संपादकीय@एडवोकेट हरेश पंवार
आज के दौर में प्रगति और आधुनिकता के नाम पर एक अजीब-सा सामाजिक दबाव हर वर्ग के व्यक्ति पर हावी होता जा रहा है। किसान हो, मजदूर हो, छोटा दुकानदार हो या कोई भी सामान्य व्यक्ति—हर कोई अपने वास्तविक आर्थिक स्तर को दरकिनार कर समाज में “कुछ दिखने” की अनदेखी प्रतियोगिता में शामिल हो चुका है। घर में सोफा, एसी, फ्रिज, टीवी, मोटरसाइकिल—ये सब अब जीवन की प्राथमिक आवश्यकताओं के रूप में नहीं, बल्कि सामाजिक प्रतिष्ठा की अनिवार्य निशानी के रूप में देखे जाने लगे हैं। परिणाम यह हुआ है कि लोग अपनी आय, हैसियत और वास्तविक जरूरतों से बढ़कर खर्च करने को मजबूर हो रहे हैं। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।
दिखावे की इस होड़ में आज आम आदमी सबसे आसान रास्ता चुनता है—कर्ज़ लेना। ईएमआई की सुविधा ने एक मध्यम या निम्न आय वाले परिवार को भी उच्च लागत वाली चीजें खरीदने में सक्षम तो कर दिया है, परंतु उसके साथ-साथ जिस आर्थिक दबाव को जन्म दिया है, उसका बोझ वर्ष-दर-वर्ष बढ़ता जा रहा है। यह कर्ज़ शुरुआत में आसान विकल्प लगता है, लेकिन जैसे-जैसे मासिक किस्तों का चक्र चलता है, वास्तविकता सामने आ जाती है। आय सीमित है, खर्च बढ़ते जा रहे हैं, और दिखावे का गर्त मनुष्य को धीरे-धीरे अंदर से खा जाता है।
समस्या सिर्फ वस्तु खरीदने तक सीमित नहीं है, यह “तुलना” और “प्रतिस्पर्धा” पर टिकी एक मानसिकता का परिणाम है। गांवों में, कस्बों में और शहरों में—हर जगह लोगों के मन में यह सवाल लगातार घर कर चुका है कि “दूसरों के घर क्या है, मेरे पास क्यों नहीं?” यह सामाजिक तुलना जैसे ही इंसान के मन में जड़ें जमाती है, वह अपनी वास्तविक जरूरतों को भूलकर सिर्फ दिखावे में खुद को झोंक देने लगता है।
किसान के पास यदि मूलभूत कृषि साधन, अनाज रखने की व्यवस्था, पानी की व्यवस्था, गाय-भैंसों के लिए चारा और खुद के परिवार की सुरक्षा सुनिश्चित करने का साधन भी नहीं है, फिर भी वह कर्ज़ उठाकर महंगे मोबाइल, बाइक या फर्नीचर खरीदता है तो यह आर्थिक विवेक नहीं, बल्कि सामाजिक दबाव का परिणाम है। मजदूर—जो रोज़ की मेहनत से पेट पालता है—वह भी आज एसी, महंगे फोन और किस्तों पर खरीदे गए वाहनों के बोझ में दबता जा रहा है।
समाज की यह बदली मानसिकता एक खतरनाक दिशा में ले जा रही है। सबसे बड़ी विडंबना यह है कि ये सुविधाएँ पहली नज़र में सुख देती हैं, लेकिन धीरे-धीरे तनाव, चिंता और जीवन की वास्तविक खुशियों को चूस लेती हैं। आय सीमित है, लेकिन खर्च बढ़ता जा रहा है—यह समीकरण जीवन की स्थिरता को तोड़ देता है।
