77वाँ गणतंत्र दिवस : संविधान की अटल आस्था और लोकतंत्र की मजबूत आधारशिला
संपादकीय@Haresh Panwar 26jan.2026
77वाँ गणतंत्र दिवस : संविधान की अटल आस्था और लोकतंत्र की मजबूत आधारशिला
भारत आज 77वाँ गणतंत्र दिवस बड़े उत्साह, गौरव और आत्मविश्वास के साथ मना रहा है। यह अवसर केवल झंडा फहराने, परेड देखने या औपचारिक शुभकामनाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि आत्ममंथन का भी है—कि आज़ादी के बाद हमने क्या खाया, क्या पाया और क्या खोया। इन सवालों के बीच एक सत्य निर्विवाद रूप से सामने आता है कि यदि भारत आज भी एक सशक्त, संप्रभु और लोकतांत्रिक राष्ट्र के रूप में विश्व पटल पर खड़ा है, तो उसका सबसे बड़ा आधार भारत का संविधान है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।
स्वतंत्रता के बाद जब देश ने गणतंत्र का मार्ग चुना, तब परिस्थितियां आसान नहीं थीं। गरीबी, अशिक्षा, सामाजिक असमानता, जाति-धर्म के विभाजन और बाहरी-भीतरी षड्यंत्र—सब एक साथ चुनौती बनकर खड़े थे। ऐसे विषम हालात में भारत के संविधान ने लोकतंत्र की मजबूत नींव रखी। स्वतंत्रता, समानता, बंधुता और सामाजिक न्याय—ये केवल शब्द नहीं, बल्कि उस संवैधानिक दर्शन के स्तंभ हैं, जिसने विविधताओं से भरे भारत को एकता के सूत्र में बाँधे रखा।
भारत का संविधान केवल एक कानूनी दस्तावेज नहीं, बल्कि एक जीवंत सामाजिक अनुबंध है। यह विभिन्न भाषाओं, संस्कृतियों, धर्मों और परंपराओं को समाहित करते हुए “विविधताओं में एकता” की भावना को साकार करता है। यही कारण है कि अनेक वैश्विक लोकतंत्र जहाँ समय के साथ डगमगाए, वहीं भारत का लोकतांत्रिक ढांचा तमाम आंतरिक स्वार्थों और बाहरी दबावों के बावजूद अडिग रहा।
“रोम-रोम मिट गए जहाँ से, कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी”—यह पंक्ति भारत की संवैधानिक आत्मा पर सटीक बैठती है।
समय-समय पर कुछ जाति, धर्म या विचारधारा आधारित संगठन संविधान की मूल आत्मा—विशेषकर प्रस्तावना—पर प्रहार करने का प्रयास करते रहे हैं। लेकिन जब-जब लोकतंत्र की दिशा भटकी, संविधान ने उसे झकझोर कर सही राह पर लाने का काम किया। यही इसकी सबसे बड़ी ताकत है। भारत का संविधान किसी एक वर्ग या विचार का नहीं, बल्कि “हम भारत के लोग” की सामूहिक चेतना का प्रतिबिंब है।
इस ऐतिहासिक दस्तावेज़ के निर्माण में संविधान निर्माताओं का विवेक, दूरदर्शिता और सामाजिक संवेदनशीलता झलकती है। विशेषकर संविधान शिल्पी बाबासाहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर का योगदान देश के स्वाभिमान का सबसे बड़ा प्रतीक है। उन्होंने एक ऐसे संविधान की रचना की, जो केवल शासन व्यवस्था नहीं बताता, बल्कि समाज के सबसे कमजोर व्यक्ति को भी अधिकार और सम्मान देता है। उनके लिए संविधान सामाजिक क्रांति का माध्यम था, और आज भी है।
आज हमारी स्वतंत्रता और संप्रभुता सुरक्षित है, क्योंकि वह संविधान की मौलिक अधिकारों की आधारशिला पर टिकी हुई है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, समानता का अधिकार, धार्मिक स्वतंत्रता और संवैधानिक उपचार का अधिकार—ये अधिकार भारत के नागरिक को सशक्त बनाते हैं। इन्हीं अधिकारों की रक्षा के लिए हमारे लोकतंत्र के तीनों स्तंभ—कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका—एक-दूसरे को संतुलित और नियंत्रित करते हैं।
यदि कार्यपालिका या विधायिका से कोई चूक होती है, तो न्यायपालिका हस्तक्षेप कर नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करती है। और यदि कभी न्यायपालिका के निर्णयों से मौलिक अधिकारों पर आघात की आशंका होती है, तो विधायिका संवैधानिक संशोधन के माध्यम से संतुलन स्थापित करती है। यही संवैधानिक व्यवस्था भारत को एक सशक्त लोकतंत्र बनाती है।
निस्संदेह, लोकतंत्र की इस यात्रा में चुनौतियाँ कम नहीं रहीं। असमानता, बेरोजगारी, सामाजिक विद्वेष और संवैधानिक मूल्यों से भटकाव जैसे प्रश्न आज भी हमारे सामने हैं। लेकिन समाधान भी संविधान के भीतर ही है—उसकी भावना में, उसके मूल सिद्धांतों में। आवश्यकता केवल इतनी है कि हम संविधान को केवल किताब में नहीं, बल्कि अपने आचरण में उतारें।
77वें गणतंत्र दिवस पर यह संकल्प लेने का समय है कि हम संविधान की अटल आस्था को कमजोर नहीं होने देंगे। लोकतंत्र केवल सत्ता का खेल नहीं, बल्कि जिम्मेदार नागरिकता की परीक्षा है। जब नागरिक जागरूक होंगे, तभी संविधान जीवंत रहेगा।
भीम प्रज्ञा के समस्त पाठकों को 77वें गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ। आइए, हम सब मिलकर संविधान के प्रति अपने अटल विश्वास, अटल इरादों और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा का संकल्प लें—ताकि भारत की अखंडता, संप्रभुता और सामाजिक न्याय की भावना सदैव अक्षुण्ण बनी रहे।
जय संविधान, जय भारत।
भीम प्रज्ञा अलर्ट
संविधान किताब में लिखा हुआ कानून नहीं,
बल्कि रोज़मर्रा के आचरण में जिया जाने वाला संस्कार है—
जब व्यवहार बदलेगा, तभी व्यवस्था बदलेगी।

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