मजबूत जड़ें, अडिग परिवार : जीवन की हर चुनौती का आधार
संपादकीय@HARESH PANWAR
मजबूत जड़ें, अडिग परिवार : जीवन की हर चुनौती का आधार
परिवार समाज की सबसे छोटी लेकिन सबसे सशक्त इकाई है। जिस प्रकार किसी वृक्ष की मजबूती उसकी ऊँचाई या फैलाव से नहीं, बल्कि उसकी जड़ों की गहराई और मजबूती से आंकी जाती है, उसी प्रकार किसी परिवार की वास्तविक शक्ति उसकी बाहरी संपन्नता में नहीं, बल्कि उसके मूल्यों, संस्कारों और आपसी समझ में निहित होती है। जिन परिवारों की जड़ें मजबूत होती हैं, वे समय के हर तूफान में चट्टान की तरह खड़े रहते हैं और न केवल स्वयं को बचाते हैं, बल्कि अपने सदस्यों को भी सुरक्षा, संबल और दिशा प्रदान करते हैं। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगी कि बोलता है।
आज के भौतिकवादी युग में सफलता को अक्सर धन, पद और सुविधाओं से जोड़ा जाता है। लोग यह मान लेते हैं कि बड़ा घर, महंगी गाड़ियाँ और बैंक बैलेंस ही जीवन की स्थिरता की गारंटी हैं। लेकिन इतिहास और वर्तमान दोनों ही इसके साक्षी हैं कि भौतिक संपत्तियाँ क्षणभंगुर होती हैं। आर्थिक संकट, बीमारी, सामाजिक अस्थिरता या व्यक्तिगत असफलता के समय वही परिवार टिक पाते हैं, जिनकी नींव आपसी प्रेम, विश्वास और त्याग पर टिकी होती है। संकट की घड़ी में धन साथ छोड़ सकता है, लेकिन परिवार का भावनात्मक सहारा मनुष्य को टूटने नहीं देता।
मजबूत पारिवारिक जड़ों का अर्थ है—एक-दूसरे को समझना, स्वीकार करना और सहारा देना। ऐसे परिवारों में मतभेद होते हुए भी मनभेद नहीं पनपते। संवाद की परंपरा होती है, जहाँ हर सदस्य अपनी बात कह सकता है और सुना जाता है। यही संवाद धीरे-धीरे विश्वास में बदलता है और विश्वास से जन्म लेती है वह सामूहिक शक्ति, जो कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी परिवार को बिखरने नहीं देती। जब परिवार एकजुट होता है, तो हर समस्या आधी रह जाती है।
संस्कारों की भूमिका भी यहाँ अत्यंत महत्वपूर्ण है। संस्कार केवल परंपराओं का बोझ नहीं होते, बल्कि वे जीवन जीने की दिशा देते हैं। बड़ों का सम्मान, छोटों के प्रति स्नेह, त्याग, सहनशीलता और जिम्मेदारी जैसे मूल्य परिवार को भीतर से मजबूत बनाते हैं। जिन बच्चों का पालन-पोषण ऐसे वातावरण में होता है, वे जीवन की चुनौतियों से डरते नहीं, बल्कि उनका सामना आत्मविश्वास के साथ करते हैं। परिवार ही पहला विद्यालय है, जहाँ से व्यक्ति का चरित्र और व्यक्तित्व गढ़ा जाता है।
आज जब एकल परिवारों की संख्या बढ़ रही है और संयुक्त परिवारों का स्वरूप सिमटता जा रहा है, तब पारिवारिक जड़ों की मजबूती और भी अधिक आवश्यक हो गई है। आधुनिक जीवन की तेज रफ्तार, प्रतिस्पर्धा और तकनीकी व्यस्तता ने रिश्तों के बीच दूरी बढ़ा दी है। परिवार के सदस्य एक ही छत के नीचे रहते हुए भी एक-दूसरे से भावनात्मक रूप से दूर होते जा रहे हैं। ऐसे में यदि हम समय रहते अपने संबंधों को सींचें नहीं, तो ये जड़ें कमजोर हो सकती हैं और पहला ही तूफान परिवार को हिला सकता है।
मजबूत परिवार केवल संकट झेलने की क्षमता ही नहीं देते, बल्कि वे व्यक्ति के संपूर्ण विकास में भी सहायक होते हैं। भावनात्मक सुरक्षा मिलने से व्यक्ति रचनात्मक बनता है, निर्णय लेने में सक्षम होता है और समाज में सकारात्मक भूमिका निभाता है। ऐसा परिवार अपने सदस्यों को केवल “जीवित” रहना नहीं सिखाता, बल्कि “सार्थक” जीवन जीने की प्रेरणा देता है। एक मजबूत परिवार से निकला व्यक्ति समाज को भी मजबूत बनाता है।
यह भी सच है कि परिवार की मजबूती किसी एक व्यक्ति की जिम्मेदारी नहीं होती। यह सामूहिक प्रयास का परिणाम है। माता-पिता का दायित्व है कि वे बच्चों को केवल सुविधाएँ ही न दें, बल्कि समय, संस्कार और मार्गदर्शन भी दें। वहीं बच्चों की भी जिम्मेदारी है कि वे बड़ों के अनुभव का सम्मान करें और परिवार की एकता को बनाए रखें। जब हर सदस्य “मैं” से ऊपर उठकर “हम” की भावना अपनाता है, तभी परिवार वास्तव में मजबूत बनता है।
अंततः कहा जा सकता है कि मजबूत पारिवारिक जड़ें जीवन की सबसे बड़ी पूंजी हैं। यह वह स्थायी धन है, जो न तो बाजार के उतार-चढ़ाव से प्रभावित होता है और न ही समय की मार से समाप्त होता है। जिस परिवार में एकता, प्रेम, त्याग और आपसी सहयोग होता है, वही परिवार हर चुनौती का सामना कर सकता है। ऐसे परिवार न केवल स्वयं अडिग रहते हैं, बल्कि समाज और राष्ट्र को भी स्थिरता और मजबूती प्रदान करते हैं। इसलिए आज की सबसे बड़ी आवश्यकता यही है कि हम अपनी पारिवारिक जड़ों को पहचानें, उन्हें सींचें और आने वाली पीढ़ियों के लिए उन्हें और मजबूत बनाएं।
भीम प्रज्ञा अलर्ट
जो व्यक्ति रिश्तों की जड़ों को सींचता है, वही जीवन के हर तूफ़ान में मजबूती से खड़ा रहता है।