कर्ज़ की किस्तें समय पर देना कठिन हो जाता है। किस्तें छूटने पर ब्याज बढ़ता है, तनाव बढ़ता है, घर-परिवार में झगड़े बढ़ते हैं, रिश्तों में खटास आती है। धीरे-धीरे व्यक्ति मानसिक रूप से टूटने लगता है और उसे समझ ही नहीं आता कि वह किस चक्रव्यूह में फँस गया है। कर्ज़ का जाल ऐसा है, जिसमें एक बार फंसने के बाद बाहर निकलना मुश्किल हो जाता है।
ऐसी स्थिति में दो चीजें विशेष रूप से ध्यान देने योग्य हैं—
पहली, वास्तविक आवश्यकता बनाम दिखावे की आवश्यकता का अंतर समझना।
दूसरी, समाज के दबाव से मुक्त होकर जीवन जीने की कला सीखना।
“सादा जीवन–उच्च विचार” केवल कहावत भर नहीं है, बल्कि जीवन का सबसे सशक्त सिद्धांत है। जिसकी जरूरतें कम हैं, वही वास्तव में सबसे अधिक स्वतंत्र है। जरूरतें बढ़ते ही इंसान की स्वतंत्रता समाप्त हो जाती है, और वह कर्ज़, तुलना और दिखावे के बोझ तले दब जाता है।
हमारे पूर्वजों ने हमेशा सादगी को गुण माना। कम में भी सुखी रहने की कला ही जीवन की असल समृद्धि है, लेकिन आज समाज में समृद्धि का पैमाना बदल चुका है। महंगी गाड़ी, शानदार घर, महंगे कपड़े और इलेक्ट्रॉनिक उपकरण—इन्हें ही सफलता, प्रतिष्ठा और सम्मान का मानक बना दिया गया है। इसी भ्रम में लोग अपनी वास्तविकता भूल बैठे हैं।
समाज में एक नया संवाद आवश्यक है—ऐसा संवाद जो लोगों को दिखावे से अधिक वास्तविक जीवन पर ध्यान केंद्रित करने के लिए प्रेरित करे। यह जागरूकता जरूरी है कि महंगे साधन सुविधा देते हैं, परंतु सुख नहीं। सुख संतोष में है, और संतोष सादगी से मिलता है, प्रदर्शन से नहीं।
आज आवश्यकता है कि हर व्यक्ति आत्ममंथन करे—
• क्या मेरी खरीदी गई वस्तु मेरी वास्तविक आवश्यकता है या सामाजिक दबाव का परिणाम?
• क्या मैं अपनी वर्तमान आय पर आधारित जीवन जी रहा हूँ या दूसरों जैसा दिखने की कोशिश कर रहा हूँ?
• क्या मेरी खुशी वस्तुओं पर निर्भर है या जीवन की सरलता और मानसिक शांति पर?
यह प्रश्न केवल आर्थिक विवेक के नहीं, जीवन के दर्शन के प्रश्न हैं। यदि समाज इन प्रश्नों के उत्तर ईमानदारी से खोज ले, तो न केवल कर्ज़ के संकट से मुक्ति मिलेगी, बल्कि जीवन अधिक सरल, स्वस्थ और तनावमुक्त हो सकेगा।
अंततः, हमें यह समझना होगा कि दिखावा क्षणिक है, परंतु उसके बदले मिलने वाला तनाव स्थायी। असल प्रतिष्ठा हमारे चरित्र, कर्म और जीवन की सादगी में है—न कि उन चीजों में जो हम दुनिया को दिखाने के लिए खरीदते हैं। समय आ गया है कि समाज दिखावे की दौड़ से बाहर निकले और विवेकपूर्ण जीवनशैली अपनाए।
सादा जीवन—आर्थिक स्वतंत्रता—मानसिक शांति : यही वास्तविक समृद्धि है।
भीम प्रज्ञा अलर्ट
“जिस दिन इंसान अपनी जरूरतों और इच्छाओं का फर्क समझ लेता है, उसी दिन उसके जीवन से तनाव, तुलना और दिखावे की बीमारी हमेशा के लिए समाप्त हो जाती है।”