संपादकीय @ Advocate Haresh Panwar
दोगले चेहरों की भीड़ और सच्चाई का अकेलापन
जीवन एक ऐसी किताब है, जिसके हर पन्ने पर वक्त कोई न कोई पहेली लिख देता है। कभी यह पहेली रिश्तों के रूप में सामने आती है, कभी परिस्थितियों के रूप में और कभी स्वयं हमारे ही मन के सवाल बनकर। जिनकी फितरत हमेशा बदलने की होती है, वे न समय के साथ सच्चे रह पाते हैं और न ही इंसानों के साथ। ऐसे लोग हालात के हिसाब से अपने रंग बदलते हैं, कभी दोस्ती का चोला ओढ़ लेते हैं तो कभी बेगानेपन की दीवार खड़ी कर देते हैं। यही कारण है कि वे अंततः किसी के नहीं हो पाते। वक्त भी कुछ ऐसा ही है—कभी साथ देता हुआ लगता है, कभी छीनता हुआ और कभी ऐसी उलझन बनकर सामने आता है कि समझ में ही नहीं आता, उसने हमें दिया क्या है और लिया क्या है। शायद इसीलिए कहा गया है कि वक्त ने उलझनों को जिंदगी दी और उन्हें समझने के लिए उम्र दे दी। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।
हम अक्सर स्वर्ग और नरक को किसी दूर-दराज़ की काल्पनिक जगह मान लेते हैं, लेकिन बुजुर्गों की सीख कुछ और ही कहती है। उनके अनुसार स्वर्ग और नरक कोई भौगोलिक स्थान नहीं, बल्कि मन की अवस्थाएं हैं। स्वर्ग है वह जीवन, जिसमें संतुलन, संतुष्टि और समझदारी हो। नरक है वह जीवन, जो अंधविश्वास, डर, भ्रम और मूर्खतापूर्ण निर्णयों से भरा हो। जब मन निरंतर शंकाओं, ईर्ष्या और असंतोष में डूबा रहता है, तो व्यक्ति चाहे कितनी ही सुख-सुविधाओं में क्यों न जी रहा हो, उसका जीवन भीतर से जलता रहता है। इसके उलट, सीमित साधनों में भी जो व्यक्ति जीवन को स्वीकार करना सीख लेता है, वही सच्चे अर्थों में स्वर्ग का अनुभव करता है। यही कारण है कि महलों में भी आंसू बहते हैं और साधारण घरों में भी ठहाके गूंजते हैं। फर्क केवल हालात का नहीं, सोच का होता है।
आज का इंसान सबसे बड़ी भूल यह करता है कि वह अपनी मानसिक शांति की चाबी दूसरों के व्यवहार के हाथों में दे देता है। कोई कटु शब्द बोल दे, तो मन विचलित हो जाता है; कोई उपेक्षा कर दे, तो आत्मसम्मान आहत हो जाता है; कोई धोखा दे दे, तो विश्वास ही टूट जाता है। लेकिन यह समझना ज़रूरी है कि किसी का व्यवहार उसकी अपनी सोच, संस्कार और सीमाओं का प्रतिबिंब होता है, न कि हमारी कीमत का प्रमाण। किसी के बुरे व्यवहार के कारण अपने मन की शांति को खो देना, अपने ही स्वर्ग को अपने हाथों से नरक में बदल देना है। समझदारी इसी में है कि हम दूसरों के कर्मों को अपने मन का नियंत्रक न बनने दें।
संतुष्टि वह अमूल्य पूंजी है, जो न धन से खरीदी जा सकती है और न ही किसी से छीनी जा सकती है। यह भीतर से उपजती है। संतुष्ट व्यक्ति कम में भी मुस्कुरा सकता है और अधिक में भी विवेक नहीं खोता। वह जानता है कि जीवन केवल पाने का नाम नहीं है, बल्कि जो मिला है, उसमें सुकून ढूंढ लेना ही असली सफलता है। जब दिलों में संतुष्टि बस जाती है, तो तुलना, ईर्ष्या और शिकायत स्वतः ही विदा हो जाती हैं। तब व्यक्ति दूसरों की प्रगति से जलने के बजाय उससे प्रेरणा लेता है।
दोगले लोगों की पहचान करने में अपनी ऊर्जा और समय नष्ट करना भी जीवन की एक बड़ी भूल है। ऐसे लोगों को अलग से पहचानने की ज़रूरत नहीं पड़ती, वक्त स्वयं उनका पर्दाफाश कर देता है। जिनकी कथनी और करनी में अंतर होता है, वे किसी न किसी मोड़ पर अपने ही शब्दों और कर्मों से बेनकाब हो जाते हैं। उनसे सावधान रहना ज़रूरी है, लेकिन उनके प्रति मन में क्रोध और द्वेष पालकर बैठ जाना अपने ही मन को बोझिल करना है। जीवन इतना लंबा नहीं कि हम उसे दूसरों की दोगली फितरत पर खर्च कर दें।
वक्त की सबसे बड़ी खासियत यही है कि वह किसी के साथ अन्याय नहीं करता। देर से ही सही, लेकिन वह हर किसी को उसकी सच्चाई के साथ सामने लाता है। जो लोग धैर्यवान, ईमानदार और स्थिर होते हैं, वे समय की कसौटी पर खरे उतरते हैं। और जो लोग अवसरवादी, अस्थिर और स्वार्थी होते हैं, वे कुछ समय तक चमक सकते हैं, लेकिन स्थायी नहीं रह पाते। इसलिए यह अपेक्षा करना कि हर इंसान हर हाल में एक जैसा ही रहेगा, स्वयं को धोखे में रखना है। परिवर्तन जीवन का नियम है, लेकिन मूल्यों का बदलना पतन की निशानी है।
आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में सबसे बड़ी जरूरत है—बेफिक्री की नींद। जब मन हल्का होता है, तो नींद गहरी आती है और जब नींद गहरी होती है, तो जीवन की थकान उतर जाती है। “क्यों न बेफिक्र होकर सोया जाए, अब बचा ही क्या है जिसे खोया जाए”—यह पंक्ति निराशा नहीं, बल्कि गहन जीवन-बोध का संकेत है। जब हम यह स्वीकार कर लेते हैं कि जो हमारे वश में था, वह हमने किया; जो नहीं था, उसे छोड़ देना ही समझदारी है—तब मन स्वतः शांत हो जाता है।
अंततः जीवन का सार यही है कि हम अपनी खुशियों के कारण स्वयं खोजें। उन्हें किसी व्यक्ति, परिस्थिति या समय के भरोसे न छोड़ें। वक्त की पहेलियों को समझें, इंसानों की फितरत को पहचानें, लेकिन अपने मूल्यों, आत्मसम्मान और मानसिक शांति से समझौता न करें। स्वर्ग और नरक का चुनाव कोई और नहीं करता, हम स्वयं करते हैं—हर दिन, हर पल, अपने विचारों और अपने दृष्टिकोण से। जो यह समझ लेता है, वही जीवन की सबसे बड़ी पहेली को सुलझा लेता है।
भीम प्रज्ञा अलर्ट
जो इंसान अपने भीतर शांति पैदा करना सीख लेता है,
उसे बाहर की उथल-पुथल कभी विचलित नहीं कर पाती।

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