संपादकीय@एडवोकेट हरेश पंवार
“दिखावे से परे: बेरोजगारी उन्मूलन की दिशा में ‘रोजगार गारंटी वाली शादी’ का सामाजिक संकल्प”
समाज के बदलते स्वरूप में विवाह अब केवल दो व्यक्तियों का मिलन भर नहीं रह गया है, बल्कि वह एक आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक प्रदर्शन का अखाड़ा बन चुका है। आज शादी एक ऐसा आयोजन बन गया है जिसमें भावनाओं की जगह दिखावे का अंबार है, जहाँ लाखों रुपये खर्च कर बारातों की धूम, डीजे की गड़गड़ाहट और महंगे आभूषणों की चमक को ही प्रतिष्ठा का प्रतीक माना जाने लगा है। परंतु प्रश्न यह उठता है कि क्या यह दिखावा उस नवदंपति के लिए किसी स्थायी सुरक्षा का आधार बन पाता है? क्या यह खर्चे उनके जीवन को स्थिरता, आत्मनिर्भरता और सम्मानजनक जीवन दे पाते हैं? यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।
वास्तविकता यह है कि समाज का बड़ा तबका आज भी बेरोजगारी और आर्थिक असुरक्षा की मार झेल रहा है। युवक-युवतियाँ पढ़-लिखकर भी रोजगार से वंचित हैं। ऐसे में विवाह उनके जीवन का नया अध्याय नहीं, बल्कि कई बार संघर्ष का नया मोर्चा बन जाता है। विवाह के बाद आर्थिक अस्थिरता, मानसिक तनाव और सामाजिक अपेक्षाएँ मिलकर दांपत्य जीवन को बोझिल बना देती हैं। नतीजा यह होता है कि बहुत-सी शादियाँ शुरुआत के कुछ वर्षों में ही टूटने की कगार पर पहुँच जाती हैं।
यही वह बिंदु है जहाँ समाज को गंभीर आत्ममंथन की आवश्यकता है। क्यों न हम परंपरागत विवाह की दिशा बदलें और “रोजगार गारंटी वाली शादी” की अवधारणा को अपनाएँ? सोचिए, यदि समाज में यह परंपरा स्थापित हो जाए कि बेरोजगार युवक-युवती की शादी से पहले दोनों पक्ष मिलकर नवदंपति के लिए एक स्थायी रोजगार या व्यवसाय की गारंटी करें, तो यह न केवल आर्थिक स्थिरता देगा बल्कि आत्मसम्मान और आत्मनिर्भरता की भावना को भी प्रोत्साहित करेगा।
आज एक औसत शादी में दस लाख रुपये तक खर्च हो जाते हैं। यह खर्च सजावट, खान-पान, आभूषण और अन्य औपचारिकताओं में बह जाता है। यही धन यदि दोनों पक्ष पाँच-पाँच लाख के पूंजी निवेश के रूप में नवदंपति के नाम कर दें और उन्हें उनके कौशल के अनुसार व्यवसाय प्रारंभ करने के लिए प्रेरित करें, तो वे जीवनभर आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर रह सकते हैं। एक छोटी दुकान, सर्विस सेंटर, ब्यूटी पार्लर, डेयरी, कोचिंग क्लास या कोई भी स्वरोजगार का माध्यम उनके जीवन की नई नींव बन सकता है।
यह न केवल एक नवाचार होगा, बल्कि एक सामाजिक क्रांति की शुरुआत भी। कल्पना कीजिए, यदि हर विवाह समारोह किसी नए रोजगार की शुरुआत का प्रतीक बन जाए, तो यह परंपरा कितनी परिवर्तनकारी होगी। समाज की ऊर्जा, जो आज दिखावे और प्रतिस्पर्धा में बर्बाद हो रही है, वह रचनात्मक दिशा में प्रवाहित होगी।
दुर्भाग्य से, वर्तमान समय में “क्या कहेंगे लोग” का भय हमारी सोच पर भारी है। समाज का बड़ा वर्ग आज भी शादी को प्रतिष्ठा की प्रतियोगिता बना चुका है। बड़े पंडाल, सैकड़ों मेहमान, डीजे, दावतें और शराब जैसी अनावश्यक गतिविधियाँ सामाजिक रोग का रूप ले चुकी हैं। लोग लाखों रुपये पटाखों में उड़ा देते हैं, मगर जब वही दामाद या बहू बेरोजगार होते हैं, तो समाज चुप रहता है। क्या यह विडंबना नहीं कि विवाह के नाम पर खर्चीले दिखावे को तो प्रतिष्ठा माना जाता है, लेकिन किसी नवदंपति को रोजगार के लिए सहायता देना “कम दर्जे” का काम समझा जाता है?
