संपादकीय
*“फ्यूज हुए लोटियों की धमा-चौकड़ी : समाज के नाम पर स्वार्थ का उजागर तमाशा”*
समाज में कुछ चेहरे ऐसे होते हैं जो सत्ता में रहते हुए चमकते हैं, चमचमाते हैं और स्वयं को प्रकाश-पुंज समझने लगते हैं, लेकिन जैसे ही पद, कुर्सी या अधिकार का करंट खत्म होता है, वैसे ही वे फ्यूज हुए बल्ब की तरह अंधेरे में चले जाते हैं। फर्क बस इतना है कि फ्यूज हुआ बल्ब चुपचाप कोने में रख दिया जाता है, लेकिन ये “फ्यूज हुए लोटिए” चुप नहीं बैठते। वे अपने भीतर के अहंकार को ढोते हुए समाज के मंचों, पार्कों, सामुदायिक भवनों और अंबेडकर भवनों में सक्रिय हो जाते हैं और समाज सुधारक बनने का नाटक शुरू कर देते हैं। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।
असल में फ्यूज हुए लोटिए की सबसे बड़ी पहचान यही है कि जब तक उसके तंतु में करंट रहता है, तब तक समाज, संविधान, गरीब, वंचित, पिछड़े उसे याद नहीं आते। उसकी कलम, उसकी फाइलें और उसकी शक्तियां केवल स्वार्थ, सुविधा और निजी लाभ के लिए चलती हैं। लेकिन जैसे ही रिटायरमेंट का समय आता है, जैसे ही कुर्सी खिसकती है, वैसे ही उसे समाज की दशा-दिशा पर गहन चिंतन सूझने लगता है। तब वह अचानक सामाजिक न्याय का ठेकेदार, संगठन का संरक्षक और समाज का मसीहा बनने निकल पड़ता है।
इन फ्यूज हुए लोटियों का एक अलग ही खेल चलता है। समाज के नाम पर संगठन, संगठन के नाम पर राजनीति और राजनीति के नाम पर सौदेबाजी। बड़ी-बड़ी राजनीतिक पार्टियों से लेन-देन, पतली गलियों से अपने काम निकालने की कला और समाज को “संगठन के तमगे” का लालच दिखाकर भीड़ जुटाने की रणनीति—यही इनकी असली पहचान है। गरीब समाज अपनी रोजमर्रा की लड़ाई में उलझा रहता है, और समाज का मलाईदार तबका हर हाल में खुद को मलूमाल बनाए रखने की जुगत में लगा रहता है।
प्रतिभा सम्मान समारोह, जयंती आयोजन, सेमिनार और विचार गोष्ठियां—ये सब इनके लिए साधन हैं, साध्य नहीं। एक कागज का टुकड़ा, एक मोमेंटो और अखबार की एक कटिंग के लिए प्रतिभाओं को घंटों इंतजार कराया जाता है। मंच पर बुलाकर फोटो खिंचवाई जाती है, फिर वही प्रतिभा भीड़ में गुम हो जाती है। सवाल यह है कि क्या आपने कभी देखा कि ऐसे सम्मानित “प्रतिभा” आगे चलकर उसी मंच पर लौटकर अतिथि के रूप में आई हो? क्या वह कह पाई कि इसी मंच से सम्मान पाकर उसने समाज के लिए कुछ किया? नहीं। क्योंकि यह सम्मान नहीं, एक तरह की सामाजिक लूट है—गरीबी की लूट, सपनों की लूट और आत्मसम्मान की लूट।
हाल के दिनों में राजस्थान में डॉ. अंबेडकर मेमोरियल वेलफेयर सोसाइटी के चुनाव को लेकर जो कुछ सोशल मीडिया और व्हाट्सएप ग्रुपों में परोसा गया, वह केवल गंदगी नहीं, बल्कि सामाजिक पतन का आईना है। जिन अधिकारियों को कभी समाज ने आदर्श मानकर पगड़ी, साफा और मालाओं से सम्मानित किया, आज उन्हीं की कुत्सित मानसिकता, कपटपूर्ण व्यवहार और छिछोरी सामाजिक राजनीति खुलकर सामने आ गई है। लाखों लोगों से आजीवन सदस्यता के नाम पर 410 रुपये लेकर संगठन खड़ा करने की बात करने वाले लोग खुद संगठन को निजी जागीर बनाने पर उतारू हैं।
इन फ्यूज हुए लोटियों की आपसी लड़ाई देखकर यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या यही बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर का सपना था? क्या यही सामाजिक न्याय, समानता और बंधुत्व की लड़ाई है? बाबा साहब ने जिन परिस्थितियों में संघर्ष किया, जिन अपमानों को सहा और जिस वैचारिक ऊंचाई तक समाज को ले जाने का प्रयास किया, उसकी तुलना इन लोगों की ओछी हरकतों से करना भी बाबा साहब का अपमान है।
सोशल मीडिया पर पोस्टों का अध्ययन करें तो लगता है कि इतनी तेजी से रंग तो गिरगिट भी नहीं बदलता, जितनी तेजी से ये लोग पाला बदलते हैं। अपनी जुबान बदलते हैं। अपने स्टेटमेंट बदलते। जिसे कल तक गाली दे रहे थे, आज उसके साथ मंच साझा कर रहे हैं। जिसे कल तक समाजद्रोही बता रहे थे, आज उसे संगठन का रक्षक घोषित कर रहे हैं। सत्ता और नॉमिनेशन की लालसा ही इनका असली मकसद है। जिन्हें सरकार से कोई पद या मनोनयन मिल जाता है, वे सरकार की वाहवाही में लग जाते हैं, और जिन्हें नहीं मिलता, वे अचानक क्रांतिकारी बन जाते हैं।
यह तमाशा केवल राजनीति में आम हो चुका है, लेकिन सामाजिक संगठन के बैनर तले ऐसा नंगा नाच शायद पहली बार इतने खुले रूप में दिखाई दे रहा है। यही कारण है कि आम समाज में घृणा, निराशा और अविश्वास बढ़ रहा है। लोग पूछ रहे हैं—क्या सामाजिक संगठन भी अब सत्ता का पिछलग्गू बन चुके हैं? क्या समाज के नाम पर केवल चंद लोग ही लाभ उठाएंगे?
सच यह है कि जब तक समाज इन फ्यूज हुए लोटियों को पहचानकर किनारे नहीं करेगा, तब तक न संगठन मजबूत होंगे, न आंदोलन सच्चे होंगे। समाज को यह तय करना होगा कि उसे दिखावटी रोशनी चाहिए या वास्तविक प्रकाश। फ्यूज हुए बल्ब को बदलना ही पड़ता है, वरना अंधेरा फैलता है। आज समय आ गया है कि समाज भी साहस करे, प्रश्न पूछे और इन नकली समाजसेवियों को आईना दिखाए।
क्योंकि यदि समाज ने समय रहते यह नहीं समझा, तो मंच तो सजते रहेंगे, भाषण होते रहेंगे, मालाएं चढ़ती रहेंगी—लेकिन बाबा साहब का सपना, सामाजिक न्याय और वास्तविक बदलाव केवल पोस्टरों और नारों तक सिमट कर रह जाएगा।
*भीम प्रज्ञा अलर्ट*
जो व्यक्ति पद, प्रशंसा और भीड़ के बिना भी सच बोलने का साहस रखता है, वही वास्तव में चरित्रवान और समाज के लिए उपयोगी होता है।
