संपादकीय @Advocate Haresh Panwar
आवाज़ नहीं, विचार बोलें: शब्दों की शांति में छिपी सच्ची शक्ति
आज का युग शोर का युग बनता जा रहा है। हर ओर आवाज़ें हैं—सोशल मीडिया पर, टीवी स्टूडियो में, सड़कों पर, रिश्तों में और यहां तक कि हमारे अपने मन के भीतर भी। हर कोई अपनी बात ऊँची आवाज़ में रखना चाहता है, मानो आवाज़ की ऊँचाई से ही विचारों की सच्चाई और प्रभाव तय होता हो। लेकिन इतिहास, अनुभव और जीवन का गहरा सत्य हमें यह सिखाता है कि प्रभावशीलता आवाज़ की ऊँचाई से नहीं, बल्कि शब्दों की गहराई से आती है। जो बात शोर से नहीं समझाई जा सकती, वह अर्थपूर्ण शब्दों से सहज ही दिल तक उतर जाती है। जहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।
मानव सभ्यता के सबसे बड़े परिवर्तन किसी चीख-पुकार से नहीं, बल्कि शांत लेकिन दृढ़ शब्दों से हुए हैं। महात्मा बुद्ध की वाणी में कोई ऊँचापन नहीं था, फिर भी उनके शब्द सदियों तक मानवता का मार्गदर्शन करते रहे। महात्मा गांधी की आवाज़ भीड़ को डराने वाली नहीं थी, लेकिन उनके शब्दों ने साम्राज्य की नींव हिला दी। डॉ. भीमराव अंबेडकर के भाषणों में आक्रोश से अधिक तर्क, करुणा और न्याय की गूंज थी, जिसने एक पूरे राष्ट्र को संवैधानिक चेतना दी। यह उदाहरण स्पष्ट करते हैं कि शब्दों की शक्ति शोर से कहीं अधिक स्थायी और परिवर्तनकारी होती है।
आज के सामाजिक और व्यक्तिगत जीवन पर नज़र डालें तो पाएंगे कि अधिकतर टकराव संवाद की कमी या गलत संवाद के कारण होते हैं। परिवारों में झगड़े इसलिए नहीं बढ़ते कि समस्याएँ बहुत बड़ी हैं, बल्कि इसलिए बढ़ते हैं क्योंकि बात कहने का तरीका कठोर होता है। पति-पत्नी, माता-पिता और बच्चों, मित्रों या सहकर्मियों के बीच अक्सर आवाज़ ऊँची हो जाती है, लेकिन शब्द खोखले रह जाते हैं। जब संवाद में धैर्य, सम्मान और संवेदना का अभाव होता है, तब शोर पैदा होता है और समाधान दूर चला जाता है। इसके विपरीत, जब शब्द सोच-समझकर, स्नेह और सत्य के साथ कहे जाते हैं, तब वही कठिन परिस्थितियाँ भी सहज हो जाती हैं।
व्यक्तिगत जीवन में प्रभावी संवाद आत्म-नियंत्रण से शुरू होता है। जब व्यक्ति अपनी भावनाओं पर अधिकार रखता है, तब वह ऊँची आवाज़ की बजाय सटीक शब्दों का चयन करता है। क्रोध में कही गई बात अक्सर रिश्तों को तोड़ देती है, जबकि संयम से बोले गए शब्द टूटते रिश्तों को जोड़ सकते हैं। यही कारण है कि कहा गया है—“जो खुद पर जीत पा ले, वही दुनिया को जीत सकता है।” शब्दों की गहराई आत्म-चिंतन से आती है, और आत्म-चिंतन शांति से उपजता है, न कि शोर से।
सामाजिक स्तर पर भी यही सिद्धांत लागू होता है। आज सार्वजनिक विमर्श का स्तर गिरता जा रहा है। बहसें संवाद नहीं रहीं, बल्कि शोरगुल में बदल गई हैं। टीवी डिबेट्स में मुद्दों से अधिक आवाज़ें टकराती हैं। सोशल मीडिया पर शब्दों की जगह नारे, गालियाँ और उग्र प्रतिक्रियाएँ ले चुकी हैं। इस शोर में सच्चे मुद्दे दब जाते हैं और समाज दिशा भटकने लगता है। यदि हम सच में सामाजिक परिवर्तन चाहते हैं, तो हमें चीखने के बजाय समझाने की कला सीखनी होगी। परिवर्तन तब आता है जब लोग डर से नहीं, समझ से सहमत होते हैं।
यहाँ फसल और बारिश का रूपक अत्यंत सार्थक है। फसल बाढ़ से नहीं उगती, बल्कि संतुलित और समय पर हुई बारिश से लहलहाती है। ठीक उसी तरह समाज और रिश्ते आक्रामक शोर से नहीं, बल्कि शांत, निरंतर और सृजनात्मक संवाद से फलते-फूलते हैं। बाढ़ क्षणिक प्रभाव डालती है—सब कुछ बहा ले जाती है, लेकिन पीछे विनाश छोड़ जाती है। वहीं बारिश धीरे-धीरे धरती को सींचती है और जीवन को जन्म देती है। शब्दों की शांति भी ऐसी ही होती है—धीमी, लेकिन गहरी और स्थायी।
नेतृत्व की कसौटी भी यही है। सच्चा नेता वह नहीं होता जो सबसे ऊँची आवाज़ में बोलता है, बल्कि वह होता है जिसके शब्दों में दृष्टि, स्पष्टता और नैतिक बल होता है। इतिहास गवाह है कि तानाशाहों की आवाज़ें समय के साथ खो जाती हैं, लेकिन विचारशील नेतृत्व के शब्द पीढ़ियों तक जीवित रहते हैं। इसलिए किसी भी क्षेत्र में—चाहे राजनीति हो, शिक्षा हो, प्रशासन हो या समाजसेवा—शब्दों की गुणवत्ता, आवाज़ की तीव्रता से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है।
यह विचार हमें आत्म-चिंतन के लिए भी प्रेरित करता है। हमें स्वयं से पूछना चाहिए कि हम अपनी ऊर्जा कहाँ खर्च कर रहे हैं—शोर मचाने में या शब्दों को बेहतर बनाने में? क्या हम तुरंत प्रतिक्रिया देकर अपनी बात ऊँची आवाज़ में रखते हैं, या पहले सोचकर सही शब्दों का चयन करते हैं? क्या हम सुनने का धैर्य रखते हैं, या केवल बोलने की जल्दी में रहते हैं? जब हम अपने शब्दों को सच्चाई, करुणा और विवेक से जोड़ते हैं, तब वही शब्द फूलों की तरह खिलते हैं और वातावरण को सुगंधित कर देते हैं।
अंततः, शब्दों की शक्ति एक शांत लेकिन अटूट शक्ति है। यह तलवार की तरह नहीं, जो डर पैदा करे, बल्कि दीपक की तरह है, जो अंधकार को चुपचाप मिटा देता है। दुनिया को बेहतर बनाने के लिए हमें ऊँची आवाज़ की नहीं, ऊँचे विचारों की ज़रूरत है। जब हमारे शब्द गहरे होंगे, तो हमारी उपस्थिति स्वतः प्रभावशाली हो जाएगी। यही जीवन का संतुलन है, यही संवाद की सच्ची कला है और यही एक सभ्य, संवेदनशील और प्रगतिशील समाज की पहचान भी है।
भीम प्रज्ञा अलर्ट
जो व्यक्ति अपने शब्दों को सोचकर और संयम से बोलता है, वही बिना शोर किए भी सबसे गहरी छाप छोड़ देता है।
