*अरावली की वेदना*
अरावली की पर्वत माला, होकर दुखी पुकारी है।
देशवासियों बचाओ लो मुझे,
दुष्टों ने मेरा अस्तित्व ख़त्म करने की ठानी है ।
वृक्ष काटकर खेत बनाते,
अपनी फ़सल उगाने को।
साथ पहाड़ी खोद गिराते,
धरती नई बनाने को ।
अनउपचारित खनन यहाँ की,
सबसे बड़ी बीमारी है।
जनता से पूछ रही अरावली,
क्यों हो रही बर्बादी हमारी है
दोहन करके संसाधन का,
खतरा स्वयं बढ़ाया है।
पर्यावरण हुआ जहरीला,
संकट सब पर छाया है।
खान खोदकर ग्रेनाइट की,
करदी ध्वस्त पहाड़ी है।
प्रकृति प्रेमियों से सवाल कर रही ,
क्यों बर्बाद हो रही अरावली है ?
शहर बसाने ख़ातिर हमने,
अपना चमन उजाड़ा है।
अपने ही हाथों से हमने,
मस्तक स्वयं उखाड़ा है।
चार राज्य में बसी शृंखला,
अरावली अति प्यारी है।
सफेदपोश नेताओं से मांग कर रही,
क्यों बर्बादी कर रहे हमारी है ?
धोखा कुदरत से करते वो,
बात करें समझाने की।
वृक्षारोपण बनता नाटक,
खेप चली कटवाने की।
रौनक अपनी गेंद रहे ये,
नाकामी नाकारी है।
बेदर्दी इंसानों से मांग कर रही अरावली,
क्यों नष्ट कर रहे हो मैंने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है।
गुरु शिखर और माउन्ट आबू,
पर्वत शिखर निराले हैं।
वैभव शाली अतीत वाले,
उच्च शिखर मतवाले हैं।
रक्षा करनी अरावली की भास्कर कहता,
सभी की जिम्मेदारी है।
मांग कर रही जीवनदायिनी,
भूलकर मतभेद मुझे बचना है ।
अरावली की वेदना सुनकर
अपने दिल की आवाज सुनानी है,
एकता का परिचय देकर प्रकृति माता की इज्जत बचानी है ।
*लेखक-मदन मोहन भास्कर*
