किताबें और समाज: ज्ञान से आगे जीवन का पाठ
संपादकीय@Haresh Panwar
किताबें और समाज: ज्ञान से आगे जीवन का पाठ
किताबें मनुष्य की सबसे पुरानी और विश्वसनीय गुरु रही हैं। वे हमें सभ्यता का इतिहास बताती हैं, विज्ञान की खोजों से परिचित कराती हैं, दर्शन के गूढ़ प्रश्नों से जूझना सिखाती हैं और यह भी समझाती हैं कि “इंसानियत सबसे बड़ा धर्म है।” स्कूल की कक्षाओं से लेकर विश्वविद्यालयों तक, ज्ञान की पहली सीढ़ी किताबों के सहारे ही चढ़ी जाती है। लेकिन जीवन की यात्रा में एक ऐसा मोड़ भी आता है, जहाँ किताबों से सीखा हुआ आदर्श ज्ञान अधूरा सा लगने लगता है और तब समाज स्वयं शिक्षक बनकर सामने खड़ा हो जाता है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।
किताबें हमें आदर्श दुनिया का चित्र दिखाती हैं—जहाँ सत्य की जीत होती है, न्याय सर्वोपरि होता है और मनुष्यता सर्वोच्च मूल्य होती है। पर समाज की वास्तविकता कई बार इन आदर्शों को कठोर प्रश्नों के घेरे में खड़ा कर देती है। यहाँ इंसानियत की कीमत समय, परिस्थिति और स्वार्थ के हिसाब से तय होती है। लोग अपने लहजे बदलते हैं, चेहरे पर मुखौटे चढ़ाते हैं और व्यवहार में वह सब सिखा जाते हैं, जो किसी पाठ्यक्रम का हिस्सा नहीं होता। एक मतलबी दोस्त, एक अवसरवादी रिश्तेदार या एक कठोर पड़ोसी हमें यह सिखा देता है कि दुनिया सिर्फ विचारों से नहीं, व्यवहार से चलती है।
शिक्षा के क्षेत्र में किताबों का महत्व निर्विवाद है। वे सही और गलत में फर्क करना सिखाती हैं, तर्क शक्ति विकसित करती हैं और मानसिक तनाव को कम करने में भी सहायक होती हैं। अध्ययन हमें अनुशासन, धैर्य और निरंतर सीखने की आदत देता है। लेकिन केवल किताबी ज्ञान अक्सर हमें जीवन की जमीनी सच्चाइयों के लिए पूरी तरह तैयार नहीं कर पाता। परीक्षा पास करने के बाद कई सबक धुंधले पड़ जाते हैं, पर समाज से मिली ठोकरें जीवन भर याद रहती हैं। वे रूह में उतर जाती हैं और व्यक्ति के सोचने, समझने और निर्णय लेने के तरीके को बदल देती हैं।
जीवन के अनुभव हमें सिखाते हैं कि हर मुस्कान के पीछे सच्चाई नहीं होती और हर मीठे शब्द में भलाई नहीं छुपी होती। समाज हमें “चेहरों के पीछे के चेहरे” पढ़ना सिखाता है। यह पाठ न तो किसी पुस्तकालय में मिलता है और न ही किसी डिग्री में दर्ज होता है। यह अनुभवों की आग में तपकर मिलता है। जब भरोसा टूटता है, जब मेहनत का फल तुरंत नहीं मिलता, जब ईमानदारी को मूर्खता समझा जाता है—तब इंसान किताबों से आगे सोचने लगता है।
इसका अर्थ यह नहीं कि किताबें व्यर्थ हैं या उनका महत्व कम है। बल्कि सच्चाई यह है कि किताबें दिशा देती हैं और समाज गति। किताबें हमें मूल्य सिखाती हैं और समाज उन मूल्यों की परीक्षा लेता है। यदि किताबें न हों, तो मनुष्य दिशाहीन हो जाएगा; और यदि अनुभव न हों, तो वही मनुष्य अपरिपक्व रह जाएगा। एक संतुलित जीवन के लिए दोनों का संगम आवश्यक है।
आज के समय में, जब सूचनाओं की बाढ़ है और सोशल मीडिया ज्ञान का भ्रम पैदा कर रहा है, तब किताबें हमें गहराई देती हैं और समाज हमें वास्तविकता से जोड़ता है। एक परिपक्व नागरिक वही है, जो किताबों से मिले आदर्शों को समाज की कठोर परिस्थितियों में भी यथासंभव निभाने का साहस रखता है, और समाज से मिले सबकों को अपनी मानवीय संवेदनाओं को मारे बिना आत्मसात कर लेता है।
अंततः यह कहना गलत नहीं होगा कि किताबें हमें इंसान बनना सिखाती हैं और समाज हमें इंसान बने रहना। ज्ञान और अनुभव के इस संतुलन में ही जीवन की वास्तविक समझ छिपी है। वही सबक सबसे गहरा होता है, जो समय, समाज और परिस्थितियाँ मिलकर सिखाती हैं—क्योंकि वह सिर्फ दिमाग में नहीं, सीधे आत्मा में दर्ज होता है।
भीम प्रज्ञा अलर्ट
जो व्यक्ति परिस्थितियों को दोष देने में ऊर्जा खर्च करता है, वह अवसर खो देता है; और जो परिस्थितियों से सीख लेकर आगे बढ़ता है, वही अपना भविष्य गढ़ता है।
