“अग्निपथ नहीं, जनपथ” — लोकतंत्र की जनयात्रा का दस्तावेज़ और एक साधारण कार्यकर्ता की असाधारण राजनीतिक साधना
पुस्तक चर्चा-
“अग्निपथ नहीं, जनपथ” — लोकतंत्र की जनयात्रा का दस्तावेज़ और एक साधारण कार्यकर्ता की असाधारण राजनीतिक साधना
डॉ. सतीश पूनिया की पुस्तक विचार, संघर्ष और संवाद की उस यात्रा का लेखा-जोखा है, जो भारतीय लोकतंत्र की आत्मा को जीवंत करती है।
भीम प्रज्ञा न्यूज़@ दिलीप शर्मा, श्रीमाधोपुर
राजनीति में सक्रिय रहकर लेखन करना आसान नहीं होता। जनप्रतिनिधि या संगठन के जिम्मेदार कार्यकर्ता को समय प्रबंधन के बीच कुछ सार्थक लिखना सचमुच एक कठिन कार्य है। लेकिन इस कठिनाई को चुनौती दी है राजस्थान के वरिष्ठ भाजपा नेता और पूर्व प्रदेशाध्यक्ष डॉ. सतीश पूनिया ने।
उनकी हाल ही में प्रकाशित पुस्तक “अग्निपथ नहीं, जनपथ – संवाद से संघर्ष तक” न केवल उनके जीवन का सार है, बल्कि यह भारतीय लोकतंत्र की खूबसूरत जनयात्रा का जीवंत दस्तावेज़ भी है।
संघर्ष से सृजन तक की यात्रा
एक साधारण किसान परिवार में जन्मे डॉ. सतीश पूनिया का जीवन किसी राजनीतिक परिवार से नहीं, बल्कि संघर्ष और संगठन की मिट्टी से उगा है।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की विचारधारा से प्रेरित होकर उन्होंने अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) के कार्यकर्ता के रूप में अपने सार्वजनिक जीवन की शुरुआत की।
युवा, छात्र, किसान और आमजन के मुद्दों को लेकर उन्होंने सड़क से लेकर विधानसभा तक आवाज़ उठाई।
उनकी राजनीति किसी कुर्सी या पद की लालसा से नहीं, बल्कि जनसेवा की भावना और वैचारिक प्रतिबद्धता से प्रेरित रही है।
पुस्तक का मर्म – संवाद, संघर्ष और सरोकार
“अग्निपथ नहीं, जनपथ” में डॉ. पूनिया ने अपने चार दशकों की जनसंघर्ष यात्रा को लेखनी के माध्यम से सजीव किया है।
पुस्तक केवल आत्मकथा नहीं, बल्कि यह लोकतंत्र में विचारों की संवादशीलता और संघर्ष की गरिमा को दर्शाने वाला दर्पण है।
उन्होंने अपने लेखन में सत्ता की राजनीति से अधिक समाज के छोटे-छोटे सरोकारों को महत्व दिया है — किसान, छात्र, ग्रामीण जीवन, और आमजन की समस्याएं।
राजस्थानी भाषा की उपेक्षा पर प्रखर स्वर
डॉ. पूनिया ने पुस्तक में एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठाया है — राजस्थानी भाषा की उपेक्षा।
उन्होंने विधानसभा में शपथ ग्रहण के समय राजस्थानी भाषा में शपथ लेने की अनुमति मांगी थी, परंतु उसे यह कहकर अस्वीकार कर दिया गया कि “जब तक केंद्र सरकार से राजस्थानी को मान्यता नहीं मिलती, तब तक यह संभव नहीं।”
डॉ. पूनिया ने इसे छह करोड़ राजस्थानी भाषा भाषियों की पीड़ा का प्रश्न बताया और इस मुद्दे को राष्ट्रीय विमर्श तक पहुंचाने का प्रयास किया।
लोकतंत्र के महाकाव्य की प्रस्तावना
डॉ. पूनिया अपनी पुस्तक में लिखते हैं — “महाभारत और रामायण जैसे ग्रंथ भारत की सांस्कृतिक विरासत हैं, उसी तरह भारतीय लोकतंत्र में हमारा संविधान भी एक जीवंत महाकाव्य है।”
यह विचार उनके विराट वैचारिक दृष्टिकोण और लोकतंत्र के प्रति गहरी आस्था का प्रतीक है।
पुस्तक में पक्ष और विपक्ष — दोनों के नेताओं के विचारों का समावेश किया गया है, जो भारतीय लोकतंत्र की सर्वसमावेशी और संवादशील परंपरा को दर्शाता है।
विचारों से सजा दस्तावेज़
इस पुस्तक की प्रस्तावना राजस्थान विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष डॉ. सी.पी. जोशी ने लिखी है, जबकि भूमिका पंजाब के राज्यपाल एवं वरिष्ठ नेता गुलाबचंद कटारिया ने दी है।
पुस्तक में कोई फोटो नहीं है — केवल विचार हैं। और यही इसकी सबसे बड़ी ताकत है।
यह विचारों का दस्तावेज़ है, जो पाठक को सोचने और आत्ममंथन के लिए प्रेरित करता है।
नई पीढ़ी के लिए आवश्यक पाठ
यह पुस्तक न केवल राजनीतिक कार्यकर्ताओं के लिए, बल्कि पत्रकारिता और राजनीतिक विज्ञान के विद्यार्थियों के लिए भी अध्ययन का विषय है।
यह सिखाती है कि संवाद और संघर्ष — यही लोकतंत्र के दो सशक्त आधारस्तंभ हैं।
“अग्निपथ नहीं, जनपथ” इस बात का साक्ष्य है कि राजनीति में विचार, संवेदना और समाज के प्रति जिम्मेदारी कितनी गहराई से जुड़ी हो सकती है।
लोकतंत्र की जनयात्रा का मानवीय दस्तावेज़
डॉ. सतीश पूनिया की यह कृति हमें याद दिलाती है कि राजनीति केवल सत्ता का मार्ग नहीं — यह सेवा, संस्कार और संघर्ष का जनपथ है।
उनकी कलम से निकला यह विचारपथ हर उस व्यक्ति के लिए प्रेरणा है, जो जनजीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाना चाहता है।
“राजनीति अगर विचार की साधना है, तो यह पुस्तक उसका प्रामाणिक ग्रंथ है।”

