संपादकीय@Haresh Panwar 28 jan 2026
छात्रवृत्ति की थाली, बंदरबांट का प्रसाद और लुटता भविष्य
छात्रवृत्ति आजकल किसी गरीब छात्र के खाते में नहीं, बल्कि सिस्टम के पेट में जाती है। यह वजीफा नहीं रहा, यह विकास का विटामिन बन चुका है—उनके लिए, जिनका विकास छात्र नहीं बल्कि छात्र के नाम पर पल रहा है। हालत यह है कि छात्रवृत्ति शब्द सुनते ही सबसे पहले कॉलेज संचालक की मुस्कान चौड़ी होती है, बिचौलिए की आंखें चमकती हैं और कुछ अधिकारियों की फाइलें अपने आप खुलने लगती हैं। छात्र? वह बेचारा तो केवल काग़ज़ों में मौजूद रहता है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।
आज छात्रवृत्ति एक ऐसी गाय बन चुकी है, जिसे गरीब बच्चा पालता है, लेकिन दूध रसूखदार निकाल ले जाते हैं। अनुसूचित जाति–जनजाति के नाम पर आने वाला यह पैसा समाज को ऊपर उठाने के लिए था, मगर वह नीचे बैठे गिरोहों की तिजोरी भरने का ज़रिया बन गया है। यह कोई छोटी-मोटी गड़बड़ी नहीं, बल्कि संगठित काला कारोबार है, जो खुलेआम शिक्षा व्यवस्था की नाक के नीचे फल-फूल रहा है।
परदा ज़रा उठाइए।
गरीब परिवार का बच्चा—पहली पीढ़ी का विद्यार्थी—जब कॉलेज का सपना लेकर शहर आता है, तो उसे सबसे पहले “सहयोगी” मिलते हैं। ये सहयोगी बड़े मीठे शब्दों में कहते हैं—कॉलेज आने की ज़रूरत नहीं, पास होने की गारंटी है, फीस की चिंता मत करो, सब छात्रवृत्ति से हो जाएगा। बच्चा क्या जाने कि यह गारंटी डिग्री की नहीं, लूट की है।
फिर शुरू होता है दस्तावेज़ों का खेल।
आधार, जाति प्रमाण पत्र, आय प्रमाण पत्र, एसएसओ आईडी, पासवर्ड, बैंक पासबुक, चेकबुक—सब कुछ “सुरक्षा” के नाम पर रख लिया जाता है। बच्चा सोचता है पढ़ाई शुरू हो गई, लेकिन असल में उसके नाम पर कमाई शुरू हो चुकी होती है। महंगे कोर्स में उसका दाखिला दिखाया जाता है, कॉलेज की फीस काग़ज़ों में कटती है, छात्रवृत्ति आती है और बच्चा सिर्फ़ इंतज़ार करता रह जाता है।
सबसे बड़ा तमाशा यह है कि कई कॉलेजों में न शिक्षक हैं, न छात्र, न कक्षाएं—लेकिन दाखिलों की संख्या देखकर लगता है जैसे ज्ञान का कुंभ मेला लगा हो। शिक्षा का स्तर शून्य, मगर डिग्रियों का स्टॉक भरपूर। यह शिक्षा नहीं, डिग्री मैन्युफैक्चरिंग यूनिट है, जहां ज्ञान की जरूरत नहीं, केवल जाति प्रमाण पत्र काफी है।
इस पूरे खेल में समाज कल्याण विभाग की भूमिका सबसे संदिग्ध है। सवाल उठता है—क्या अधिकारियों को कुछ दिखता नहीं? या फिर सब कुछ दिखते हुए भी आंखें बंद रखी गई हैं? जब पात्र विद्यार्थियों की छात्रवृत्ति महीनों से नहीं आती और अपात्र संस्थानों में करोड़ों की राशि खप जाती है, तो इसे लापरवाही नहीं, साझेदारी कहा जाएगा।
यह व्यवस्था इतनी निर्लज्ज हो चुकी है कि छात्र को खुद नहीं पता होता कि उसके नाम से किस कोर्स में दाखिला है। जब वह कभी गलती से किसी परीक्षा या फॉर्म में उस डिग्री का नाम भर देता है, तो उसकी अपनी ही सीबीटी (कॉमन बेसिक नॉलेज) जवाब दे जाती है। काग़ज़ पर पढ़ा-लिखा, हकीकत में ठगा हुआ—यही आज का छात्रवृत्ति उत्पाद है।
इस धांधली का सबसे घातक असर यह है कि वास्तविक जरूरतमंद बच्चे पढ़ाई छोड़ने को मजबूर हो रहे हैं। जिनके लिए यह योजना बनी थी, वे चाय की दुकान, खेत और मजदूरी में लौट रहे हैं, और जिनके लिए नहीं बनी थी, वे डिग्रियों का ढेर लगाकर प्रतियोगी परीक्षाओं की भीड़ बढ़ा रहे हैं। न उन्हें ज्ञान है, न कौशल—सिर्फ़ एक खोखला आत्मविश्वास।
यह केवल आर्थिक अपराध नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय के विचार की हत्या है। बाबासाहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर ने शिक्षा को शोषित समाज का सबसे बड़ा हथियार बताया था। आज उसी हथियार को जंग लगा दिया गया है, ताकि कुछ लोग बिना मेहनत अमीर बन सकें।
अब समय आ गया है कि इस काले कारोबार पर सीधा और तीखा प्रहार हो।
फर्जी दाखिलों पर तत्काल रोक, छात्र की वास्तविक उपस्थिति का सत्यापन, बायोमेट्रिक अटेंडेंस, कॉलेजों की स्वतंत्र ऑडिट, और दोषी अधिकारियों पर कठोर कार्रवाई—ये सब विकल्प नहीं, मजबूरी हैं। वरना छात्रवृत्ति की यह लूट एक पूरी पीढ़ी को डिग्रीधारी बेरोजगारों की कतार में खड़ा कर देगी।
अगर आज भी समाज चुप रहा, तो कल छात्रवृत्ति केवल इतिहास की किताबों में मिलेगी—एक ऐसी योजना के रूप में, जिसे गरीबों के नाम पर अमीरों ने खा लिया।
छात्रवृत्ति दया नहीं, अधिकार है, और अधिकार की लूट पर चुप रहना, अपराध में साझेदार बनना है।
भीम प्रज्ञा अलर्ट
जो समाज अपने बच्चों के अधिकारों को काग़ज़ों में बांट देता है, वह भविष्य में अपनी पीढ़ियों को केवल शिकायतें ही सौंप पाता है।
