राजस्थान की राजनीति में सरलता, संघर्ष और जनसेवा का जीवंत प्रतीक
लेखक- नवीन कुमार@न्यूज़ एडिटर दैनिक भीम प्रज्ञा।
राजस्थान की राजनीति में कुछ नाम व्यक्तित्व से नहीं, अपने कर्मों से पहचाने जाते हैं। झुंझुनू जिले के सूरजगढ़ और पिलानी क्षेत्र में ऐसा ही एक नाम है—श्रवण कुमार। छह बार विधायक, एक बार लोकसभा प्रत्याशी, मजदूर आंदोलन से निकला नेतृत्व, कांग्रेस का सजग प्रहरी और जनहितों के लिए सदैव लड़ने वाला जनप्रतिनिधि—श्रवण कुमार का सफर साधारण व्यक्ति से असाधारण नेता बनने की कहानी है।
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सादगी और संघर्ष से शुरू हुई यात्रा
राजस्थान के खेतड़ी नगर स्थित हिंदुस्तान कॉपर लिमिटेड (एचसीसीएल) में एक साधारण श्रमिक के रूप में उन्होंने अपने करियर की शुरुआत की। मजदूरों की समस्याएँ देखकर वे उनके लिए आवाज़ उठाने लगे। जल्द ही तांबे के श्रमिकों के नेता के रूप में उभरे और लोगों के अधिकारों की लड़ाई में अग्रिम पंक्ति में खड़े नज़र आए।
श्रमिक नेता के रूप में मिली पहचान ने उन्हें राजनीति की ओर प्रेरित किया। उन्होंने ग्राम पंचायत जीणी से सरपंच बनकर सार्वजनिक जीवन में प्रवेश किया। पहली ही पायदान पर वे लोगों के प्रिय बन गए—क्योंकि वे मंच पर नेता से ज़्यादा गांव के बेटे, लोगों के साथी, और समस्या समाधानकर्ता के रूप में देखे जाते थे।
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छह बार का भरोसा: जनता का अटूट विश्वास
श्रवण कुमार प्रदेश की राजनीति में उन विरले नेताओं में से एक हैं जिन्हें लोगों ने छह बार विधायक चुनकर अपना विश्वास दिया।
तीन बार पिलानी से
तीन बार सूरजगढ़ से
विधानसभा में उनकी सक्रियता, मुद्दों पर स्पष्टता और वाणी की सरलता उन्हें विशिष्ट बनाती है। लोगों का विश्वास उनकी राजनीति की सबसे बड़ी पूंजी है।
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कांग्रेस के वफादार और अनुशासित सिपाही
राजनीति में जहां अवसरवादिता का बोलबाला है, वहीं श्रवण कुमार हमेशा एक ही पार्टी—कांग्रेस के प्रति निष्ठावान रहे। उन्हें प्रदेश में कांग्रेस का सजग प्रहरी माना जाता है। पार्टी के कठिन दौर में भी उन्होंने न तो विचार बदला, न वफादारी।
2019 में झुंझुनू लोकसभा सीट से कांग्रेस उम्मीदवार के रूप में उनकी उम्मीदवारी इस विश्वास की पुष्टि करती है।
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‘श्रवण’ नाम का सच—जनता को माता-पिता मानकर सेवा
अपने भाषणों में वे अक्सर कहते हैं—
“जैसे पौराणिक श्रवण कुमार अपने माता–पिता को तीर्थ यात्रा पर लेकर गए, वैसे ही मैं अपने क्षेत्र की जनता को माता–पिता मानता हूँ।”
यह सिर्फ वाक्य नहीं, बल्कि उनके व्यक्तित्व का दर्शन है।
इसीलिए राजनीतिक मंच हो या विधानसभा—वे जनता की समस्याओं को आदेश नहीं, कर्तव्य मानकर उठाते हैं।
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पेयजल समस्या पर संघर्ष—विपक्ष में रहते हुए भी सरकार को झुका दिया
सूरजगढ़ और आसपास के इलाकों में पेयजल समस्या इतिहास से चली आ रही है। इस समस्या को लेकर श्रवण कुमार लगातार लड़ते रहे।
विपक्ष में होने के बावजूद उन्होंने विधानसभा में यह मुद्दा इतनी दृढ़ता से उठाया कि स्वयं मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा को कहना पड़ा—
“श्रवण कुमार जी, आप क्षेत्र के बड़े भाई हैं। आपने जो कहा, वह बजट में कर दिया है।”
यह संवाद सिर्फ एक घटना नहीं, बल्कि यह साबित करता है कि जनता की सच्ची आवाज़ सत्ता की सीमाओं को भी लांघ सकती है।
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जमीन से जुड़े नेता: सत्ता में हों या विपक्ष में—स्वभाव एक ही
श्रवण कुमार की सबसे बड़ी पहचान यह है कि सत्ता और विपक्ष, दोनों में उनके व्यवहार में कोई अंतर नहीं आता।
वे फाइलों से ज्यादा मैदान में रहते हैं।
नेताओं से ज्यादा ग्रामीणों की चौपालों में देखे जाते हैं।
भाषण कम और काम ज्यादा करने में विश्वास रखते हैं।
लोग उन्हें “जनता का आदमी” कहते हैं। क्योंकि वे कहते हैं—
“मैं राजनीति में जीने नहीं, जनता के लिए जीने आया हूँ।”
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नेतृत्व का सार: शांति, सादगी और प्रतिबद्धता
श्रवण कुमार अपनी विनम्रता, सहजता और साफ-सुथरी छवि के कारण राजनीति में एक अलग स्थान रखते हैं।
बिना तड़क–भड़क
बिना प्रचार–प्रसार
बिना दिखावे के
वे लगातार क्षेत्र में विकास कार्य करवाते रहे हैं। सड़कें, पानी, विद्युत, शिक्षा और आम सुविधाओं में उनका योगदान आज भी ग्रामीणों द्वारा याद किया जाता है।
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भविष्य की राजनीति के लिए प्रेरक व्यक्तित्व
आज के दौर में जब राजनीति का चरित्र बदल रहा है, श्रवण कुमार जैसा नेतृत्व युवा पीढ़ी के लिए एक सीख है—
कि ईमानदारी, सादगी, सेवा और संघर्ष ही किसी नेता को टिकाऊ बनाते हैं, न कि शोर, शोहरत या सत्ता।
उनका राजनीतिक सफर यह संदेश देता है कि—
“नेता पद से नहीं, अपने कर्मों से महान होता है।”
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राजस्थान के सूरजगढ़ और पिलानी की जनता के दिल में श्रवण कुमार सिर्फ ‘विधायक’ नहीं, बल्कि परिवार का सदस्य, संकटमोचक, और जनसेवा का पर्याय हैं।
उनका जीवन दर्शन बताता है—
कि एक साधारण श्रमिक भी अपनी मेहनत, ईमानदारी और समर्पण से लाखों दिलों का नेता बन सकता है।
