आग हर कोने में, भरोसे की राख में बदलती व्यवस्था
संपादकीय@Haresh Panwar
आग हर कोने में, भरोसे की राख में बदलती व्यवस्था
आग लगी है हर कोने में, हर सागर में तूफ़ान उठा है। कोई कोना बचा ही नहीं—यह पंक्तियां आज के भारत की भर्ती व्यवस्था पर सटीक बैठती हैं। जिस देश में युवा अपनी जवानी, अपनी नींद, अपने सपनों की कीमत चुकाकर प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करता है, उसी देश में उन्हीं परीक्षाओं को ठगी, दलाली और भ्रष्टाचार का अखाड़ा बना दिया गया है। यह केवल अंकों की हेराफेरी नहीं है, यह एक पूरी पीढ़ी के भविष्य से की जा रही खुली लूट है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।
भर्ती परीक्षाएं किसी भी लोकतंत्र की रीढ़ होती हैं। यही वह रास्ता है जिससे मेहनती, योग्य और ईमानदार युवा व्यवस्था में प्रवेश करते हैं। लेकिन जब इसी रास्ते पर दलाल, माफिया और भ्रष्ट कर्मचारी खड़े हो जाएं, तब चयन नहीं होता—तब सौदे होते हैं। ओएमआर शीट में नंबर बढ़ाए जाते हैं, फेल को पास बनाया जाता है और पास को सिस्टम की ठोकरों में कुचल दिया जाता है।
सोचकर डर लगता है कि कितने फर्जी लोग अब तक आराम से सरकारी कुर्सियों पर बैठ चुके होंगे। जिनके हाथ में कलम है, उनके पास योग्यता नहीं; जिनके पास अधिकार है, उनके पास नैतिकता नहीं। और दूसरी ओर एक ईमानदार अभ्यर्थी—जो रात-दिन मेहनत करता है—वह आज भी खुद को दोष देता है। वह सोचता है, “शायद मुझमें ही कमी रह गई होगी।” वह भगवान को कोसता है, किस्मत को गाली देता है, जबकि सच्चाई यह है कि उसकी हार उसकी नहीं, व्यवस्था की साजिश की देन है।
यह केवल भ्रष्टाचार नहीं, यह ईमानदारी, मेहनत और सपनों की हत्या है। जब कोई युवा सालों की तैयारी के बाद भी असफल हो जाता है और बाद में उसे पता चलता है कि उसकी जगह किसी ने पैसे देकर नौकरी हासिल कर ली—तो वह केवल असफल नहीं होता, वह भीतर से टूट जाता है। यही टूटन आगे चलकर अवसाद, गुस्से और व्यवस्था से घृणा में बदलती है। यही वह ज़हर है जो समाज की जड़ों में उतर रहा है।
भर्ती के नाम पर आज एक पूरा लूट का बाज़ार खड़ा है। कोचिंग माफिया, दलाल गिरोह, फर्जी सर्टिफिकेट बनाने वाले नेटवर्क और अंदर से मिलीभगत करने वाले कर्मचारी—सब मिलकर युवाओं की मजबूरी को भुनाते हैं। “पैसा है तो पास हो जाओ”, “सेटिंग है तो सिलेक्शन पक्का”—ये वाक्य अब कानाफूसी नहीं, खुलेआम प्रचार बन चुके हैं। यह उस व्यवस्था का सबसे बड़ा अपराध है जो संविधान की समानता की भावना को रौंद देता है।
विडंबना यह है कि हर घोटाले के बाद वही घिसी-पिटी घोषणा सुनाई देती है—“जांच के आदेश दे दिए गए हैं”, “दोषियों पर सख्त कार्रवाई होगी।” कुछ गिरफ्तारियां होती हैं, कुछ अखबारों की सुर्खियां बनती हैं, और फिर… सब शांत। सवाल वही रह जाता है—क्या ही होगा? यही सवाल सबसे ज़्यादा जलाता है, क्योंकि अनुभव बताता है कि अक्सर कुछ नहीं होता। बड़ी मछलियां बच निकलती हैं और छोटी मछलियों को दिखावे के लिए पकड़ लिया जाता है।
यह भी सच है कि भर्ती घोटालों का सबसे बड़ा शिकार ग्रामीण, गरीब और मध्यम वर्ग का युवा है। जिसके पास दलाल को देने के लिए लाखों नहीं, जिसके पास “सिस्टम” में पहुंच नहीं—उसके पास सिर्फ उसकी मेहनत होती है। और जब मेहनत को ही सिस्टम मार देता है, तब वह युवा या तो पलायन करता है या टूटकर चुप हो जाता है। यही चुप्पी आगे चलकर सामाजिक विस्फोट बन सकती है।
अब सवाल यह नहीं कि घोटाले हो रहे हैं या नहीं—सवाल यह है कि कब तक? कब तक युवाओं को परीक्षा के नाम पर ठगा जाएगा? कब तक भर्ती संस्थाएं भ्रष्टाचार की प्रयोगशाला बनी रहेंगी? और सबसे अहम—कब तक समाज इस अन्याय को “होता है” कहकर स्वीकार करता रहेगा?
समाधान भी हैं, अगर नीयत हो। परीक्षाओं की पूरी प्रक्रिया को तकनीकी रूप से पारदर्शी बनाना होगा। ओएमआर शीट से लेकर परिणाम तक हर चरण का स्वतंत्र ऑडिट होना चाहिए। दोषी चाहे कर्मचारी हो या अधिकारी—उसे केवल निलंबन नहीं, ऐसी सजा मिले कि वह उदाहरण बने। और सबसे ज़रूरी—भर्ती घोटालों को केवल आपराधिक मामला नहीं, युवाओं के भविष्य पर हमला मानकर देखा जाए।
आज ज़रूरत है चेतना की, आक्रोश की और संगठित आवाज़ की। क्योंकि अगर आज भी हम चुप रहे, तो कल यही आग हर घर तक पहुँचेगी। तब न कोई परीक्षा पवित्र बचेगी, न कोई सपना सुरक्षित। आग लगी है हर कोने में—अब यह हम पर है कि हम उसे बुझाने खड़े होते हैं या उसकी रोशनी में अगला घोटाला देखने की आदत डाल लेते हैं।
भीम प्रज्ञा अलर्ट
जो व्यवस्था मेहनत से नहीं, सौदे से चलने लगे,
वहां सपने नहीं टूटते—वहां भरोसा मर जाता है
