“भाग्य भी उन्हीं का साथ देता है जो पसीना बहाना जानते हैं”—यह केवल प्रेरक वाक्य नहीं, बल्कि जीवन का गहन दर्शन है। समाज में जब भी किसी व्यक्ति को ऊँचाइयों पर पहुंचते देखते हैं, तो अक्सर उसे ‘भाग्यशाली’ कहकर उसकी सफलता को संक्षेप में समझाने की कोशिश करते हैं। किंतु यह दृष्टिकोण अधूरा है। किसी भी उपलब्धि के पीछे अनगिनत संघर्ष, असफलताओं से जूझने का साहस, निरंतर अभ्यास और त्याग छिपा होता है। भाग्य वास्तव में परिश्रम का ही दूसरा नाम है, जो सही समय पर अवसर के रूप में प्रकट होता है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे किबोलता है। मनुष्य के जीवन में अवसर अचानक आते हुए प्रतीत हो सकते हैं, परंतु वे वास्तव में उन लोगों को ही दिखाई देते हैं जो तैयार रहते हैं। तैयारी स्वयं में एक कठिन प्रक्रिया है—अनुशासन, धैर्य और निरंतरता का संगम। जो व्यक्ति लक्ष्य निर्धारित कर उसके लिए निरंतर प्रयास करता है, वही अवसर आने पर उसे पहचान और पकड़ पाता है। यही वह क्षण है जब लोग कहते हैं—“भाग्य ने साथ दिया।” दरअसल, यह तैयारी और अवसर का संगम होता है। इतिहास ऐसे उदाहरणों से भरा पड़ा है, जहाँ व्यक्तियों ने विपरीत परिस्थितियों में भी हार नहीं मानी। बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर ने सामाजिक भेदभाव और आर्थिक अभाव के बीच शिक्षा को अपना हथियार बनाया। उन्होंने दिन-रात अध्ययन कर स्वयं को इस योग्य बनाया कि अवसर मिलने पर वे संविधान निर्माण जैसे ऐतिहासिक दायित्व को निभा सकें। महात्मा ज्योतिबा फुले ने भी सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध संघर्ष करते हुए शिक्षा और समानता का मार्ग चुना। इन महापुरुषों को ‘भाग्यशाली’ कह देना उनके तप, त्याग और संघर्ष के साथ अन्याय होगा। उनका भाग्य उनके परिश्रम का परिणाम था।
आज की युवा पीढ़ी अक्सर त्वरित सफलता की अपेक्षा करती है। सोशल मीडिया और तात्कालिक उपलब्धियों की संस्कृति ने यह भ्रम पैदा कर दिया है कि सफलता एक रात में हासिल हो सकती है। परंतु सच्चाई यह है कि हर चमकती हुई उपलब्धि के पीछे वर्षों का अदृश्य श्रम होता है। यदि बीज बोने के तुरंत बाद फल की अपेक्षा की जाए, तो निराशा ही हाथ लगेगी। फसल उगाने के लिए भूमि तैयार करनी पड़ती है, बीज बोना पड़ता है, सिंचाई करनी पड़ती है और धैर्य रखना पड़ता है। ठीक इसी प्रकार भाग्य की फसल भी कठिन परिश्रम की जमीन पर ही उगती है। कर्म और भाग्य के संबंध को समझना भी आवश्यक है। भारतीय दर्शन में कर्म को प्रधान माना गया है। गीता का संदेश भी यही है कि मनुष्य को अपने कर्म पर ध्यान देना चाहिए, फल की चिंता नहीं करनी चाहिए। जब कर्म निष्ठापूर्वक किया जाता है, तो परिणाम अनुकूल होने की संभावना बढ़ जाती है। जो व्यक्ति प्रयास ही नहीं करता, वह भाग्य को दोष देकर स्वयं को संतुष्ट कर सकता है, परंतु इससे जीवन में कोई ठोस परिवर्तन नहीं आता। समाज में भी हमें ऐसी मानसिकता को बढ़ावा देना होगा जो परिश्रम को सम्मान दे। अक्सर हम सफलता को केवल परिणाम से मापते हैं, प्रक्रिया से नहीं। यदि असफल प्रयासों को भी सीख और अनुभव के रूप में देखा जाए, तो वे भविष्य की सफलता की नींव बन सकते हैं। असफलता दरअसल यह संकेत देती है कि प्रयास जारी रखने की आवश्यकता है, दिशा में सुधार की आवश्यकता है। जो व्यक्ति असफलता से डरकर प्रयास छोड़ देता है, वह अपने संभावित भाग्य से स्वयं दूरी बना लेता है। परिश्रम का एक और महत्वपूर्ण पहलू है आत्मविश्वास। जब व्यक्ति जानता है कि उसने अपनी पूरी क्षमता से प्रयास किया है, तो उसके भीतर आत्मविश्वास उत्पन्न होता है। यही आत्मविश्वास उसे कठिन परिस्थितियों में भी टिके रहने की शक्ति देता है। और यही स्थिरता अंततः सफलता की ओर ले जाती है। भाग्य किसी चमत्कार की तरह नहीं, बल्कि निरंतर प्रयासों की परिणति के रूप में सामने आता है।
अंततः यह समझना आवश्यक है कि सितारे उसी के पक्ष में चमकते हैं जो जमीन पर पसीना बहाने को तैयार होता है। भाग्य कोई पका-पकाया फल नहीं है जो बिना प्रयास के मिल जाए। यह वह फसल है जिसे संघर्ष, अनुशासन और धैर्य से उगाया जाता है। यदि हम सचमुच जीवन में ऊँचाइयाँ छूना चाहते हैं, तो पहले स्वयं को तैयार करना होगा—ज्ञान से, कौशल से और निरंतर अभ्यास से।
इसलिए जब अगली बार किसी को सफल देखें, तो उसे केवल ‘भाग्यशाली’ कहने से पहले उसके संघर्ष को समझने की कोशिश करें। और यदि स्वयं सफलता की राह पर चलना चाहते हैं, तो भाग्य की प्रतीक्षा छोड़कर कर्म की राह पकड़ें। क्योंकि अंततः वही लोग इतिहास बनाते हैं, जो अपने हाथों की लकीरों से अधिक अपने हाथों के परिश्रम पर विश्वास करते हैं।
