संपादकीय @Advocate Haresh Panwar
मन का रंग और जीवन का प्रकाश : भीतर की शांति ही बाहर की दुनिया को सुंदर बनाती है
मनुष्य का जीवन बाहर से जितना सरल दिखाई देता है, भीतर से उतना ही जटिल और अदृश्य संघर्षों से भरा होता है। दुनिया की भीड़ में चलते-फिरते लोग हमें सामान्य, सहज और व्यवस्थित दिखते हैं, लेकिन उनके मनों में चल रहे तूफान, बेचैनियाँ और संवेदनाएँ किसी को नहीं दिखतीं। मनुष्य का मन एक अदृश्य कैनवस है—जिस पर हर दिन अनगिनत रंग चढ़ते रहते हैं। ये रंग हमारे विचारों, भावनाओं और अनुभवों से बनते हैं। चाहे हम स्वीकारें या नहीं, अंततः मन उसी रंग का रूप ले लेता है, जिसके संपर्क में वह सबसे अधिक रहता है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।
यदि प्रेम का रंग मन को छू ले, तो वह कोमल, दयामय और संवेदनशील बन जाता है।
लेकिन यदि क्रोध का रंग मन को घेर ले, तो वही मन उग्र, बेचैन और अस्थिर हो उठता है।
सवाल यह नहीं कि दुनिया कैसी है—सवाल यह है हमारा मन दुनिया की किन घटनाओं को किस रंग से रंग रहा है।
मन—हमारी दुनिया को रंगने वाली अदृश्य कूची है। सुबह का एक विचार, किसी का एक व्यवहार, किसी घटना की एक छोटी-सी व्याख्या… इतना ही काफी है मन को नए रंग से रंगने के लिए।लेकिन समस्या तब शुरू होती है जब मन नकारात्मकता की मोटी परतों से ढक जाता है
कभी ईर्ष्या की,कभी क्रोध की, कभी पीड़ा की,कभी तुलना की।
इन परतों के नीचे हमारा असली स्वभाव—निर्मल, शांत और आनंदमय—धीरे-धीरे दब जाता है। मन का असली स्वरूप स्थिर झील की तरह शांत होता है, लेकिन जब उस पर भावनाओं के तूफान उठते हैं, तो वह मथने लगता है।और यही अशांत मन हमारी सबसे बड़ी परीक्षा लेता है।
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स्वस्थ मन बनाम अस्वस्थ मन : एक अदृश्य संघर्ष होता है। कभी आपने ध्यान दिया है?
थोड़ी-सी आलोचना भी अस्वस्थ मन को घायल कर देती है,
जबकि स्वस्थ मन उसी आलोचना में सुधार का अवसर खोज लेता है।
अस्वस्थ मन दूसरों की खुशियों से चिढ़ता है, स्वस्थ मन उनसे प्रेरणा लेता है। अस्वस्थ मन छोटी घटना को बड़ा बना देता है,
स्वस्थ मन बड़ी घटना को भी गरिमा से संभाल लेता है।
मन के भीतर यह अंतर कोई संयोग नहीं—यह उस रंग का परिणाम है जिसे हम रोज़ अपने भीतर भर रहे हैं।क्रोध के रंग से रंगा मन एक तलवार की तरह चलता है, जबकि करुणा के रंग से रंगा मन एक दीपक की तरह जगमगाता है।
अशांत मन : जीवन के हर पहलू को निगलता हुआ विष होता है।एक अशांत मन केवल अपने मालिक को ही नहीं तंग करता—
वह परिवार को भी थका देता है,
रिश्तों को तोड़ देता है,
चिंताओं को बढ़ा देता है,
और जीवन को अनावश्यक बोझ में बदल देता है।
यह मानसिक विष भीतर से शुरू होता है लेकिन पूरे जीवन में फैल जाता है— व्यवहार बिगड़ता है, आराम छिन जाता है, नींद टूट जाती है,निर्णय गलत होने लगते हैं,और व्यक्ति धीरे-धीरे अपने ही विचारों का कैदी बन जाता है।
