ज़ख्म-ए-दिल
भावुक मन,
कोमल अहसास।
प्यार की आस,
जल्दी विश्वास।
सपने बुने,
रंग भर दिए।
काँच का दिल,
टूट बिखर गए।
चोट गहरी,
आँख नम हुई।
इतना भावुक हूँ कि,
दूसरों की परेशानियाँ भी,
खुद की लगती हैं।
सोच ये मन,
क्यों मैं ही सही?
दिल सँभलेगा,
फिर प्यार होगा।
पर अब विश्वास,
आहिस्ता होगा।
– क्षमा राव, मुंबई
कवयित्री
