बजट 2026: न ढोल-नगाड़े, न पटाखे—फिर भी अर्थव्यवस्था की धड़कन तेज
संपादकीय@Haresh Panwar
बजट 2026: न ढोल-नगाड़े, न पटाखे—फिर भी अर्थव्यवस्था की धड़कन तेज
केंद्रीय बजट 2026 को अगर एक वाक्य में समेटा जाए, तो कहा जा सकता है—यह बजट मंच पर कम, फाइलों में ज़्यादा बोलता है। संसद में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण का भाषण न तो लोकलुभावन नारों से गूंजा, न ही किसी जादुई घोषणा से तालियां बटोरीं। लेकिन यही इसकी सबसे बड़ी खासियत भी है। यह बजट शोर से दूर, संख्याओं की गंभीर भाषा में देश को समझाने की कोशिश करता है कि अर्थव्यवस्था किसी चुनावी पोस्टर से नहीं, बल्कि अनुशासन से चलती है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलताहै।
राजकोषीय घाटे को जीडीपी के 4.4 प्रतिशत पर थामकर सरकार ने यह साफ कर दिया कि “खर्च करेंगे, लेकिन हिसाब से।” यह उस दौर में एक साहसिक बयान है, जब हर तरफ मुफ्त की घोषणाओं की होड़ लगी रहती है। बजट मानो कह रहा हो—“लोकतंत्र में लोकप्रिय होना जरूरी है, पर दिवालिया होना नहीं।” पूंजीगत व्यय को बढ़ाकर 12.5 लाख करोड़ रुपये करना इसी सोच का विस्तार है। सड़कें, रेलवे, डिजिटल ढांचा—ये सब चुनावी मंच पर भले उबाऊ लगें, लेकिन आने वाले दशकों की अर्थव्यवस्था इन्हीं पर दौड़ती है।
हालांकि, सवाल वही पुराना है—क्या ये सड़कें सिर्फ महानगरों को और चौड़ा करेंगी, या गांव तक भी पहुंचेंगी? क्या रेलवे के नए ट्रैक सिर्फ एक्सप्रेस ट्रेनों के लिए होंगे, या उस किसान के लिए भी, जो अपनी फसल मंडी तक पहुंचाने में आधी जिंदगी गंवा देता है? बजट का कागज तो भरोसा दिलाता है, पर जमीन पर उतरते-उतरते कई बार ये योजनाएं फाइलों में ही ‘विश्राम’ करने लगती हैं।
मध्यम वर्ग के लिए यह बजट राहत की चाय जैसा है—बहुत मीठी नहीं, पर सुकून देने वाली। मानक कटौती बढ़ी, कर स्लैब सरल हुए, शिक्षा ऋण और किराये पर कर बोझ घटा। सरकार ने पहली बार यह स्वीकार किया है कि करदाता केवल एटीएम मशीन नहीं, बल्कि विकास का साझेदार भी है। आयकर रिटर्न की समय सीमा बढ़ाना और कर कानून को सरल करने का वादा स्वागत योग्य है। लेकिन व्यंग्य यही है कि कानून भले सरल हो जाए, काउंटर पर बैठा बाबू अगर वही पुराना सवाल पूछे—“एक फॉर्म और लगा दीजिए”—तो सारी सरलता हवा हो जाती है।
कृषि क्षेत्र के लिए बजट ने सहानुभूति की भाषा बोली है। प्रधानमंत्री धन-धान्य योजना, फसल विविधीकरण, सिंचाई और भंडारण पर जोर—सब कुछ सही दिशा में है। मनरेगा, किसान क्रेडिट कार्ड और मत्स्य पालन पर फोकस ग्रामीण भारत की नब्ज पहचानने का संकेत देता है। लेकिन गांव का किसान आज भी यह पूछता है—“योजना मेरे खेत तक कब आएगी?” अगर लाभ वही किसान ले जाए जो पहले से संसाधन संपन्न है, तो फिर यह बजट भी आंकड़ों का खेल बनकर रह जाएगा।
महिला सशक्तीकरण के नाम पर बजट ने कई दरवाजे खोले हैं। स्वरोजगार ऋण, लक्ष्मी वंदना योजना, शहरी महिलाओं के लिए कर राहत—ये सब स्वागत योग्य कदम हैं। पंचायतों के लिए विशेष प्रावधान यह उम्मीद जगाते हैं कि महिला आरक्षण कागज से निकलकर निर्णय लेने की कुर्सी तक पहुंचे। हालांकि, व्यंग्य यह है कि कई पंचायतों में आज भी “सरपंच पति” लोकतंत्र का अनौपचारिक पद बने हुए हैं। बजट पैसा दे सकता है, लेकिन मानसिकता बदलने का बजट अभी बाकी है।
निजी निवेश को बुलाने के लिए सरकार ने रेड कार्पेट बिछा दी है—पीपीपी मॉडल, कर छूट, एकल खिड़की मंजूरी। संदेश साफ है—“निवेशक आइए, सिस्टम तैयार है।” लेकिन निवेशक तब आएगा, जब नीतियों के साथ स्थिरता और भरोसा भी दिखेगा। केवल घोषणाओं से नहीं, बल्कि समय पर मंजूरी और पारदर्शिता से।
कुल मिलाकर, बजट 2026 कोई रंगीन पोस्टर नहीं, बल्कि एक गंभीर लेखा-पुस्तक है। इसमें तंज यह है कि जो बजट सबसे कम तालियां बटोरता है, वही अक्सर सबसे ज्यादा असर छोड़ता है। यह बजट सपनों से ज्यादा संयम पर भरोसा करता है। अब असली परीक्षा सरकार की नहीं, व्यवस्था की है—क्या ये योजनाएं फाइलों से निकलकर खेत, फैक्ट्री और घर तक पहुंचेंगी? अगर हां, तो यह बजट इतिहास में ‘शांत लेकिन असरदार’ बजट के रूप में याद किया जाएगा। अगर नहीं, तो यह भी उन बजटों की कतार में खड़ा मिलेगा, जिन पर चर्चा तो बहुत हुई, पर बदलाव कम।
भीम प्रज्ञा अलर्ट
जो व्यक्ति वर्तमान में ईमानदारी से श्रम करता है, उसका भविष्य बहानों का मोहताज नहीं रहता।
