भीम प्रज्ञा विशेष रिपोर्ट।
केंद्र सरकार के पर्यावरण एवं वन मंत्रालय ने माननीय उच्चतम न्यायालय में अरावली की नई परिभाषा तय करने हेतु सुझाव दिए जिस पर उच्चतम न्यायालय ने अरावली की नई परिभाषा तय करते हुए 100 मीटर से अधिक पर्वतों को ही अरावली का हिस्सा माना गया है जो हमारी आने वाली नस्लों के लिए खतरनाक साबित होगा। नई परिभाषा के अनुसार मात्र 8.7 प्रतिशत ही अरावली का हिस्सा रहेगी जो बहुत ही भयावह स्थिति पैदा होगी। अरावली की कुल लंबाई रायसीना हिल्स से लेकर गुजरात तक 692 किमी (420 मील) है जिसमें 550 किमी राजस्थान में स्थित है। अरावली हिमालय से 3.2 बिलियन वर्ष पुरानी मानी गई है। अरावली कोई पहाड़ों की श्रृंखला नहीं बल्कि पश्चिम भारत की पर्यावरण संतुलन की रीढ़ है अरावली एक शब्द नहीं है यह हमारा इतिहास , वर्तमान , भविष्य , हमारी संस्कृति , हमारी सभ्यता है। अरावली को कमजोर करना हमारे भविष्य के लिए आत्मघाती फैसला सिद्ध होगा। हानि पहाड़ों की नहीं बल्कि परिस्थिति तंत्र की होगी। अरावली में 300 से अधिक वन्य जीव जंतुओं की प्रजातियों की शरणस्थली है। अरावली बनास, साबरमती, लूणी, बेडच, आयड़, सुकड़ी आदि नदियों की जन्मस्थली है जिससे भूमि जल का स्तर रिचार्ज होता रहता है। खेजड़ी वृक्ष राजस्थान के लिए प्राणों के समान है उसे भी विकास के नाम पर योजनाबद्ध तरीके से काटा जा रहा है। सोलर प्लांट के नाम पर औद्योगिक कंपनियों के नाम पर ओरण तथा गोचर भूमि उद्योगपतियों को सौंपी जा रही है। राजस्थान में अब तक 26 लाख खेजड़ी काटी जा चुकी है तथा 50 लाख कटने की तैयारी में है। अब अगला नंबर अरावली का है सरकार हरियालो राजस्थान अभियान के तहत लाखों पेड़ लगाने का ढोंग कर रही जबकि दोहरी नीति चलाकर पेड़ो को अंधाधुंध काटने की परमिशन दे रही है। इससे बेहतर तो प्रकृति ने जो हमें विरासत में दिया है उसे ही संभालकर रख लेवे तो बेहतर होगा।
अरावली रक्षाकवच है उत्तर भारत की ढाल है अरावली की गोद में हजारों सालों पहले सभ्यताओं का जन्म हुआ वहां मानव जाति की धड़कने धड़का करती थी। अरावली में पांच बाघ परियोजनाएं है छठी प्रस्तावित है फिर भी अरावली को बिना किसी अपराध के मृत्युदंड की सजा सुना दी गई। अरावली के टूटने से रेगिस्तान का प्रसार होगा , तेज धूलभरी आंधियों चलेंगी, भूजल का स्तर गिरेगा, तापमान में बढ़ोतरी होगी, नदिया सुख जाएंगी, जीव जंतु खत्म हो जाएंगे, लू का प्रकोप बढ़ेगा, खेती नष्ट होगी, किसान पलायन करेगा, पशु पालन खत्म होगा, जंगल तथा जैव विविधता समाप्त हो जाएगी, जीवन असुरक्षित होगा। यह विकास का नहीं बल्कि विनाश का ब्लू प्रिंट है अरावली टूटेगी तो सिर्फ पत्थर नहीं टूटेंगे बल्कि हमारा भविष्य भी टूटेगा।
लाखों लोगों को जीवनदान देने वाली अरावली, इसकी गोद में रहने वाले आदिवासी, मानव जाति की जन्मदात्री अरावली की छाती हरियाणा और राजस्थान में पहले ही छलनी कर दिया है यहां करीब 30 पहाड़ियां पहले ही खनन की भेंट चढ़ चुकी है। यह एक सो मीटर का नहीं बल्कि एक सो पीढ़ियों का सवाल है। विकास की वो परिभाषा खतरनाक है जो आज की सुख सुविधा के लिए आने वाले भविष्य को अंधकार में डाल देता है ।
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*रामसिंह बगरानिया*
*सामाजिक व स्वतंत्र विचारक*
