संपादकीय @Advocate Haresh Panwar
“वोट चोर, गद्दी छोड़” : प्रतिपक्ष की हुंकार और लोकतांत्रिक चेतना का पुनर्जागरण
लोकतंत्र की असली परीक्षा केवल चुनाव जीतने से नहीं, बल्कि सवालों का सामना करने और जवाबदेही निभाने से होती है। आज जब संसद से लेकर सड़क तक “वोट चोर, गद्दी छोड़” का नारा गूंज रहा है, तो यह केवल एक राजनीतिक वाक्य नहीं, बल्कि व्यवस्था के प्रति उठता हुआ असंतोष और लोकतांत्रिक चेतावनी है। कांग्रेस के प्रतिपक्ष नेता राहुल गांधी ने जिस आक्रामक लेकिन वैचारिक अंदाज़ में सरकार को घेरते हुए चुनावी प्रक्रिया, कथित धांधली और अनियंत्रित चुनावी खर्च पर सवाल उठाए हैं, उसने राष्ट्रीय बहस को एक बार फिर लोकतंत्र के मूल प्रश्नों की ओर मोड़ दिया है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।
राहुल गांधी का संसद से सड़क तक लगातार सरकार को “घूरना” महज़ विरोध का प्रतीक नहीं, बल्कि उस प्रतिपक्षीय जिम्मेदारी का निर्वहन है, जिसे भारतीय संविधान ने विपक्ष को सौंपा है। उन्होंने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए यह तर्क सामने रखा कि यदि चुनाव निष्पक्ष और पारदर्शी नहीं होंगे, तो लोकतंत्र का आधार ही कमजोर पड़ जाएगा। “चुनाव आयोग की बगिया खोलना” जैसे तीखे शब्दों के पीछे छिपा संदेश साफ है—संस्थाएं जितनी शक्तिशाली होती हैं, उतनी ही अधिक पारदर्शिता और सार्वजनिक विश्वास की मांग करती हैं। जब यह विश्वास डगमगाता है, तो सवाल उठना स्वाभाविक है।
कांग्रेस का आरोप है कि चुनावों में होने वाला अनाप-शनाप खर्च, सत्ता के दुरुपयोग और संसाधनों की असमान उपलब्धता, लोकतांत्रिक प्रतिस्पर्धा को असंतुलित कर रही है। यदि एक पक्ष असीमित धन और तंत्र की ताकत से लैस हो, और दूसरा केवल जनसमर्थन के भरोसे खड़ा हो, तो चुनाव केवल औपचारिकता बनकर रह जाते हैं। इस संदर्भ में राहुल गांधी द्वारा खर्च पर अंकुश लगाने और समान अवसर की बात करना, लोकतंत्र को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण विमर्श है।
इसी राजनीतिक संघर्ष के बीच कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा की सक्रियता और राजनीतिक चिंतन ने आम जनता के बीच नेतृत्व के प्रति विश्वास को नई ऊर्जा दी है। प्रियंका गांधी का जमीनी मुद्दों पर मुखर होना, महिलाओं, युवाओं और वंचित वर्गों से सीधा संवाद स्थापित करना, यह संकेत देता है कि राजनीति केवल सत्ता के गलियारों तक सीमित नहीं, बल्कि आम नागरिक के जीवन से जुड़ी होनी चाहिए। उनकी शैली में आक्रामकता से अधिक संवेदना और संवाद दिखाई देता है, जो जनता के बीच भरोसे का आधार बनता है।
वहीं कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे की उदार और संतुलित नीति पार्टी को वैचारिक स्थिरता प्रदान करती है। खड़गे का राजनीतिक जीवन संघर्ष, अनुभव और समावेशी सोच का प्रतीक रहा है। उनकी अगुवाई में कांग्रेस का प्रयास यह संदेश देना है कि विरोध का अर्थ अराजकता नहीं, बल्कि संवैधानिक मर्यादाओं के भीतर दृढ़ प्रतिरोध है। खड़गे की नीति यह भी दर्शाती है कि पार्टी केवल सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा को अपना उद्देश्य मानती है।
हालांकि, लोकतंत्र की मजबूती के लिए यह भी आवश्यक है कि आरोप और प्रत्यारोप से आगे बढ़कर संवाद और सुधार की दिशा में ठोस कदम उठाए जाएं। सरकार का यह दायित्व है कि वह चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्थाओं की स्वतंत्रता और विश्वसनीयता को और सुदृढ़ करे, ताकि किसी भी तरह के संदेह की गुंजाइश न बचे। वहीं विपक्ष की जिम्मेदारी है कि वह सवालों को तथ्यों, तर्क और संवैधानिक माध्यमों से आगे बढ़ाए।
“वोट चोर, गद्दी छोड़” का नारा दरअसल सत्ता को यह याद दिलाने का प्रयास है कि लोकतंत्र में गद्दी स्थायी नहीं होती, वह जनता के विश्वास पर टिकी होती है। जब विश्वास कमजोर होता है, तो कुर्सी अपने आप हिलने लगती है। राहुल गांधी की मुखरता, प्रियंका गांधी की सक्रियता और मल्लिकार्जुन खड़गे की उदार नीति—इन तीनों का समन्वय कांग्रेस को एक ऐसे प्रतिपक्ष के रूप में प्रस्तुत करता है, जो न केवल विरोध करता है, बल्कि लोकतंत्र को बचाने का दावा भी करता है।
अंततः, भारतीय लोकतंत्र की मजबूती इसी में है कि सत्ता और प्रतिपक्ष दोनों अपने-अपने दायित्वों को समझें। सत्ता यदि पारदर्शिता, निष्पक्षता और जवाबदेही अपनाए, और विपक्ष यदि सजग प्रहरी बनकर सवाल उठाता रहे, तो लोकतंत्र सुरक्षित रहेगा। आज उठ रही यह आवाज़ किसी एक दल की नहीं, बल्कि उस लोकतांत्रिक चेतना की है, जो समय-समय पर सत्ता को आईना दिखाती रहती है।
भीम प्रज्ञा अलर्ट
जो व्यक्ति सच बोलने का साहस रखता है, वही बदलाव की शुरुआत करता है; क्योंकि मौन अक्सर सुविधा देता है, लेकिन सच ही समाज को दिशा देता है।

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