संपादकीय Advocate Haresh Panwar
*नाम बदलने की राजनीति और विकास का खोखलापन*
देश के मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य में “नाम बदलने” की राजनीति एक नए शिखर पर पहुँच चुकी है। कभी सड़कों के नाम बदले जा रहे हैं, कभी सरकारी दफ्तरों के, कभी योजनाओं के और कभी इतिहास की पहचान तक को नए आवरण में प्रस्तुत किया जा रहा है। तर्क दिया जाता है कि इससे “भारतीयता” सुदृढ़ होगी, पर ज़मीनी हकीकत यह है कि नाम बदलने की इस दौड़ में कई जनकल्याणकारी योजनाएँ अपनी आत्मा खोती नज़र आ रही हैं। सवाल नाम का नहीं, सवाल नीयत, संरचना और प्रभाव का है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।
आज यदि हम ग्रामीण भारत की ओर देखें तो विकास के दावों और वास्तविकता के बीच की खाई पहले से कहीं अधिक चौड़ी दिखाई देती है। ग्राम स्वराज का जो सपना महात्मा गांधी ने देखा था, जिसमें ग्राम सभा सर्वोच्च निर्णयकारी संस्था हो, वह सपना अब काग़ज़ों में सिमटता जा रहा है। ग्राम पंचायतें, जो कभी स्थानीय लोकतंत्र की रीढ़ हुआ करती थीं, आज ऊपर से थोपे गए निर्णयों की मात्र कार्यान्वयन एजेंसी बनती जा रही हैं। विकास की योजनाएँ अब गाँव की ज़रूरतों से नहीं, बल्कि फाइलों और फरमानों से तय होंगी—ऐसा कानूनी ढांचा तैयार किया जा रहा है।
इसी कड़ी में महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) को लेकर चल रही चर्चाएँ गंभीर चिंता का विषय हैं। मनरेगा केवल एक योजना नहीं थी, बल्कि यह ग्रामीण गरीब के लिए अधिकार था—काम का अधिकार। इसका नाम बदलकर “ *वीबी-जी राम जी”* यानी “विकसित भारत गारंटी फाॅर रोजगार और आजीविका मिशन (ग्रामीण)” विधायक 2025 लाया जाने की तैयारी है, प्रतीकात्मक रूप से भले ही आकर्षक लगे, लेकिन असल चिंता यह है कि इसके साथ-साथ योजना की मूल आत्मा को भी बदला जा रहा है। नाम बदलना अपने आप में न अच्छा है, न बुरा, लेकिन जब नाम बदलने के साथ ढांचा, वित्तीय जिम्मेदारी और निर्णय प्रक्रिया भी बदल दी जाए, तब सवाल उठना स्वाभाविक है।
मनरेगा की मूल भावना थी—ग्राम पंचायत के माध्यम से, ग्राम सभा की सहमति से, स्थानीय ज़रूरतों के अनुसार काम और 100 दिन के रोजगार की गारंटी। अब कहा जा रहा है कि 125 दिन की गारंटी दी जाएगी, लेकिन काम कौन-से होंगे, किसे मिलेंगे और कैसे मिलेंगे—यह सब ऊपर से तय होगा। यानी दिखावे में गारंटी बढ़ी, लेकिन स्थानीय स्वायत्तता घट गई। यह ऐसा ही है जैसे किसी से छतरी छीनकर कहा जाए कि बारिश में भीगने का डर मत करो, हमने धूप बढ़ा दी है।
वित्तीय ढांचे में किया गया बदलाव भी कम चिंताजनक नहीं है। पहले मनरेगा में 90 प्रतिशत हिस्सा केंद्र और 10 प्रतिशत राज्य सरकार का होता था। अब इसे 60:40 के अनुपात में लाने की बात हो रही है। इसका सीधा असर उन राज्यों पर पड़ेगा, जो पहले से आर्थिक दबाव में हैं। परिणामस्वरूप मजदूरी भुगतान में देरी, काम की कमी और योजना के प्रति लोगों का भरोसा कमजोर होना तय है। रोजगार गारंटी अधिनियम यदि राज्यों की वित्तीय मजबूरी की भेंट चढ़ गया, तो इसका नाम चाहे कुछ भी रखा जाए, ग्रामीण गरीब के लिए वह अर्थहीन हो जाएगा।
ग्राम पंचायतों की हालत तो और भी दयनीय है। फाइनेंस कमीशन की राशि, जो पंचायतों के लिए जीवनरेखा होती है, कई जगह समय पर नहीं पहुनच रही।
राजस्थान जैसे राज्यों में सरपंचों ने बिना बजट के ही अपना कार्यकाल गुज़ार दिया। अब प्रशासक व्यवस्था है, लेकिन पंचायतों के खाते खाली हैं। विकास के लिए न योजना बनाने की स्वतंत्रता है, न उसे लागू करने के संसाधन। ऐसे में सरकार भले ही काग़ज़ों में पैसा “बचा” ले, पर ज़मीन पर उसका अर्थ केवल एक है—विनाश।
विडंबना यह है कि इन सबके बीच नाम बदलने का उत्सव जारी है। जैसे विकास की असली समस्याओं का समाधान नाम बदलने से ही हो जाएगा। ऐसा लगता है मानो योजनाओं के नाम बदलकर उन्हें मार्गदर्शन दीर्घा में सजा दिया जाए और असली काम को इतिहास के हवाले कर दिया जाए। व्यंग्य यह है कि गाँव में सड़क टूटी है, मजदूर बेरोज़गार है, पंचायत खाली है, लेकिन बोर्ड चमकदार और नाम नया है।
यह भी एक गंभीर आशंका है कि नाम बदलने की इस राजनीति का विस्तार केवल योजनाओं तक सीमित न रहे। जब सड़कों, संस्थानों, योजनाओं और क़ानूनों के नाम बदले जा सकते हैं, तो क्या कल को संवैधानिक मूल्यों और पहचान पर भी यही प्रयोग होगा? यह सवाल अतिशयोक्ति नहीं, बल्कि उस दिशा की ओर इशारा है, जहां प्रतीकों को वास्तविकता से ऊपर रखा जा रहा है।
लोकतंत्र में परिवर्तन बुरा नहीं होता, लेकिन परिवर्तन का उद्देश्य जनता के जीवन को बेहतर बनाना होना चाहिए, न कि केवल राजनीतिक कथा को नया नाम देना। मनरेगा हो या ग्राम पंचायतें, इनकी ताकत नाम में नहीं, बल्कि उस भरोसे में है जो आम आदमी ने इन पर किया था। यदि वही भरोसा टूट गया, तो कोई भी नया नाम उस खालीपन को नहीं भर पाएगा।
अंततः यह समझना ज़रूरी है कि विकास का अर्थ केवल घोषणाएँ और नाम परिवर्तन नहीं है। विकास वह है जो गाँव के आख़िरी आदमी के चेहरे पर मुस्कान लाए, उसे काम दे, सम्मान दे और निर्णय में भागीदारी दे। यदि नाम बदलने की राजनीति इस लक्ष्य से भटका दे, तो इतिहास यह प्रश्न अवश्य पूछेगा कि हमने योजनाओं के नाम तो बदल दिए, लेकिन लोगों की ज़िंदगी क्यों नहीं बदली?
