कथनी–करनी का फासला और विवाह समारोहों में बढ़ता नशे का चलन
संपादकीय@Haresh Panwar 23Jan.2026
कथनी–करनी का फासला और विवाह समारोहों में बढ़ता नशे का चलन
भारतीय समाज की सबसे बड़ी विशेषता यह रही है कि वह परंपराओं, मूल्यों और सामाजिक मर्यादाओं को पीढ़ी दर पीढ़ी सहेजता आया है। विवाह जैसे संस्कार को तो हमारे यहां केवल दो व्यक्तियों का नहीं, बल्कि दो परिवारों और दो संस्कृतियों का पवित्र मिलन माना गया है। लेकिन विडंबना यह है कि समय के साथ इस पवित्र संस्कार के स्वरूप में ऐसे तत्व घुसते चले गए हैं, जो न केवल इसके मूल भाव को विकृत कर रहे हैं, बल्कि समाज की कथनी और करनी के बीच गहराते अंतर को भी उजागर कर रहे हैं। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगी कि बोलता है।
आज लगभग हर व्यक्ति अपने निजी जीवन में मांस-मदिरा का सेवन करता है या उसे सामान्य मानता है। किंतु जब बात अपनी बेटी के विवाह की आती है, तो वही व्यक्ति यह अपेक्षा करता है कि होने वाला दामाद “खाता-पीता” न हो, अर्थात शराब, नशा और मादक पदार्थों से दूर रहने वाला हो। रिश्ते तय करते समय लड़के की आदतों की बाकायदा जांच-पड़ताल की जाती है—कहीं वह शराबी तो नहीं, कबाबी तो नहीं, किसी गलत संगत में तो नहीं। यह सावधानी स्वाभाविक भी है, क्योंकि हर माता-पिता अपनी बेटी का भविष्य सुरक्षित देखना चाहते हैं।
परंतु यही सावधानी और नैतिकता विवाह के अगले ही चरण में ढहती नजर आती है। लगन-टीका, सगाई और शादी के आयोजनों में शराब की पार्टी को लगभग अनिवार्य बना दिया गया है। दुल्हन के भाई द्वारा दूल्हे पक्ष से शराब की मांग, मेहमानों की “मनुहार” के नाम पर खुलेआम मदिरापान और इसे सामाजिक प्रतिष्ठा से जोड़ देना—यह सब हमारी सामाजिक संरचना के ताने-बाने में गहराई तक समा चुका है। जो परिवार इस व्यवस्था से असहज होता है या इससे दूरी बनाना चाहता है, उसे “कंजूस”, “रूढ़िवादी” या “मेहमाननवाजी न समझने वाला” करार दे दिया जाता है।
मलमास के बाद विवाह का मौसम शुरू होते ही यह दृश्य और भी स्पष्ट हो जाता है। विवाह पंडालों में भोजन की कतार से अधिक भीड़ अब अंधेरे कोनों में सजे अस्थायी बीयर बारों के पास दिखाई देती है। कहीं विधिवत व्यवस्था होती है, तो कहीं लोग गाड़ियों के बोनट पर सलाद, नमकीन, शराब की बोतलें और डिस्पोज़ल गिलास सजा लेते हैं। समारोह समाप्त होने के बाद गांवों के बाहर या रास्तों के किनारे बिखरी खाली बोतलें, रैपर और पानी की बोतलें न केवल गंदगी फैलाती हैं, बल्कि हमारी सामाजिक सोच की पोल भी खोलती हैं।
सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि इस माहौल में हमारी नौजवान पीढ़ी किस दिशा में जा रही है। लगन-टीका जैसे अवसरों पर नशे में धुत, लड़खड़ाते कदमों से चलते युवा केवल एक दृश्य नहीं, बल्कि भविष्य के प्रति एक चेतावनी हैं। जब समाज स्वयं ऐसे आयोजनों में नशे को प्रोत्साहन देता है, तो फिर युवाओं से संयम और अनुशासन की अपेक्षा कैसे की जा सकती है? यही कारण है कि कथनी और करनी के इस अंतर को देखकर नौजवान पीढ़ी भी दोहरे मानदंड सीख रही है—बोलने में आदर्श, निभाने में विपरीत।
यह स्थिति केवल नैतिक चिंता का विषय नहीं, बल्कि आर्थिक बोझ और सामाजिक दबाव का कारण भी बन चुकी है। शराब की “कंपलसरी” व्यवस्था ने विवाह को अनावश्यक रूप से महंगा बना दिया है। मध्यम और गरीब परिवार सामाजिक दबाव में कर्ज लेकर भी इन आयोजनों में शराब की व्यवस्था करते हैं, ताकि कहीं रिश्ते में खटास न आ जाए। विडंबना यह है कि अगर लगन-टीका में शराब की “परोसगिरी” में कोई कमी रह जाए, तो शिकायतें शुरू हो जाती हैं और रिश्तों में तनाव पैदा हो जाता है—मानो वर्षों की बातचीत, आपसी समझ और भावनात्मक जुड़ाव सब कुछ एक बोतल के आगे बौना पड़ गया हो।
इस पूरे परिदृश्य में शराब का चरित्र बड़ा विचित्र हो गया है—सीधे पियो तो शान, छिपकर पियो तो भी काम चल जाता है, और मना करो तो सामाजिक अपराधी बन जाओ। “वाह रे शराब के प्याले, तेरा भी काम निराला”—यह पंक्ति आज की सामाजिक सच्चाई पर करारा व्यंग्य बन चुकी है।
समाधान क्या है? सबसे पहले हमें अपने दोहरे मानदंडों को स्वीकार करना होगा। यदि हम सचमुच नशे को बुरा मानते हैं, तो उसे विवाह जैसे संस्कारों से बाहर करने का साहस भी दिखाना होगा। सामाजिक बदलाव किसी कानून से नहीं, बल्कि सामूहिक संकल्प से आता है। परिवारों को आगे बढ़कर यह तय करना होगा कि सम्मान, रिश्ते और मेहमाननवाजी का पैमाना शराब नहीं, बल्कि सादगी, आत्मीयता और संस्कार होंगे।
साथ ही, समाज के प्रबुद्ध वर्ग, धर्मगुरु, सामाजिक संगठन और मीडिया को भी इस विषय पर खुलकर चर्चा करनी चाहिए। जैसे दहेज के खिलाफ धीरे-धीरे चेतना बढ़ी है, वैसे ही विवाह समारोहों में नशे के अनिवार्य चलन पर भी सवाल उठाने होंगे। तभी हम आने वाली पीढ़ी को यह संदेश दे पाएंगे कि विवाह केवल दिखावे और नशे का उत्सव नहीं, बल्कि जीवन के दो रास्तों का जिम्मेदार और सम्मानजनक संगम है।
यदि आज हमने इस विरोधाभास पर आत्ममंथन नहीं किया, तो कल हमारी कथनी और करनी का यह फासला और गहरा होगा—और उसका खामियाजा समाज, परिवार और हमारी युवा पीढ़ी को चुकाना पड़ेगा।
भीम प्रज्ञा अलर्ट
जो समाज अपने संस्कारों को उत्सवों में खो देता है और चेतना को नशे में डुबो देता है,
वह आने वाली पीढ़ियों से भविष्य नहीं, केवल बहाने विरासत में छोड़ता है।
