संपादकीय @Advocate Haresh Panwar
“सम्मान की नई परिभाषा: नशे का बढ़ता ग्लैमर और संयम का घटता मूल्य”
हम किस दिशा में जा रहे हैं? यह सवाल आज हमारे समाज से पहले से कहीं अधिक मजबूती से पूछा जाना चाहिए। एक चिंताजनक दृश्य आजकल हर शादी–समारोह, सामाजिक आयोजन और सामुदायिक मिलन में साफ़ दिखाई देने लगा है—नशा करने वालों को विशेष तवज्जो और सम्मान मिलना, जबकि संयमी लोगों को पीछे धकेल दिया जाता है। यह सिर्फ़ एक सामाजिक गलती नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ी के भविष्य पर गंभीर चोट है। मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।
हम ऐसे समय में जी रहे हैं जहाँ बुराई का ग्लैमर बढ़ रहा है और संयम, नैतिकता तथा सादगी के मूल्य लगातार नीचे गिरते दिखते हैं। समाज की यह उलट दिशा हमें सोचने पर मजबूर कर रही है कि आखिर क्यों हम गलत चीज़ों को सम्मान का प्रतीक मानने लगे हैं?
नशा – समाज का नया ‘स्टेटस सिंबल’? नशा करना कभी शर्म की बात माना जाता था। लेकिन आज? शादी और आयोजनों में शराब की बोतलें लोगों के हाथों में नहीं, बल्कि मेहमानों की ‘पहचान’ बन चुकी हैं। जो जितना अधिक पी ले—उसे उतना ही ‘बिंदास’, ‘मॉडर्न’ या ‘स्टाइलिश’ माना जाने लगा है।
दूसरी ओर, जो युवा या बुजुर्ग शराब के पास भी नहीं जाना चाहते—उन्हें लोग या तो ‘कंजूस’ कहते हैं, या ‘रूढ़िवादी’। यह विडंबना नहीं तो क्या है?
क्या हम ऐसे समाज की कल्पना कर रहे हैं जहां नशा सम्मान देता है और संयम शर्मनाक माना जाता है? यदि हाँ, तो हम एक बहुत बड़े सामाजिक पतन की ओर बढ़ रहे हैं।
सम्मानित लोग पीछे, नशेबाज़ आगे – यह कैसा न्याय?
कई बार हम देखते हैं कि शराब पीने वालों के लिए अलग स्टॉल, खास बैठने की जगह, उनकी ‘सेवा’ में लगे युवा, और उनके लिए विशेष व्यंजन
सब कुछ उपलब्ध कराया जाता है।
वहीं संयमी लोगों के लिए न तो कोई विशेष व्यवस्था होती है और न ही उन्हें प्राथमिकता का एहसास कराया जाता है।
सबसे दर्दनाक दृश्य तब होता है जब 50–60 साल के बुजुर्ग सम्मानित लोग युवा नशेड़ियों की सेवा करते दिखते हैं।
क्या यह हमारी संस्कृति है?
क्या यह हमारा मूल्य-तंत्र है?
क्या यह भारत की वह परंपरा है जहाँ बुजुर्गों को देवतुल्य माना जाता था?
जब हम गलत लोगों को तवज्जो देना शुरू कर देते हैं, तो सही लोग धीरे-धीरे हाशिये पर जाने लगते हैं। और यही आज हो रहा है।
युवाओं पर सबसे गहरा असर समस्या सिर्फ आज के आयोजनों और उनकी व्यवस्थाओं की नहीं है। सबसे गहरा घाव उन युवा बच्चों और किशोरों पर पड़ रहा है, जो यह सब देखकर बड़ा हो रहे हैं।
वे यह सीख रहे हैं कि—
“सम्मान नशे से मिलता है, संस्कार से नहीं।” एक बच्चा यह देखकर क्या सीखेगा कि शराब के नशे में धुत लोग सम्मान की कुर्सी पर बैठे हैं और संयमी लोग पीछे खड़े हैं?