अब समय आ गया है कि समाज इस मानसिकता से ऊपर उठे। “रोजगार गारंटी वाली शादी” केवल आर्थिक पहल नहीं है, यह सामाजिक उत्तरदायित्व की एक नई परिभाषा है। यह पहल एक ऐसा वातावरण बनाएगी जिसमें रिश्ते केवल पद या वेतन के आधार पर नहीं, बल्कि कर्मठता, योग्यता और आत्मनिर्भरता के आधार पर तय होंगे। यह विवाह संस्था को वास्तविक अर्थों में सामाजिक निर्माण का माध्यम बनाएगी, न कि दिखावे की दौड़ का मंच।
यदि विवाह से पहले ही युवक-युवती की कौशल पहचान की जाए और उन्हें प्रशिक्षण या उद्यमिता की दिशा में मार्गदर्शन दिया जाए, तो वे शादी के बाद दूसरों पर निर्भर रहने के बजाय खुद अपने पैरों पर खड़े हो सकेंगे। इस दिशा में सरकारें भी “स्किल इंडिया”, “स्टार्टअप इंडिया” जैसे अभियानों को आगे बढ़ा रही हैं, लेकिन इन योजनाओं को तभी सार्थक बनाया जा सकता है जब समाज खुद भी इसे अपनाए।
हमारी सामाजिक जिम्मेदारी यह होनी चाहिए कि हम नवदंपति को एक सशक्त भविष्य दें — ऐसा भविष्य जो आत्मनिर्भरता पर आधारित हो। क्योंकि जीवन में आर्थिक स्थिरता ही वैवाहिक स्थिरता की सबसे मजबूत नींव है। जिन परिवारों में आज भी रोज़गार की कमी के कारण संघर्ष बढ़ रहे हैं, वहाँ केवल संस्कार नहीं, सशक्तिकरण की आवश्यकता है।
शादी को यदि सच में “नए जीवन की शुरुआत” कहा जाए, तो क्यों न इस शुरुआत को रोजगार की गारंटी के साथ जोड़ा जाए? विवाह का मंच केवल फूलों, गीतों और सजावट का नहीं, बल्कि नव-निर्माण और आत्मनिर्भर भारत की दिशा में समाज के योगदान का प्रतीक बने।
आज का युग डिजिटल है, लेकिन हमारी सोच अभी भी परंपराओं की जंजीरों में बंधी है। यह लेख एक आह्वान है — समाज के हर वर्ग, हर माता-पिता, हर युवक-युवती से — कि वे इस नई सोच को अपनाएँ। आभूषण की चमक नहीं, आत्मनिर्भरता की दमक समाज की पहचान बने।
क्योंकि जब एक शादी रोजगार की गारंटी देती है, तब वह केवल दो व्यक्तियों का मिलन नहीं, बल्कि दो आत्मनिर्भर जीवनों का निर्माण करती है — और यही सच्चे अर्थों में सामाजिक सुरक्षा की सबसे सुंदर परंपरा होगी।
भीम प्रज्ञा अलर्ट
“जो व्यक्ति परिस्थितियों से हारकर बैठ जाता है, वह अपने भीतर छिपी शक्ति को कभी जान नहीं पाता;
और जो व्यक्ति संघर्षों को सीढ़ी बनाकर उठ खड़ा होता है, वही अपने भाग्य का निर्माता बनता है।”
