है जब हम अपनी गलती को मानने से इनकार करते हैं। इंसान की सबसे बड़ी दुर्बलता यही है कि वह अपने सही होने के भ्रम में जीना चाहता है। लेकिन इतिहास में वही लोग महान हुए हैं जिन्होंने स्वीकार किया कि वे गलत थे और सीखने के लिए स्वयं को तैयार किया। गलती स्वीकार करना कमजोरी नहीं, बल्कि साहस की चरम अभिव्यक्ति है। यह आत्मविश्वास का संकेत है कि इंसान अपने आप को बेहतर बनाना चाहता है।
गलतियों को सुधारने की कला भी उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी गलती न करने की इच्छा। गलती हो जाने पर उलझन, गुस्सा या हड़बड़ी में लिए गए निर्णय परिस्थिति को और खराब कर देते हैं। अक्सर देखा गया है कि व्यक्ति अपनी गलती पर पर्दा डालने के लिए और बड़ी गलती कर बैठता है। यही वह मनोवैज्ञानिक भ्रम है जो इंसान को वास्तविक दोष से कहीं अधिक नुकसान पहुंचाता है। इसलिए गलती होते ही पहला कदम शांत मन से स्वीकार करना, दूसरा कदम नुकसान को कम करना और तीसरा कदम उसे दोबारा न दोहराने की रणनीति बनाना होना चाहिए।
गलतियाँ हमें विनम्र बनाती हैं। वे हमारे अहंकार को तोड़ती हैं और जीवन का वास्तविक स्वरूप दिखाती हैं। दूसरों की गलतियों को सहन करना और अपनी गलतियों को सुधारना—यही परिपक्व समाज की नींव है। लेकिन आज के समय में लोग दूसरों की भूलों को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाते हैं और अपनी भूलों को मामूली बताने की कोशिश करते हैं। यह दृष्टिकोण समाज में अविश्वास और नफरत को बढ़ावा देता है। जीवन में यदि हम सीखने की मानसिकता अपनाएं तो गलतियाँ हमारे विरोधी नहीं, हमारे शिक्षक बन जाती हैं।
गलतियों से बचने का सबसे अच्छा तरीका है—धीरे सोचना, स्पष्ट सोचना और अपने निर्णयों की जिम्मेदारी खुद लेना। किसी भी कार्य को करने से पहले उसका परिणाम समझना, उसके फायदे-नुकसान का आकलन करना हमें बड़ी भूलों से बचा सकता है। लेकिन इसके बावजूद यदि कहीं चूक हो जाती है, तो यह याद रखना चाहिए कि गलती व्यक्ति को कमजोर नहीं बनाती, बल्कि सही ढंग से संभालने पर उसे और अधिक बुद्धिमान, विवेकशील और अनुभवी बना देती है।
अंततः, जीवन की यात्रा में गलतियाँ ठोकर नहीं, सीढ़ियाँ हैं। वे हमें आगे बढ़ना सिखाती हैं, सोच को परिष्कृत करती हैं और मनुष्य के चरित्र को कसौटी पर कसती हैं। गलतियों से घबराएं नहीं, बल्कि उन्हें समझें, उनसे सीखें और आगे बढ़ने के लिए उन्हें अपना मार्गदर्शक बनाएं। क्योंकि सही मायनों में गलतियों को सुधारना ही मनुष्य की सबसे बड़ी उपलब्धि है और यही उसे भविष्य की स्पष्ट राह दिखाती है।
भीम प्रज्ञा अलर्ट
“सोच ऊँची हो तो रास्ते अपने-आप बन जाते हैं,
वरना मंज़िलें भी उन्हीं को ठुकरा देती हैं जो बहाने बनाते रहते हैं।”
