संपादकीय@एडवोकेट हरेश पंवार
❝सच का घूंट कड़वा सही… पर यही इंसान और समाज को जिंदा रखता है❞
आज के समय में सच बोलना और सच सुनना—दोनों ही दुर्लभ होते जा रहे हैं। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि “सच का घूंट बहुत कड़वा होता है, अब तो बोलने और सुनने वाले दोनों ही कम रह गए।” यह पंक्ति केवल एक कथन नहीं, बल्कि हमारे सामाजिक और मनोवैज्ञानिक चरित्र का दर्पण है, जिसमें हमारी कमजोरियाँ, हमारी हिचक और हमारी बदलती संवेदनाएँ स्पष्ट दिखाई देती हैं। जब समाज में सच बोलने वाले कम हो जाएँ और सच सुनने वाले उससे भी कम, तब समझ लीजिए कि कहीं न कहीं हमारे भीतर साहस और संवेदनशीलता दोनों क्षीण हो रहे हैं। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।
सच बोलना आसान नहीं होता। सच अक्सर चुभता है, चोट देता है, और हमारे भीतर छिपे अहंकार, भ्रम और दिखावे की परतें उधेड़ कर रख देता है। यही कारण है कि लोग मीठे झूठ को सच की कटुता पर वरीयता देते हैं। झूठ भले भ्रमित करे पर सुकून देता है, जबकि सच भले रास्ता दिखाए पर बेचैन भी करता है। आज परिवारों में, दफ्तरों में, राजनीति में, समाज में—हर जगह लोग सच से बचने की कोशिश करते दिखते हैं। क्योंकि सच सुनना आत्मावलोकन की मांग करता है और आत्मावलोकन का अर्थ है अपने दोषों से सामना करना। यह सामना असहज करने वाला होता है, इसलिए लोग उससे दूर भागते हैं।
यह प्रवृत्ति केवल व्यक्ति की कमजोरी नहीं, बल्कि समाज की भी बड़ी विफलता है। जब समाज सच बोलने वालों को ताने, कटाक्ष या बहिष्कार देता है, तो धीरे-धीरे सच कहने वाले लोग मौन हो जाते हैं। एक सत्यवक्ता व्यक्ति बार-बार उपहास और विरोध झेलते हुए अंततः निराश हो जाता है और सोचने लगता है—“सच कहना किसके लिए और क्यों?” यह चुप्पी समाज के लिए सबसे बड़ा खतरा है। क्योंकि जहाँ सच मर जाता है, वहाँ झूठ व्यवस्था बन जाता है। जहाँ लोग कड़वी सच्चाई से बचने लगते हैं, वहाँ सजावट, दिखावा और भ्रम ही नीति का आधार बन जाते हैं।
आज की पीढ़ी भी इस कड़वे सच का शिकार है। वे सच सुनना चाहती तो हैं, पर जब सच उनके आराम या आदतों या सुविधा पर चोट करता है तो वे असहज हो उठते हैं। यही कारण है कि रिश्तों में संवाद घटता जा रहा है, दोस्ती केवल दिखावे की रह गई है, और लोग सोशल मीडिया पर अपनी मनगढंत छवि चमकाने में मशगूल हैं। सच्चाई से अधिक महत्वपूर्ण ‘इमेज’ बन गई है। हर कोई खुद को सही और दूसरों को गलत साबित करने में उलझा है। सच सुनने का सामर्थ्य, आत्म सुधार की प्रवृत्ति और अपने दोषों की पहचान—ये सभी गुण क्षीण होते दिख रहे हैं।
लेकिन प्रश्न यह है कि ऐसा क्यों हो रहा है?
दरअसल सच सुनने के लिए जिस परिपक्वता, धैर्य और विनम्रता की आवश्यकता होती है, वह धीरे-धीरे कम होती जा रही है। लोगों के भीतर संवेदनाएँ नाजुक हो गई हैं, आलोचना की क्षमता कमजोर हो गई है, और मन इतना नर्म पड़ गया है कि थोड़ी सी असहमति भी तूफान बन जाती है। लोग कम सहनशील हो गए हैं, जबकि सच सबसे पहले धैर्य और सहनशीलता की परीक्षा लेता है। सच वही सुन सकता है, जिसके भीतर आत्मस्वीकृति की क्षमता हो, और सच वही बोल सकता है, जिसके भीतर निर्मलता और साहस हो।
यही कारण है कि आज समाज में झूठे आश्वासन, चापलूसी और मीठी-मीठी बातें खूब बिक रही हैं। कोई भी यह स्वीकार नहीं करना चाहता कि गलतियाँ उससे भी हो सकती हैं। परिणामस्वरूप लोग अपने-अपने भ्रमों में जी रहे हैं और धीरे-धीरे सत्य से दूरी बढ़ाते जा रहे हैं। यह स्थिति अत्यंत चिंताजनक है। क्योंकि जहाँ सच नहीं होता वहाँ न्याय नहीं होता, और जहाँ न्याय नहीं होता वहां विश्वास टूट जाता है। समाज सत्य पर नहीं, विश्वास पर चलता है—और विश्वास केवल सच की जमीन पर ही पनप सकता है।
इसलिए आवश्यकता इस बात की है कि हम सच बोलने और सच सुनने की संस्कृति को पुनर्जीवित करें। यह तभी संभव है जब हम स्वयं से शुरुआत करें। यदि हम सच बोलेंगे—बिना कटुता के, बिना अहंकार के और बिना चोट पहुँचाए—तो यह समाज के भीतर एक नई जागरूकता को जन्म देगा। और यदि हम सच सुनने का अभ्यास करेंगे—बिना क्रोध के, बिना तर्क-वितर्क के और बिना मन में बाधा पैदा किए—तो हमारा व्यक्तित्व और अधिक परिष्कृत होगा।
सच का घूंट चाहे जितना कड़वा हो, पर वह व्यक्ति को भीतर से मजबूत बनाता है। सच देखने की दृष्टि और सच को स्वीकार करने का साहस वही लोग रखते हैं जो अपने भीतर विकास और सुधार की क्षमता को जीवित रखते हैं। इसलिए आज आवश्यकता इस बात की है कि हम सच से भागें नहीं… बल्कि उसका सामना करें। क्योंकि यही सच हमें बेहतर इंसान बनाता है, रिश्तों को पारदर्शी रखता है, समाज को स्वस्थ बनाता है और राष्ट्र को मजबूत बनाता है।
जिस दिन लोग सच बोलने और सच सुनने का साहस जुटा लेंगे, उस दिन समाज की आधी बीमारियाँ खुद ही समाप्त हो जाएंगी।
भीम प्रज्ञा अलर्ट
“जीवन में असली ताकत इस बात में नहीं कि आप कितनी बार जीतते हैं, बल्कि इस बात में है कि हारकर भी आप अपने इरादों को कितनी मजबूती से फिर खड़ा करते हैं।”
