संपादकीय
“शिक्षा की रोशनी और गुलामी की जंजीरें: जागृति का वास्तविक अर्थ”
शिक्षा मनुष्य जीवन का वह प्रकाश है, जिसकी पहुँच जहाँ तक होती है, वहाँ तक अंधकार टिक नहीं पाता। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि आज भी समाज का बड़ा हिस्सा इस प्रकाश से पूरी तरह लाभ नहीं ले पा रहा। हमारे यहाँ शिक्षा को अक्सर केवल डिग्री, नौकरी या प्रतियोगी परीक्षाओं से जोड़कर देखा जाता है, जबकि शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य इससे कहीं व्यापक और गहरा है। शिक्षा वह शक्ति है, जो मनुष्य को अज्ञानता, गुलामी, कुरीतियों और मानसिक बंधनों से मुक्त करती है। यह विचार तब और अधिक सत्य दिखाई देता है, जब हम यह समझते हैं कि असली अंधकार बाहरी नहीं, बल्कि आंतरिक होता है — और उसका इलाज केवल शिक्षा ही कर सकती है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगी कि बोलता है।
जो व्यक्ति शिक्षा से वंचित रहता है, वह केवल अक्षरहीन नहीं होता; वह अपनी क्षमता, अधिकार और संभावनाओं से भी अनजान रहता है। वह दूसरों की बनाई सीमाओं में जीता है और उसे यह भी नहीं पता होता कि वह किन बंधनों में बँधा हुआ है। अज्ञानता केवल ज्ञान का अभाव नहीं, बल्कि आत्मविश्वास, स्वतंत्रता और आत्मसम्मान का भी अभाव है। ऐसे व्यक्ति के लिए शिक्षा एक संजीवनी है, जो उसके जीवन की दिशा ही नहीं, उसकी पहचान भी बदल देती है।
समाज में कई लोग ऐसे भी हैं, जो पढ़े-लिखे होने के बावजूद मानसिक गुलामी से मुक्त नहीं हो पाते। वे डिग्री तो ले आते हैं, लेकिन स्वतंत्र सोच, विवेक और न्याय-अन्याय की समझ विकसित नहीं कर पाते। ऐसे लोगों के लिए शिक्षा केवल एक प्रमाण पत्र भर बनकर रह जाती है। यही कारण है कि कहा जाता है—
“शिक्षा उस व्यक्ति के लिए सबसे अधिक सार्थक है, जो गुलामी और कुरीतियों की जंजीरों को तोड़ने की इच्छाशक्ति रखता हो।”
यदि व्यक्ति में संकल्प ही न हो, यदि वह सामाजिक कुरीतियों, रूढ़ियों, अंधविश्वासों और अन्याय की जंजीरों से मुक्त होने का साहस ही न जुटा सके, तो वह जीवन भर शिक्षित होकर भी अपने मन की कैद में कैद रहता है। शिक्षा का उद्देश्य केवल ज्ञान देना नहीं, बल्कि व्यक्ति को साहस, विवेक और स्वतंत्र चिंतन देना है।
इतिहास का हर वह अध्याय, जिसने समाज को जागृत किया, शिक्षा की शक्ति से ही Possible हुआ। चाहे इसे महात्मा फुले द्वारा महिलाओं और दलितों को शिक्षित करने का संघर्ष मानें, चाहे डॉ. भीमराव अंबेडकर द्वारा शिक्षा को मुक्ति का मंत्र बताना; चाहे बाबा साहब का वह कथन— “शिक्षित बनो, संगठित रहो, संघर्ष करो”— प्रत्येक बात यही बताती है कि शिक्षा ही वह हथियार है, जो व्यक्ति को सामाजिक और मानसिक गुलामी से मुक्त करता है।
गुलामी केवल विदेशी शासन का नाम नहीं; गुलामी वह स्थिति भी है, जब व्यक्ति अपनी सोच दूसरों की उँगलियों पर नाचते हुए जीता है। कुरीतियाँ, जातिगत बंधन, धार्मिक अंधविश्वास, दहेज प्रथा, भेदभाव — ये सब मानसिक गुलामी के रूप हैं। और इन बंधनों से मुक्ति पाने का रास्ता केवल शिक्षा की ओर जाता है। वही शिक्षा, जो केवल पुस्तकों में नहीं है, बल्कि जीवन दर्शन में है; वही शिक्षा, जो केवल पाठ्यपुस्तक नहीं, बल्कि मानवीय मूल्यों के विस्तार में है।
एक व्यक्ति जब शिक्षित होता है, तो वह समाज के शोषण, अन्याय और गलत प्रथाओं को पहचानने लगता है। उसकी नजरें बदलती हैं, सोच बदलती है और उसका आत्मविश्वास उसे सत्य व न्याय के पक्ष में खड़े होने की शक्ति देता है। इसीलिए शिक्षा केवल व्यक्तिगत विकास का माध्यम नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन का सबसे बड़ा हथियार है।
लेकिन एक गंभीर प्रश्न भी यहाँ उपस्थित होता है—
क्या आज की शिक्षा वाकई लोगों को मुक्ति की ओर ले जा रही है?
या केवल डिग्री, अंकों, प्रतियोगी परीक्षाओं और नौकरी तक सीमित होकर रह गई है?
आज की शिक्षा अक्सर व्यक्ति को रोजगार देती है, परंतु विचार नहीं देती। जानकारी देती है, परंतु चेतना नहीं देती। यही कारण है कि कई शिक्षित लोग भी कुरीतियों के समर्थक बन जाते हैं। वे सामाजिक अन्याय को देखकर भी मौन रहते हैं। यदि शिक्षा व्यक्ति को साहस नहीं दे पा रही, तो वह अधूरी शिक्षा है।
इसलिए हमें शिक्षा को केवल विद्यालय, कॉलेज या विश्वविद्यालय तक सीमित नहीं करना चाहिए। शिक्षा वह प्रक्रिया है, जो व्यक्ति की सोच बदलती है, उसके भीतर की जड़ता तोड़ती है और उसे स्वतंत्र विचार वाला मनुष्य बनाती है। समाज को बदलने की ताकत केवल उसी व्यक्ति के पास होती है, जो मानसिक गुलामी से मुक्त होता है।
अंततः यही कहा जा सकता है—
शिक्षा का वास्तविक अर्थ स्वतंत्रता है।
जो शिक्षित होकर भी मानसिक या सामाजिक गुलामी में है, वह शिक्षा के सार से अभी बहुत दूर है।
शिक्षा केवल एक डिग्री नहीं, बल्कि एक क्रांति है;
एक जागृति है;
एक वह चिंगारी है, जो व्यक्ति के भीतर छिपे प्रकाश को बाहर लाती है।
और वही प्रकाश न सिर्फ व्यक्ति को, बल्कि पूरे समाज को दिशा देता है।