क्या यह समाज आने वाली पीढ़ी को संस्कार दे रहा है या भ्रम नशा कभी किसी व्यक्ति को ऊंचा नहीं उठाता— यह व्यक्ति, परिवार और समाज तीनों को नीचे धकेलने वाला दलदल है। लेकिन यदि समाज यह दिखाएगा कि नशा ही प्रतिष्ठा देता है, तो युवा किस दिशा में जाएंगे?
समाज को खुद से पूछना होगा – हम किस ओर जा रहे हैं? समाज परिवर्तन सिर्फ बड़े़ आंदोलनों से नहीं आता। कई बार परिवर्तन छोटे-छोटे व्यवहारों से शुरू होता है। आज की यह प्रवृत्ति—नशेबाज़ों को सम्मान देना—एक ऐसा ही व्यवहार है, जिसकी अनदेखी आने वाली पीढ़ी को भारी पड़ेगी।
कुछ सवाल हम सबको स्वयं से पूछने चाहिए। क्या हमें नशा करने वालों को ही सम्मान देना चाहिए? क्या संयमित और संस्कारी लोग अपमान झेलते रहेंगे? क्या हमारे कार्यक्रमों में शराब ही पहली प्राथमिकता बनेगी? क्या हम युवाओं को यही सीख देंगे कि नशा ही प्रतिष्ठा है? यदि हम इन सवालों से डरकर चुप रहे, तो हमारी चुप्पी समाज को गलत दिशा में ले जाएगी।
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समाज को बदलने का समय – अभी और यहीं। परिवर्तन कभी भीड़ से नहीं आता। परिवर्तन अकेले व्यक्ति से आता है, जो कहने का साहस रखता है—
“गलत को गलत कहना है।”
हर आयोजन, हर परिवार और हर समुदाय को यह निर्णय लेना होगा कि— सम्मान नशे का नहीं, व्यक्तित्व का होगा। तवज्जो संयमित लोगों को मिलेगी, नशेबाज़ों को नहीं।
हमारा समाज संस्कारों से चलेगा, नशे से नहीं।
जब आयोजक यह सोच बनाएंगे, तब बच्चे और युवा भी यही सीखेंगे कि—
सम्मान संस्कृति से मिलता है,
अभिमान नशे से नहीं।
नशे का ग्लैमर नहीं—संस्कारों की गरिमा बढ़ाएं। आज जरूरत है एक नई सामाजिक क्रांति की।
नारे की नहीं, व्यवहार की क्रांति। जिन्हें नशे से परहेज़ है—उन्हें सम्मानित अतिथि बनाइए। जो संयमी हैं—उन्हें आगे बैठाइए जो चरित्रवान हैं—उन्हें मंच पर बुलाइए। जो समाज को बेहतर बनाते हैं—उन्हें महत्त्व दीजिए।
युवाओं के सामने यह उदाहरण रखिए कि“नशा कमजोरी है, संयम ताकत है।” जब समाज सही को सम्मान देगा, तभी समाज सही दिशा में चलेगा।
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अंत में – समाज के जागने का समय आ चुका है यदि हम आने वाली पीढ़ी को अच्छा भविष्य देना चाहते हैं, यदि हम स्वस्थ, मजबूत और सशक्त समाज बनाना चाहते हैं, तो हमें नशे की इस नकली चमक का विरोध करना होगा।
हमें यह घोषणा करनी होगी—
“हम सम्मान उन लोगों को देंगे,
जो जीवन को ऊँचा उठाते हैं—
न कि उन लोगों को जो जीवन को नशे में डुबो देते हैं।”
सम्मान का असली हकदार वही है जो संयमी है, संस्कारी है,
ईमानदार है, मेहनती है,
और समाज के लिए प्रेरणा है।
जब समाज जागेगा, जब आप और हम खड़े होंगे। तब जाकर नशे का ग्लैमर खत्म होगा
और संस्कारों की गरिमा बढ़ेगी।
भीम प्रज्ञा अलर्ट
“समाज उसी दिन बदलता है, जब लोग यह तय कर लें कि ताली केवल अच्छाई के लिए बजेगी और सम्मान केवल चरित्रवान को मिलेगा।”
