भीम प्रज्ञा न्यूज़ . नारनौल।
साहित्य के क्षेत्र में कुछ क्षण ऐसे आते हैं जो केवल औपचारिक आयोजन नहीं होते, बल्कि वे विचार, संवेदना और सामाजिक चेतना के उत्सव बन जाते हैं। साहित्यकार एवं प्रगतिशील चिंतक डॉ. शिवताज सिंह ‘ताज’ की नवीन कृति “शब्द यथार्थ” (दोहा संग्रह) का लोकार्पण ऐसा ही एक अवसर रहा, जिसमें सहभागी होना मेरे लिए व्यक्तिगत रूप से ही नहीं, बल्कि दैनिक भीम प्रज्ञा के प्रतिनिधि के रूप में भी एक गौरवपूर्ण क्षण है। यह केवल एक पुस्तक का विमोचन नहीं था, बल्कि उस साहित्यिक परंपरा का सार्वजनिक सम्मान था, जो सत्य, साहस और सामाजिक उत्तरदायित्व को अपनी आत्मा मानती है।
पुस्तक का आवरण देखते ही पाठक के मन में आकर्षण और उत्सुकता का संचार होता है। ‘शब्द यथार्थ’ जैसा सशक्त शीर्षक अपने आप में यह संकेत देता है कि यह कृति सजावटी शब्दों का नहीं, बल्कि जीवन और समाज के कठोर यथार्थ का सामना कराने वाली है। यही विशेषता डॉ. शिवताज सिंह ‘ताज’ की समूची साहित्यिक यात्रा की पहचान रही है—स्पष्टवादिता, निर्भीकता और वैचारिक ईमानदारी।
मेरे लिए यह अनुभव और भी आत्मीय है क्योंकि इससे पूर्व उनकी कृति “बहरे पाषाण” के विमोचन अवसर पर भी अपने विचार प्रस्तुत करने का अवसर मिला था। उस काव्य संग्रह ने जिस प्रकार सामाजिक आवरण, श्रम की गरिमा और अंधविश्वास के विरुद्ध चेतना को स्वर दिया था, उसने हमारी साहित्यिक मित्रता को और अधिक वैचारिक मजबूती प्रदान की। ‘शब्द यथार्थ’ उसी यात्रा का अगला, अधिक परिपक्व और तीक्ष्ण पड़ाव है।
जैसे ही यह पुस्तक हाथ में आई, दैनिक कार्यों और यात्रा की थकान के बावजूद इसे पढ़ने की उत्कंठा स्वतः जाग उठी। आवरण पृष्ठ खोलते ही प्रगतिशील साहित्य चिंतक कविवर सुंदरलाल ‘उत्सुक’ की काव्य पंक्तियाँ पाठक को भीतर तक प्रवेश का निमंत्रण देती हैं—
“श्री ‘ताज’ की लेखनी जब भी लिखती छंद,
धूर्त जन की बोलती कर देती है बंद।”
यह मात्र प्रशंसा नहीं, बल्कि डॉ. ‘ताज’ की लेखनी का सटीक मूल्यांकन है। वे कविता को सत्ता, स्वार्थ और चाटुकारिता के विरुद्ध एक नैतिक हथियार के रूप में प्रयोग करते हैं। आज के तथाकथित “चमचा युग” में, जहाँ ‘यस सर’ की संस्कृति ने विवेक और स्वाभिमान को गिरवी रख दिया है, वहाँ डॉ. शिवताज सिंह की रचनाएँ साहस का पाठ पढ़ाती हैं। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं कि ऐसे समय में सच कहना स्वयं में एक क्रांतिकारी कर्म बन चुका है।
पुस्तक के प्राक्कथन मेंयं साहित्यकार एवं चिंतक तारा राम साहब ने ‘शब्द यथार्थ’ की जिस मार्मिक व्याख्या की है, वह पाठक को केवल दोहों तक सीमित नहीं रखती, बल्कि उनके पीछे छिपी वैचारिक ऊर्जा से परिचित कराती है। वहीं शिक्षाविद डॉ. सुमेर सिंह यादव द्वारा लिखा गया अग्रलेख “रचना और रचनाकार के तेवर” डॉ. ‘ताज’ की जीवंतता, संघर्षशीलता और वैचारिक दृढ़ता का प्रमाण प्रस्तुत करता है।
