संपादकीय @ Advocate Haresh Panwar
जिसने भूख जानी, वही इंसानियत की कीमत समझता है
गरीबी केवल आर्थिक अभाव का नाम नहीं है, यह मनुष्य को जीवन की बुनियादी सच्चाइयों से परिचित कराने वाला सबसे कठोर विद्यालय है। जिनके पास भोजन, वस्त्र और आश्रय जैसी न्यूनतम आवश्यकताएं भी सहज रूप से उपलब्ध नहीं होती, वे जीवन को उस रूप में देखते हैं, जैसा वह वास्तव में है—संघर्षों से भरा, असुरक्षित और अनिश्चित। गरीबी मनुष्य को यह सिखा देती है कि एक समय की रोटी कितनी मूल्यवान होती है और यह भी कि पेट की आग बुझाने के लिए कितना संयम, श्रम और धैर्य चाहिए। यही अनुभव व्यक्ति के भीतर विनम्रता और संवेदनशीलता को जन्म देता है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।
जिसने कभी खाली पेट रात बिताई हो, वह जानता है कि भूख केवल शरीर को नहीं, आत्मा को भी झकझोर देती है। भूख के सामने पद, प्रतिष्ठा और दिखावा सभी अर्थहीन हो जाते हैं। एक रोटी का टुकड़ा तब जीवन और मृत्यु के बीच की रेखा बन जाता है। गरीबी का यह अनुभव व्यक्ति को भौतिक दुनिया की क्षण भंगुरता का एहसास कराता है और उसे यह समझने में मदद करता है कि वास्तविक संपत्ति धन नहीं, बल्कि इंसानियत है। इसी कारण कहा जाता है—जिसने गरीबी की रोटियां खाई हैं, वह दूसरों की रोटियां कभी नहीं छीनता।
गरीबी का दंश झेलने वाला व्यक्ति दूसरों के दर्द को शब्दों में नहीं, अनुभव में समझता है। वह जानता है कि किसी का हक छीनने का अर्थ क्या होता है, क्योंकि उसने स्वयं अभाव का अपमान झेला होता है। इसलिए ऐसे लोग प्रायः अधिक दयालु, सहानुभूतिपूर्ण और न्यायप्रिय होते हैं। वे यह भली-भांति जानते हैं कि जब संसाधन सीमित हों, तब एक छोटे से अन्याय का प्रभाव कितना बड़ा हो सकता है। यही कारण है कि गरीबी का अनुभव व्यक्ति को नैतिक रूप से अधिक सुदृढ़ बना देता है।
आज का समाज विडंबनाओं से भरा है। एक ओर संपत्ति का अंबार है, दूसरी ओर भूख की लंबी कतारें। ऐसे में यदि संपन्न वर्ग गरीबी के अनुभव से सीख न ले, तो सामाजिक असंतुलन और गहरा होता चला जाएगा। अक्सर देखा जाता है कि जिन लोगों ने अभाव नहीं देखा, वे संसाधनों का उपभोग बिना संवेदना के करते हैं। उन्हें यह एहसास नहीं होता कि उनकी एक फिजूलखर्ची किसी और की ज़रूरत बन सकती थी। इसके विपरीत, जिसने कठिनाइयों में जीवन जिया हो, वह साधनों का सम्मान करना जानता है।
गरीबी मनुष्य को जोड़ती भी है। समान परिस्थितियों से गुजरने वाले लोग एक-दूसरे के दर्द को बेहतर ढंग से समझते हैं। उनके बीच एक मौन समझ होती है, जो शब्दों से परे होती है। यही आपसी जुड़ाव समाज की असली ताकत बन सकता है। जब लोग अपने अनुभवों से सीखकर दूसरों के प्रति संवेदनशील बनते हैं, तभी एक न्यायसंगत और मानवीय समाज का निर्माण संभव होता है।
यह भी सच है कि गरीबी कोई महिमामंडित करने योग्य स्थिति नहीं है। कोई भी व्यक्ति स्वेच्छा से अभाव नहीं चुनता। लेकिन गरीबी से मिलने वाली सीख को नज़र अंदाज़ करना भी उतना ही बड़ा अपराध है। यह अनुभव हमें सिखाता है कि अधिकार और कर्तव्य का संतुलन कैसे बनाए रखा जाए। अगर हम चाहते हैं कि समाज में कोई किसी की रोटी न छीने, तो हमें ऐसे मूल्यों को बढ़ावा देना होगा जो सहानुभूति, साझेदारी और न्याय पर आधारित हों।
सरकारें योजनाएं बना सकती हैं, संस्थाएं सहायता कर सकती हैं, लेकिन समाज का वास्तविक चरित्र उसके नागरिकों के व्यवहार से तय होता है। जब व्यक्ति यह समझ ले कि किसी का हक छीनकर मिली समृद्धि खोखली होती है, तभी बदलाव संभव है। गरीबी का अनुभव हमें यह याद दिलाता है कि हम सभी एक-दूसरे पर निर्भर हैं और किसी की पीड़ा को नज़रअंदाज़ कर कोई भी स्थायी सुख नहीं पा सकता।
अंततः यही कहा जा सकता है कि जिसने गरीबी की रोटियां खाई हैं, उसने जीवन का सबसे गहरा पाठ पढ़ा है। यह पाठ उसे सिखाता है कि इंसानियत सबसे बड़ी पूंजी है। यदि हम इस सीख को अपनाएं और अपने व्यवहार में उतारें, तो एक ऐसा समाज बन सकता है जहां कोई भूखा न सोए और कोई किसी की रोटी छीनने की सोच भी न रखे। यही संवेदनशीलता, यही समझ, एक सच्चे और न्यायपूर्ण समाज की आधारशिला है।
भीम प्रज्ञा अलर्ट
जो व्यक्ति परिस्थितियों को कोसने में नहीं, बल्कि खुद को बदलने में ऊर्जा लगाता है, वही जीवन की हर कठिनाई को अवसर में बदल पाता है।
