भीम प्रज्ञा कविता
संघर्ष ही तराना
तुम कोई स्वर्ग लोक में नहीं हो,
जहाँ सुंदरियाँ मदिरा संग बैठी हों।
तुम मृत्यु लोक में हो, धरती पर,
यहाँ पसीना बहाना पड़ता है हर पहर।
सपनों में मत खोओ, जागो ज़रा,
यहाँ रोटी कमानी है, करना है धरा।
दुख आएगा, हँसकर झेलो,
गिरोगे तो फिर से खेलो।
जीवन कोई नाच-गाना नहीं,
यहाँ संघर्ष ही तराना सही।
तो सिर उठाकर चलो, मुस्कान रखो,
मृत्यु लोक में हो — सहना सीखो!
– क्षमा राव, मुंबई
कवयित्री