कहने को हम बाहर दोष खोजते हैं—परिवार, परिस्थितियाँ, लोग, समय, समाज…लेकिन सच्चाई यह है कि मन की बेचैनी का वास्तविक कारखाना भीतर ही सक्रिय होता है।
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आनंद का रहस्य : उसे बाहर मत खोजिए, वह भीतर बैठा है
आज की दुनिया में हर व्यक्ति आनंद की तलाश में है—कोई सफलता में, कोई वस्तुओं में,
कोई प्रशंसा में,कोई मान-सम्मान में। लेकिन आनंद बाहर से नहीं आता।अगर ऐसा होता, तो सम्पन्न लोग सबसे अधिक शांत होते और साधारण लोग सबसे अधिक बेचैन।वास्तविक अनुभव ठीक उल्टा है।
आनंद एक भीतरी परिस्थिति है।
जिसने मन को साध लिया, उसने आनंद को पा लिया।
जिसने मन को खो दिया, उसका आनंद बाहर खोजते-खोजते जीवन बीत जाता है।
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अपने भीतर झाँकना—मन की शांति का पहला कदम है जीवन में पहली और सबसे महत्वपूर्ण साधना है—स्वयं को देखना।
बिना निर्णय के, बिना आलोचना के, बिना डर के—
बस अपने विचारों की दिशा को समझना।
अपने मन से पूछना—मैं किस रंग से रंग रहा हूँ अपने भीतर की दीवारों को?क्या ये रंग मेरे जीवन को हल्का बनाते हैं या और भारी?क्या ये विचार मुझे ऊपर उठाते हैं या गिरा देते हैं?
क्या यह भावना मेरे मन को विस्तृत करती है या सीमित?
यह साधना रातोंरात नहीं होती।
लेकिन जैसे-जैसे व्यक्ति अपने भीतर देखने लगता है,
मन का तूफान धीरे-धीरे शांत होने लगता है।
और जिस दिन मन शांत हो गया—
उस दिन जीवन अपने आप सुंदर हो जाता है। विचारों का चयन—मन को रंगने की कला
हम अक्सर सोचते हैं कि विचार अंदर स्वयं ही आ जाते हैं।
लेकिन सच्चाई यह है कि हम विचारों को आमंत्रित करते हैं,
चाहे अनजाने में ही सही।
हमारे सामने हर क्षण विकल्प होते हैं—रंजिश चुनें या क्षमा, क्रोध चुनें या धैर्य,ईर्ष्या चुनें या प्रेरणा,डर चुनें या विश्वास।
ये चयन ही मन की रंगत तय करते हैं और मन की रंगत ही जीवन का परिणाम तय करती है।
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मन शांत होगा तो जीवन स्वयं खिल उठेगा, जीवन का सौंदर्य बाहर नहीं, भीतर है।बाहर की दुनिया केवल एक दर्पण है—जो हमें वही दिखाती है, जो हमारे भीतर है। यदि मन शांत है—
तो कठिन रास्ते भी सरल लगते हैं।यदि मन अशांत है—
तो सरल रास्ते भी कठिन लगते हैं।इसलिए सबसे बड़ी साधना है—
अपने मन को सही रंग देना।
प्रेम, करुणा, धैर्य और जागरूकता—ये वे रंग हैं जो जीवन को अर्थपूर्ण, सुंदर और प्रकाशमय बनाते हैं।
जब मन शांत हो जाता है,
तब जीवन अपने आप सुंदर हो जाता है—किसी प्रयास से नहीं,
किसी संघर्ष से नहीं,
बस भीतर के प्रकाश से।
भीम प्रज्ञा अलर्ट
“दुनिया बदलने की शुरुआत हमेशा बाहर से नहीं होती—पहले अपने भीतर रोशनी जलानी पड़ती है। जब भीतर का अंधेरा मिटता है, तभी बाहर का मार्ग साफ दिखाई देता है।”
