भीम प्रज्ञा कविता
एक प्रेमिका का मन
वो सामने आता है, तो सब ठीक लगता है
वो नज़रअंदाज़ करे, तो दिल थम सा जाता है
दिन भर बहुत कुछ करने को होता है
पर मन बस उसी के आसपास भटकता है
कभी वो कुछ कहे बिना चला जाता है
तो कई बातें अधूरी रह जाती हैं
कभी वो मुस्कुराए, तो लगता है
जैसे सारी दुनिया उसकी हो जाए
वो किसी और से बात करे, तो दिल भारी हो जाता है
वो किसी और को देखे, तो आँखें नम हो जाती हैं
उसके जैसा कोई और अच्छा नहीं लगता
और उसे किसी और के साथ सोच भी नहीं सकती
उसके साथ जीवन बिताने का सपना उसके मन में पलता है
उसके नाम से जुड़ने की ख्वाहिश दिल में रहती है
वो ही है जो हर सोच में बसता है
उसके सिवा कुछ भी अच्छा नहीं लगता
ये कविता उस प्रेमिका की है
जो कहती नहीं, पर महसूस सब कुछ करती है
जो चुप रहती है, पर दिल में तूफ़ान चलता है
जो बस उसी के लिए जीती है… बिना कहे, बिना जताए
– क्षमा राव, मुंबई
कवयित्री
