चमत्कार से आविष्कार तक : भारत के विकास की असली परीक्षा
संपादकीय@Haresh Panwar& 22jan.2026
चमत्कार से आविष्कार तक : भारत के विकास की असली परीक्षा
भारत की पहचान सदियों से ज्ञान, दर्शन, विज्ञान और आध्यात्मिक चेतना के केंद्र के रूप में रही है। नालंदा और तक्षशिला जैसे विश्वविद्यालयों ने दुनिया को तर्क, गणित, खगोलशास्त्र और चिकित्सा की दिशा दिखाई। आर्यभट्ट, चरक, सुश्रुत जैसे महान मनीषियों ने उस दौर में विज्ञान को आधार बनाकर मानव जीवन को बेहतर बनाने का प्रयास किया, जब दुनिया का बड़ा हिस्सा अंधकार में था। यह भारत की बौद्धिक विरासत की शक्ति थी। लेकिन विडंबना यह है कि आज, वैज्ञानिक उपलब्धियों के शिखर पर खड़े होने के बावजूद, हमारा समाज फिर से चमत्कारों और अंधविश्वासों की ओर आकर्षित होता दिखाई दे रहा है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।
एक ओर भारत का इसरो चंद्रयान जैसे मिशनों के माध्यम से अंतरिक्ष में इतिहास रच रहा है, वहीं दूसरी ओर देश के गांवों, कस्बों और यहां तक कि शहरों में भी चमत्कारिक बाबाओं, तांत्रिकों और कथित दिव्य शक्तियों के नाम पर भीड़ उमड़ रही है। विज्ञान प्रयोगशालाओं में तर्क, परीक्षण और परिश्रम से आगे बढ़ता है, जबकि चमत्कार का दावा बिना किसी प्रमाण के केवल आस्था और डर के सहारे खड़ा किया जाता है। यही अंतर हमारे समाज की सोच को दो ध्रुवों में बांट रहा है।
यह प्रश्न अत्यंत गंभीर है कि जब देश का युवा वैज्ञानिक बनने, तकनीक विकसित करने और नवाचार करने की क्षमता रखता है, तब वह चमत्कारों के मोहजाल में क्यों फंसता है? इसका उत्तर हमारी शिक्षा, सामाजिक सोच और मानसिक आलस्य में छिपा है। चमत्कार तुरंत परिणाम का लालच देता है, जबकि आविष्कार धैर्य, परिश्रम और असफलताओं से गुजरने की मांग करता है। दुर्भाग्यवश, हम त्वरित समाधान के आदी हो गए हैं, इसलिए मेहनत से अधिक चमत्कार पर भरोसा करने लगे हैं।
विडंबना तो यह है कि लोग जिस मोबाइल फोन पर चमत्कारों के वीडियो देखते हैं, वह स्वयं विज्ञान का एक अद्भुत आविष्कार है। इंटरनेट, सैटेलाइट, सॉफ्टवेयर और कृत्रिम बुद्धिमत्ता—इन सबके बिना वह “चमत्कारी वीडियो” अस्तित्व में ही नहीं आ सकता। लेकिन हम इस तथ्य को समझने के बजाय स्क्रीन पर दिखाई देने वाले भ्रम को ही सत्य मान लेते हैं। यह सोच हमारी वैज्ञानिक चेतना पर प्रश्नचिह्न लगाती है।
भारत इस समय परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है। यह वह समय है जब हमें अपनी सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत का सम्मान करते हुए, वैज्ञानिक दृष्टिकोण को जीवन का हिस्सा बनाना होगा। आस्था और विज्ञान को आमने-सामने खड़ा करना समाधान नहीं है, लेकिन यह भी स्वीकार करना होगा कि अंधविश्वास और चमत्कारों का अतिरेक राष्ट्र की प्रगति में सबसे बड़ी बाधा बन सकता है। आस्था का उद्देश्य मन को मजबूत करना है, जबकि अंधविश्वास मन को जकड़ देता है।
वैज्ञानिक सोच हमें सवाल पूछने की आज़ादी देती है। “क्यों” और “कैसे” पूछना किसी भी समाज को आगे बढ़ाता है। इसके विपरीत, चमत्कारों की संस्कृति सवालों को दबा देती है और तर्क को अपराध बना देती है। जब समाज सवाल पूछना छोड़ देता है, तब ठग, ढोंगी और पाखंडी उसका फायदा उठाने लगते हैं। इतिहास गवाह है कि जिन समाजों ने तर्क और विज्ञान को नकारा, वे धीरे-धीरे पिछड़ते चले गए।
इसरो की सफलता केवल एक वैज्ञानिक उपलब्धि नहीं है, बल्कि यह संदेश भी है कि मानव मस्तिष्क, अनुशासन और सामूहिक प्रयास से असंभव को संभव बनाया जा सकता है। चंद्रयान की सफलता किसी एक व्यक्ति का चमत्कार नहीं, बल्कि हजारों वैज्ञानिकों की वर्षों की मेहनत का परिणाम है। यही वह सोच है, जिसे समाज के हर स्तर तक पहुंचाने की आवश्यकता है।
आज जरूरत है कि शिक्षा व्यवस्था में वैज्ञानिक दृष्टिकोण को केवल पाठ्यक्रम तक सीमित न रखा जाए, बल्कि उसे जीवन मूल्यों से जोड़ा जाए। बच्चों को यह सिखाया जाए कि असफलता कोई अभिशाप नहीं, बल्कि सफलता की सीढ़ी है। जब युवा यह समझेगा कि उसकी मेहनत ही सबसे बड़ा चमत्कार है, तब वह किसी ढोंगी के पीछे नहीं भागेगा।
अंततः यह स्वीकार करना होगा कि भारत का भविष्य चमत्कारों की प्रतीक्षा में नहीं, बल्कि आविष्कारों की प्रयोगशालाओं में सुरक्षित है। जब हम ‘चमत्कार होगा’ की मानसिकता छोड़कर ‘हम करेंगे’ की सोच अपनाएंगे, तभी सच्चा विकास संभव होगा। सबसे बड़ा चमत्कार कोई बाबा या ताबीज नहीं, बल्कि मानव मस्तिष्क की रचनात्मक शक्ति है। यदि हम इसे पहचान लें, तो भारत न केवल आस्था का, बल्कि विज्ञान और नवाचार का भी विश्वगुरु बन सकता है।