डॉ. शिवताज सिंह ने आत्मकथ्य में स्पष्ट किया है कि उन्होंने दोहा छंद की परंपरा को केवल संरक्षित नहीं किया, बल्कि उसे नए सामाजिक संदर्भों में पुनर्परिभाषित किया है। दोहा—जो दिखने में छोटा होता है, पर अर्थ में गहन—उनकी लेखनी में उसी प्रकार प्रभावी है, जैसे बिहारी के दोहे—
“देखन में छोटे लगें, घाव करें गंभीर।”
डॉ. ‘ताज’ की विशेषता यह है कि वे दोहे की शास्त्रीय कठोरता को तोड़कर उसे लोकबोध और समकालीन भाषा से जोड़ते हैं। इससे दोहा अभिजात वर्ग तक सीमित न रहकर आम पाठक की चेतना का हिस्सा बन जाता है। यह कहा जा सकता है कि इस कृति में दोहे की एक नई, समकालीन धारा प्रवाहित हो रही है।
पुस्तक की विषय-वस्तु इसका सबसे सशक्त पक्ष है। साहित्य, कर्मवीरता, पारिवारिक संबंध, बेटी का सम्मान, शिक्षा, सत्य, कबीर, फुले, बाबा साहब आंबेडकर, न्याय, मीडिया, प्रकृति, पूंजीवाद, संविधान, लोकतंत्र, धर्म और अंधविश्वास, जाति, ईर्ष्या, दुर्जन—लगभग बीस विषयों में विभक्त यह संग्रह सामाजिक सूक्ष्मताओं से लेकर राष्ट्रीय विसंगतियों तक पर सटीक प्रहार करता है। यह केवल आलोचना नहीं, बल्कि समाज को आत्मावलोकन के लिए प्रेरित करने वाली रचनात्मक चेतावनी है।
कुछ दोहे मानवीय संवेदना को इस प्रकार जाग्रत करते हैं कि पाठक ठहरकर सोचने को विवश हो जाता है—
“देख पराई पीर को बहे नयन जलधार,
ऐसे करुणा-शील ही काव्य जगत आधार।”
वहीं स्वाभिमान की उद्घोषणा करते हुए कवि लिखते हैं—
“सूखी रोटी ही भली, भली फूस की छान,
स्वाभिमान धरती पर, चाहूँ ना सम्मान।”
ये पंक्तियाँ केवल कविता नहीं, बल्कि जीवन-दर्शन हैं। वे उस मूल्यबोध की पुनर्स्थापना करती हैं, जिसे आधुनिक उपभोक्तावादी संस्कृति ने हाशिए पर डाल दिया है।
सेवानिवृत्ति के बाद जिस ऊर्जा, प्रतिबद्धता और निरंतरता से डॉ. शिवताज सिंह ‘ताज’ साहित्य सृजन में संलग्न हैं, वह स्वयं में एक उदाहरण है। यह सिद्ध करता है कि सृजन की कोई उम्र नहीं होती; विचार और संवेदना जीवित हों, तो लेखनी निरंतर चलती रहती है। उन्होंने अपने काव्य के माध्यम से समाज को न केवल आईना दिखाया है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए वैचारिक धरोहर भी सौंपी है।
निष्कर्षतः, “शब्द यथार्थ” केवल एक दोहा संग्रह नहीं, बल्कि समय, समाज और सत्ता के बीच खड़े होकर सत्य कहने का साहसिक दस्तावेज है। यह पुस्तक पाठक को मनोरंजन नहीं, बल्कि मनन के लिए आमंत्रित करती है। ऐसी कृतियाँ ही साहित्य को जीवित रखती हैं और समाज को दिशा देती हैं। दैनिक भीम प्रज्ञा के माध्यम से इस कृति की समीक्षा प्रस्तुत करते हुए यह विश्वास दृढ़ होता है कि डॉ. शिवताज सिंह ‘ताज’ की यह रचना आने वाले समय में समकालीन हिंदी साहित्य की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि के रूप में दर्ज होगी।
