संपादकीय @ Advocate Haresh Panwar
“सच्ची महानता शक्ति में नहीं, चरित्र में होती है”
बदला पल भर की आग है, जबकि क्षमा जीवन भर की शांति।
मानव जीवन में शक्ति, संपत्ति और पद—ये सभी चीज़ें महत्वपूर्ण मानी जाती हैं। लेकिन वास्तव में किसी मनुष्य की महानता का पैमाना इन बाहरी साधनों से नहीं, बल्कि उसके आंतरिक गुणों से तय होता है। इतिहास और समाज दोनों इस सत्य के साक्षी हैं कि जिन लोगों ने अपनी सामर्थ्य के बावजूद उदारता दिखाई, जिन्होंने गरीबी में भी दान का मार्ग चुना—वही लोग मानवता के असली प्रकाश पुंज माने जाते हैं। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।
आज हम ऐसे ही दो मूल्यों पर विचार करते हैं—क्षमा और दान—जो किसी भी व्यक्ति के चरित्र की सबसे ऊंची अवस्था माने गए हैं।
बलशाली होकर किसी को क्षमा करना साधारण बात नहीं। यह वही कर सकता है जो अपने मन, भावनाओं और अहंकार पर पूर्ण नियंत्रण रखता है। अधिकतर लोग शक्ति मिलने पर प्रतिशोध को अपना अधिकार मान लेते हैं, लेकिन जो व्यक्ति अपने अधिकार का प्रयोग न करते हुए क्षमा का मार्ग चुनता है, वही सच्चे अर्थों में महान होता है।
क्षमा कमजोरी नहीं, बल्कि सबसे बड़ा साहस है।
एक शक्तिशाली व्यक्ति जब क्षमा करता है, तो वह अपने व्यक्तित्व की उच्चता का प्रमाण देता है। वह बताता है कि उसकी शक्ति केवल बाहरी नहीं, बल्कि भीतरी भी है। बदला लेना आसान है, लेकिन क्षमा करना कठिन। बदला पल भर की आग है, जबकि क्षमा जीवन भर की शांति।
जब शक्तिशाली व्यक्ति प्रतिशोध की बजाय करुणा चुनता है, तो वह दूसरों के दिलों में नहीं, बल्कि उनकी आत्मा में स्थान बना लेता है। ऐसे लोग समाज में सम्मान का स्रोत बनते हैं और आने वाली पीढ़ियों के लिए आदर्श स्थापित करते हैं।
इसी प्रकार, गरीब होकर दान करना मानवता का सर्वोच्च उदाहरण है। समाज में अक्सर यह भ्रम होता है कि दान केवल धनवानों का कार्य है, लेकिन सच्चाई यह है कि दान का संबंध जेब की मोटाई से नहीं, बल्कि हृदय की उदारता से है।
एक धनी व्यक्ति के लिए दान कभी-कभी उसकी समृद्धि का एक छोटा-सा अंश होता है। लेकिन जब एक गरीब व्यक्ति अपनी सीमित कमाई में से कुछ हिस्सा किसी जरूरतमंद को देता है, तो वह त्याग की ऐसी मिसाल पेश करता है, जिसकी तुलना संभव नहीं।
गरीब का दान केवल वस्तु नहीं होता, वह त्याग, संवेदना और मानवता का अमूल्य उपहार होता है। इसे केवल दिया नहीं जाता, बल्कि हृदय से उतारा जाता है। यही कारण है कि ऐसे दान को धर्म, समाज और मानवता—तीनों में सर्वोच्च स्थान प्राप्त है।
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क्षमा और दान—दोनों ही ऐसे गुण हैं, जो मनुष्य का वास्तविक मूल्य बढ़ाते हैं। ये गुण बताते हैं कि महानता बाहरी परिस्थितियों से नहीं आती—न शक्ति से, न संपत्ति से, न पद से; बल्कि चरित्र से आती है।
जिस व्यक्ति के भीतर सहनशीलता, करुणा, त्याग और आत्म-नियंत्रण जैसे भाव होते हैं, वह सामाजिक और आध्यात्मिक दोनों ही स्तरों पर उच्च माना जाता है। क्षमा करने वाला मन को शांत करता है, और दान करने वाला समाज के दुखों को कम करता है।
आज मानवता इन्हीं दोनों गुणों की सर्वाधिक आवश्यकता है। समाज को ऐसे लोगों की जरूरत है, जो प्रतिशोध नहीं, प्रेम दें; जो संपत्ति नहीं, संवेदना बांटें; जो शक्तिशाली होकर भी विनम्र रहें और अभावग्रस्त होकर भी उदार।
भीम प्रज्ञा अलर्ट
“मनुष्य की सबसे बड़ी जीत तब होती है, जब वह दूसरों पर नहीं, अपने क्रोध, अहंकार और कमजोरियों पर विजय पा लेता है।”
