*भीम प्रज्ञा कविता*
●अरावली की पीड़ा●
‘मान’ मरुधरा का अरावली,
‘करण कवच’ सा रक्षक भी।
प्रबल प्रहरी ‘थार, को थामे,
हरित चीर सी शोभा भी।।
संकट विकट सहे स्वयं ने
पर्यावरण का पोषक यह ।
पथराये चक्षु नीर बहाये ,
प्यासी भूमि का स्रोत है यह।।
राजस्थान के प्राण बसे हैं,
मत तोड़ो इन ढालों को।
बिलखोगे, तरसोगे, बक्शो!,
इन डूंगर अलबेलो को ।।
प्रस्तर नहीं, मां का आंचल,
धीर पिता की बाहें यह।
संकट में वीरों का आश्रय,
दुश्मन का संहारक यह।।
बिन इनके अग्नि बरसेगी,
वर्षा बिन मरुधर तड़पेगी ।
हरा चीर जो छिन्न हुआ तो,
विष बयार ,मृत्यु विचरेगी।।
आज आडावल सहम रहा,
मरुधर की माटी शंकित ।
प्रकृति के क्रंदन को समझें,
त्यागें विनाश की युक्ति।।
अरावली सदियों से प्रहरी,
सदैव हम पर बलिहारी।
करें सुरक्षित विश्व धरोहर,
अब हमारी है बारी।।
*ब्रजराज सिंह जी राजावत*
लेखक एवं चित्रकार
(30 वर्षों से राजस्थान के ऐतिहासिक सांस्कृतिक विश्व वितरण का उल्लेखित चित्रकर्ता सर्जन में समर्पित),
