संपादकीय@एडवोकेट हरेश पंवार
कहते हैं—सही और ग़लत, अपने–अपने नजरिये और सुविधाओं के दो नाम भर हैं। आज का इंसान कैसा दिखता है और वास्तव में कैसा है, यह अक्सर दो अलग सच होते हैं। कभी किसी के व्यक्तित्व की परतें हमारी समझ से गहरी होती हैं, तो कभी हमारा दृष्टिकोण इतना संकुचित कि सच दिखकर भी दिखता नहीं। यही भ्रम, यही धुंध आज के सामाजिक रिश्तों और मानसिक संतुलन पर सबसे गहरी चोट कर रही है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।
यह दुनिया बदल चुकी है—बहुत तेजी से। आज अगर आप नाराज़ हो जाएं, तो आपको मनाने की जगह लोग आपको छोड़ देना पसंद करते हैं; क्योंकि सहनशीलता और संवाद की जगह अब ‘मुझे क्या!’ वाली मानसिकता ने ले ली है। निंदा इस समाज का ऐसा फल है जो बिना लगाए पेड़ के भी भरपूर मिलता है। प्रशंसा? वह तो ज्यादातर लोग मजबूरी, औपचारिकता या किसी छिपे स्वार्थ के तहत कर देते हैं।
इसलिए सबसे पहले आपको एक संतुलन विकसित करना होगा—निंदा को भी स्वीकार करने का और प्रशंसा को भी ठीक स्थान देने का। निंदा से भागिए मत, पर उससे टूटिए भी मत। प्रशंसा से फूलिए मत, पर उसे झूठा मानकर फेंक भी मत दीजिए। एक परिपक्व समाज वही है, जहाँ आलोचना रचनात्मक हो और सराहना वास्तविक। जहाँ लोग आपकी गलती याद दिलाते हुए आपका हाथ थामें, और आपकी सफलता देखकर सच्चे दिल से मुस्कुराएं।
मूल प्रश्न है—हम ऐसे समाज से कहाँ दूर हो गए?
हम बदल गए क्योंकि हमारी प्राथमिकताएं बदल गईं। हमारी जेबें भारी हो गईं, पर रिश्ते हल्के पड़ गए। सुविधाएं बढ़ीं, पर संवेदनाएं कम होती चली गईं। आज इंसान की पहचान उसके व्यवहार से कम और उसके ब्रांड, मोबाइल मॉडल, गाड़ी या घर से ज्यादा होती है। पहले लोग दूसरों के दुख में जाते थे, अब टाइम नहीं मिलता; पर दूसरों की निंदा के लिए 24 घंटे तैयार रहते हैं।
निंदा अब मनोरंजन बन चुकी है। किसी के गिरते ही ताली बजती है, और किसी के उठते ही संदेह पैदा होता है। प्रशंसा भी अब दुर्लभ है, खासकर सच्ची प्रशंसा। लेकिन यह भी सच है कि निंदा और प्रशंसा दोनों ही जरूरी हैं।
निंदा हमें बताती है कि हम कहाँ गलत हैं,
और प्रशंसा हमें याद दिलाती है कि हममें कितनी क्षमता है।
समस्या यह है कि हम दोनों को गलत ढंग से लेते हैं—
निंदा सुनकर टूट जाते हैं, और प्रशंसा सुनकर बहक जाते हैं।
अगर हम इस संतुलन को सीख जाएं तो जीवन की कई उलझनें स्वतः सुलझ जाएंगी। आलोचना को आत्मविकास का उपकरण बनाइए, न कि अपमान का। प्रशंसा को प्रेरणा बनाइए, न कि घमंड का कारण।
और सबसे बड़ी बात—भावनाओं को कभी हल्के में मत लीजिए।
यूँ तो भावनाओं के पांव नहीं होते, फिर भी वे दिल तक पहुंच ही जाती हैं।
इसलिए शब्द सोचकर बोलें, प्रतिक्रिया सोचकर दें, और निर्णय दिल–दिमाग के संतुलन से लें।
मनुष्य सबसे ताकतवर तभी होता है जब उसकी बुद्धि और भावनाएं दोनों संतुलन में हों।
क्योंकि संतुलित दृष्टिकोण ही हमें यह सिखाता है कि—
“दुनिया जैसी भी हो, आप वैसे ही बने रहिए, जैसे आपको होना चाहिए।”
निंदा करने वाले मिलेंगे हजार,
पर वही आगे बढ़ता है जो स्वयं का न्याय स्वयं करता है।
और वही खुश रहता है जो स्वयं का मूल्य स्वयं तय करता है—न कि दुनिया की तालियों या तानों से।
आज के समय में जरूरत है कि हम रिश्तों की गर्माहट वापस लाएं।
अपनी सोच में संवेदना जोड़ें।
लोगों को देखकर नहीं, समझकर परखें।
और यह स्वीकार करें कि हर किसी की कहानी अधूरी है—इसलिए जल्दबाज़ी में किसी की छवि का फैसला न करें।
अंत में, जीवन का सार यही है—
बटुए भारी हो सकते हैं,
पर दिलों का वजन कम न होने दें।
क्योंकि दुनिया पैसों से नहीं, रिश्तों से सुंदर लगती है—
और रिश्ते तभी टिकते हैं जब निंदा और प्रशंसा दोनों का सही संतुलन हो।
भीम प्रज्ञा अलर्ट
“अहंकार हमेशा ऊंचाई पर ले जाता है,पर लौटकर कभी घर नहीं आने देता। विनम्रता भले रास्ता लंबा कर दे,पर मंज़िल तक भी पहुंचाती है और मन भी बचा लेती है।”
