*शंभू की दासी हूँ मैं*
दुनिया के सब रिश्तों को, मैं पीछे छोड़ आई हूँ,
मैं शंभू की दासी हूँ, उनकी ही शरण में आई हूँ।
जब गहरी नींद में ये चंचल मन खो जाता है,
मेरे सपनों के आँगन में, महादेव का पहरा हो जाता है।
लगता है पिछले जन्म में, मैंने तेरी खूब भक्ति की होगी,
तेरे नाम की ज्योत अपने, रोम-रोम में भरी होगी।
तभी तो इस जन्म की शुरुआत से, तेरा साथ मिला है,
मेरे सिर पर जन्म से ही, तेरे हाथ का वरदान खिला है।
वो केवल दर्शन नहीं देते, जीवन के गूढ़ संदेश सुनाते हैं,
आने वाले समय की चुनौतियों से, वे मुझे पहले ही जगाते हैं।
सपनों में संकेतों से, वे भविष्य की चेतावनी दे जाते हैं,
“सतर्क रह, और धैर्य रख”—वे अपनी पुत्री को समझाते हैं।
वे कहते हैं— “जीवन एक संग्राम है, पर तू कभी डगमगाना मत,
राह में आएँ बाधाएँ कितनी भी, तू सत्य का साथ छोड़ना मत।”
वे भांप लेते हैं मेरे कल की, हर एक कठिन डगर को,
और अपनी कृपा से शांत बना देते, मेरे जीवन के सफर को।
– क्षमा राव, मुंबई
कवयित्री
