Chief Editor Adovcate Haresh Panwar
*अरावली पर आरी, भविष्य पर वार* :
*जब जल-जंगल-जमीन की कीमत सत्ता और स्वार्थ तय करने लगें*
जल, जंगल और ज़मीन—ये तीन शब्द मात्र पर्यावरण के नहीं, बल्कि मानव सभ्यता के अस्तित्व के आधार हैं। इतिहास गवाह है कि जब-जब मानव ने प्रकृति को अपने स्वार्थ की बलि चढ़ाया है, तब-तब प्रकृति ने भी अपने तरीके से हिसाब चुकाया है। आज अरावली पर्वत श्रृंखला के संदर्भ में उठ रहा जनआक्रोश इसी ऐतिहासिक चेतावनी की पुनरावृत्ति है। यह केवल पहाड़ों का सवाल नहीं है, यह आने वाली पीढ़ियों के अधिकार, जलवायु संतुलन और सामाजिक उत्तरदायित्व का प्रश्न है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।
अरावली पर्वत श्रृंखला, जिसे विश्व की प्राचीनतम पर्वतमालाओं में गिना जाता है, केवल पत्थरों और खनिजों का ढेर नहीं है। यह राजस्थान, हरियाणा, दिल्ली और गुजरात के पर्यावरणीय संतुलन की रीढ़ है। यही पर्वतमाला मरुस्थलीकरण को रोकती है, भूजल रिचार्ज करती है, जैव विविधता को संजोती है और मौसम को संतुलित रखती है। राजस्थान के रेगिस्तानी भूभाग को मानसून की सौगात दिलाने में अरावली की भूमिका को नकारा नहीं जा सकता। यही कारण है कि वर्षों तक इसके संरक्षण के लिए कड़े कानून बनाए गए और खनन पर सख्त प्रतिबंध लगाया गया।
लेकिन हाल ही में माननीय न्यायालय की गाइडलाइन के तहत 100 मीटर तक की पहाड़ियों को अरावली का हिस्सा न मानने की जो व्याख्या सामने आई है, उसने एक नए विवाद को जन्म दे दिया है। पर्यावरण प्रेमियों का मानना है कि इस ढिलाई का सीधा लाभ खनन माफिया और व्यापारिक हितों को मिलेगा, जबकि नुकसान समाज, प्रकृति और भविष्य को उठाना पड़ेगा। यही कारण है कि इस निर्णय के खिलाफ जन आंदोलन खड़ा हो गया है और सड़क से लेकर संसद तक विरोध की आवाज़ गूंज रही है।
यह विडंबना ही कही जाएगी कि जिस राजस्थान की सांस्कृतिक और प्राकृतिक पहचान अरावली से जुड़ी है, उसी राज्य से जुड़े केंद्रीय पर्यावरण मंत्री की भूमिका पर सवाल खड़े हो रहे हैं। अजमेर में जन्मे, राजस्थान से राज्यसभा और फिर अलवर लोकसभा से संसद पहुंचे केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव के नाम के साथ जब अरावली को लेकर यह फैसला जुड़ता है, तो पीड़ा और गहरी हो जाती है। जनता यह सवाल पूछ रही है कि क्या सत्ता में पहुंचने के बाद अपनी धरती, अपनी विरासत और अपने लोगों के प्रति जिम्मेदारी बदल जाती है?
पर्यावरणीय आंदोलनों का इतिहास बताता है कि कानून जब कमजोर होते हैं, तब विनाश तेज होता है। आज व्यापारी वर्ग और खनन माफिया जहां इस ढिलाई को विकास का अवसर बता रहे हैं, वहीं पर्यावरण योद्धा इसे विनाश का न्योता मान रहे हैं। बड़ी-बड़ी मशीनों से पहाड़ों को काटना, धरती का सीना चीरना और कुछ वर्षों के मुनाफे के लिए सदियों पुरानी प्राकृतिक विरासत को खत्म कर देना—क्या यही विकास है? अगर विकास का अर्थ केवल खनिज संपदा का दोहन है, तो फिर जल संकट, बढ़ता तापमान, अनियमित मानसून और पर्यावरणीय आपदाओं की कीमत कौन चुकाएगा?
सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि जब आने वाली पीढ़ियां हमसे हिसाब मांगेंगी, तब हम क्या जवाब देंगे? क्या हम उन्हें गहरे गड्ढे, उजाड़ पहाड़ और वीरान जमीन सौंपेंगे? क्या हम कहेंगे कि हमने कुछ उद्योगपतियों और माफियाओं के मुनाफे के लिए उनकी जलवायु सुरक्षा दांव पर लगा दी? यह केवल भावनात्मक प्रश्न नहीं हैं, यह नैतिक और सामाजिक उत्तरदायित्व के प्रश्न हैं।
पर्यावरण संरक्षण केवल आंदोलनकारियों या कुछ संगठनों की जिम्मेदारी नहीं है। यह सरकार, न्यायपालिका, समाज और मीडिया—सभी की साझा जिम्मेदारी है। जिस तरह व्यापारियों में खुशी और खनन माफिया में जश्न का माहौल है, उसी अनुपात में आम नागरिकों, किसानों, पर्यावरण प्रेमियों और बुद्धिजीवियों में चिंता और आक्रोश भी है। यह असंतुलन खुद बताता है कि कहीं न कहीं निर्णय प्रक्रिया में जनहित कमजोर पड़ा है।
शीतकालीन सत्र में इस मुद्दे को लेकर संसद में हंगामा होना और सड़कों पर आवाज़ बुलंद होना इस बात का संकेत है कि यह विषय केवल स्थानीय नहीं, बल्कि राष्ट्रीय महत्व का है। अरावली को बचाना केवल राजस्थान को बचाना नहीं, बल्कि उत्तर भारत के पर्यावरणीय भविष्य को सुरक्षित करना है। यदि आज कानूनों में ढिलाई दी गई, तो कल यह ढिलाई स्थायी विनाश में बदल सकती है।
भीम प्रज्ञा जैसे वैचारिक मंचों का दायित्व है कि वे इस संघर्ष को केवल खबर नहीं, बल्कि चेतना बनाएं। यह संपादकीय उन पर्यावरण योद्धाओं के लिए एक संदेश है कि उनकी लड़ाई अकेली नहीं है। समाज का विवेक अभी जीवित है, और जब-जब प्रकृति पर संकट आया है, तब-तब जनचेतना ने इतिहास की दिशा बदली है।
अंततः यह लड़ाई पहाड़ बनाम मशीन की नहीं, बल्कि विवेक बनाम स्वार्थ की है। अगर जल-जंगल-जमीन बचेंगे, तभी मानव सभ्यता बचेगी। अरावली को बचाना आज की जरूरत नहीं, बल्कि कल की जिम्मेदारी है। अब भी समय है कि निर्णयों की पुनर्समीक्षा हो, संरक्षण कानूनों को और सख्त किया जाए और विकास की परिभाषा को प्रकृति के साथ सामंजस्य में गढ़ा जाए। क्योंकि जब प्रकृति बचेगी, तभी भविष्य भी बचेगा।
*भीम प्रज्ञा अलर्ट*
जो आज सही के लिए खड़ा होता है, वही कल इतिहास में सम्मान के साथ याद किया जाता है; सुविधा के साथ बहने वाले केवल भीड़ बनते हैं, दिशा
