The true meaning of nobility: a balance of respect, affection, and culture.
संपादकीय@ Haresh Panwar, 13 Jan.2026
बड़प्पन का सही अर्थ : सम्मान, स्नेह और संस्कार का संतुलन
समाज में “बड़ा” शब्द का प्रयोग अक्सर उम्र, पद, धन या अधिकार के संदर्भ में किया जाता है, लेकिन वास्तविक बड़प्पन इन बाहरी पहचानों से कहीं आगे होता है। सच तो यह है कि बड़ा वही है जो बड़ों का सम्मान करे और छोटों को भी प्यार दे। यही कथन व्यक्ति के चरित्र, संस्कार और उसकी सच्ची परिपक्वता का दर्पण है। यह विचार केवल नैतिक उपदेश नहीं, बल्कि सामाजिक संतुलन और मानवीय मूल्यों की नींव है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।
भारतीय संस्कृति में बड़ों का सम्मान सदियों से जीवन का अनिवार्य हिस्सा रहा है। माता-पिता, गुरुजन, बुजुर्ग—इनसे प्राप्त अनुभव और मार्गदर्शन ही व्यक्ति को जीवन की कठिन राहों में सही दिशा दिखाता है। बड़ों का सम्मान करना दरअसल उनके अनुभवों का सम्मान करना है, उनके संघर्षों और त्याग को स्वीकार करना है। जिस समाज में बुजुर्गों को बोझ समझा जाने लगता है, वहां नैतिक पतन की शुरुआत हो जाती है। बड़ों के प्रति आदर केवल शिष्टाचार नहीं, बल्कि ज्ञान की निरंतरता का माध्यम है, जिससे पीढ़ियों के बीच संवाद बना रहता है।
लेकिन बड़प्पन का दूसरा और उतना ही महत्वपूर्ण पक्ष है—छोटों के प्रति प्यार, स्नेह और सम्मान। छोटों को केवल आदेश देने या नियंत्रित करने का भाव यदि किसी व्यक्ति में है, तो वह अधिकार तो जता सकता है, पर महान नहीं बन सकता। छोटों के प्रति स्नेह दिखाना, उन्हें समझना, उनकी गलतियों को धैर्य से सुधारना और उन्हें आगे बढ़ने के अवसर देना ही सच्चे बड़प्पन की पहचान है। जिस व्यक्ति के व्यवहार में करुणा और संवेदनशीलता होती है, वही समाज में सकारात्मक बदलाव ला सकता है।
आज के समय में, जब प्रतिस्पर्धा और अहंकार ने मानवीय रिश्तों को कमजोर कर दिया है, इस विचार की प्रासंगिकता और भी बढ़ जाती है। अक्सर देखा जाता है कि पद या शक्ति मिलते ही व्यक्ति अपने से छोटे लोगों को तुच्छ समझने लगता है। कार्यालयों में वरिष्ठ और कनिष्ठ के बीच बढ़ती दूरी, परिवारों में पीढ़ियों का टकराव और समाज में संवाद की कमी—ये सभी इसी मानसिकता का परिणाम हैं। यदि बड़े अपने बड़प्पन को व्यवहार में उतारें और छोटे भी सम्मान के साथ आगे बढ़ें, तो यह खाई स्वतः कम हो सकती है।
यह विचार समाज में सद्भाव और एकता को भी मजबूत करता है। जब बड़ों को सम्मान मिलता है, तो वे स्वयं को उपयोगी और सुरक्षित महसूस करते हैं। जब छोटों को प्यार और मार्गदर्शन मिलता है, तो उनमें आत्मविश्वास और जिम्मेदारी की भावना विकसित होती है। यही संतुलन एक स्वस्थ समाज की पहचान है, जहां अनुभव और ऊर्जा दोनों मिलकर प्रगति का मार्ग प्रशस्त करते हैं। बड़ों का अनुभव और छोटों का उत्साह—यदि दोनों में सामंजस्य हो जाए—तो समाज के सामने कोई भी चुनौती बड़ी नहीं रह जाती।
शिक्षा और संस्कारों की भूमिका यहां अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। परिवार, विद्यालय और समाज—तीनों का दायित्व है कि बच्चों में यह समझ विकसित करें कि सम्मान केवल उम्र देखकर नहीं, बल्कि व्यवहार से अर्जित किया जाता है। बच्चों को यह सिखाना जरूरी है कि बड़ों का सम्मान करना कमजोरी नहीं, बल्कि परिपक्वता का प्रतीक है। साथ ही, बड़ों को भी यह सीखने की आवश्यकता है कि छोटों की बात सुनना, उनके विचारों को महत्व देना और उन्हें आगे बढ़ने का अवसर देना उनके कद को और ऊंचा करता है।
इतिहास और समाज दोनों गवाह हैं कि वही व्यक्ति महान कहलाए हैं, जिनके आचरण में विनम्रता और करुणा रही है। चाहे वे राजा हों, संत हों या सामान्य नागरिक—उनका बड़प्पन उनके व्यवहार से पहचाना गया, न कि केवल उनके पद से। वास्तव में, जो व्यक्ति जितना बड़ा होता है, उसका व्यवहार उतना ही सरल और स्नेहपूर्ण होना चाहिए। यही सच्ची महानता है।
अंततः यह स्पष्ट है कि बड़प्पन का असली अर्थ उम्र, पद या अधिकार से नहीं, बल्कि सम्मान और प्रेम के संतुलन से तय होता है। बड़ा वही है, जो अपने बड़ों का आदर करे, उनके अनुभवों से सीखे और साथ ही छोटों को स्नेह, मार्गदर्शन और सम्मान दे। यही मानवीय मूल्यों की आत्मा है और यही हमारी संस्कृति की सच्ची पहचान। यदि हम इस विचार को केवल शब्दों तक सीमित न रखकर अपने व्यवहार में उतार लें, तो न केवल व्यक्ति, बल्कि पूरा समाज अधिक संतुलित, संवेदनशील और सशक्त बन सकता है।
भीम प्रज्ञा अलर्ट
जो व्यक्ति दूसरों को आगे बढ़ते देख मुस्कुरा सकता है, वही वास्तव में अंदर से समृद्ध और बड़ा होता है।
