रजत विजय रंगा
भीम प्रज्ञा न्यूज़.टोहाना। इतिहास हमेशा तलवारों की टकराहट या साम्राज्यों के उत्थान और पतन से ही अपनी उपस्थिति दर्ज नहीं कराता। कई बार उसके सबसे निर्णायक अध्याय नैतिक साहस के माध्यम से लिखे जाते हैं। ऐसे क्षणों में जब विवेक भय से ऊंचा खड़ा होता है। वीर बाल दिवस भारत की सभ्यतागत यात्रा का ऐसा ही एक अध्याय है। यह हमें स्मरण कराता है कि एक राष्ट्र की आत्मा बच्चों के साहस से भी आकार ले सकती है और नैतिक शक्ति अक्सर मौन में सबसे प्रभावशाली रूप से बोलती है। 26 दिसंबर को मनाया जाने वाला वीर बाल दिवस दसवें सिख गुरु गुरु गोबिंद सिंह जी के सबसे छोटे पुत्रों की असाधारण वीरता को समर्पित राष्ट्रीय स्मृति दिवस है। ‘वीर बच्चों का दिवस’ के रूप में जाना जाने वाला यह अवसर साहिबजादा जोरावर सिंह और साहिबजादा फतेह सिंह के बलिदान को नमन करता है, जिनका त्याग भारतीय इतिहास में आस्था, गरिमा और निडरता का अमर प्रतीक है।
इस दिवस की गहराई को समझने के लिए हमें 1705 की उस अशांत सर्दी में लौटना होगा। आनंदपुर साहिब किले को मुगल सेनाओं ने घेर लिया था। चारों ओर संकट के बीच गुरु गोबिंद सिंह जी अपने परिवार और अनुयायियों के साथ वहां से निकलने को विवश हुए। इसके बाद जो हुआ वह बिछोह, पीड़ा और संघर्ष से भरा था। इसी उथल पुथल के बीच गुरु जी के दो सबसे छोटे पुत्र पकड़े गए और उन्हें सरहिंद ले जाया गया, जहां उन्हें मुगल सूबेदार वज़ीर ख़ान के सामने प्रस्तुत किया गया।
उनके सामने रखा गया विकल्प अत्यंत निर्दयी था। धर्म त्यागो और सुरक्षा, वैभव व जीवन प्राप्त करो या अपने विश्वास पर अडिग रहो और मृत्यु को स्वीकार करो। अल्पायु होने के बावजूद दोनों साहिबजादों ने क्षण भर भी संकोच नहीं किया। उन्होंने अपने धर्म और सिद्धांतों से समझौता करने से साफ इनकार कर दिया। उनका यह निर्णय केवल विरोध नहीं था, बल्कि गुरु की शिक्षाओं और सिख परंपरा के मूल्यों से उपजा अटूट विश्वास था।
इस अडिगता की कीमत उन्हें अमानवीय यातना के रूप में चुकानी पड़ी। दिसंबर 1705 में साहिबजादा जोरावर सिंह और साहिबजादा फतेह सिंह को दीवार में जीवित चुनवा दिया गया। यह घटना क्रूरता की पराकाष्ठा थी, लेकिन साथ ही नैतिक विजय का भी प्रतीक बन गई। सत्ता उनके प्राण ले सकती थी, पर उनके संकल्प को नहीं तोड़ सकी।
इसी अमर संकल्प को सम्मान देने के लिए वीर बाल दिवस मनाया जाता है। वर्ष 2022 में नरेंद्र मोदी द्वारा 26 दिसंबर को वीर बाल दिवस के रूप में घोषित किया जाना राष्ट्रीय स्मृति में एक ऐतिहासिक कदम था। यह पहली बार था जब भारत ने उन बच्चों के बलिदान को सम्मान देने के लिए एक राष्ट्रीय दिवस समर्पित किया, जिन्होंने व्यक्तिगत सुरक्षा से ऊपर सिद्धांतों को और आत्मसमर्पण से ऊपर सत्य को चुना।
वीर बाल दिवस का महत्व केवल इतिहास स्मरण तक सीमित नहीं है। यह राष्ट्रीय आत्मचिंतन का अवसर है। यह हमें सभी दस सिख गुरुओं के अतुलनीय योगदान की याद दिलाता है, जिनका जीवन न्याय, समानता, सेवा और अत्याचार के विरुद्ध संघर्ष को समर्पित था। उनके बलिदान केवल एक धर्म की रक्षा नहीं थे, बल्कि समाज की नैतिक नींव को सुरक्षित रखने का संकल्प थे।
आज की युवा पीढ़ी के लिए वीर बाल दिवस का संदेश अत्यंत प्रासंगिक है। यह वह दौर है जहां अक्सर सुविधा को सिद्धांतों से ऊपर रखने का दबाव होता है। साहिबजादों की कथा हमें सिखाती है कि सच्ची शक्ति वही है जो कठिन परिस्थितियों में भी अपने मूल्यों पर अडिग रहती है। यह संदेश देती है कि नेतृत्व उम्र का मोहताज नहीं होता और ईमानदारी सबसे प्रभावी प्रतिरोध है।
यह दिवस समाज, शिक्षकों और नेतृत्व वर्ग पर भी एक जिम्मेदारी डालता है। स्मरण केवल औपचारिक आयोजनों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। वीर बाल दिवस को कक्षाओं, घरों और सार्वजनिक मंचों पर नैतिकता, साहस और विवेक पर सार्थक संवाद का माध्यम बनना चाहिए। यह युवाओं में सत्यनिष्ठा, विविधता के प्रति सम्मान और अन्याय के विरुद्ध निडर होकर खड़े होने का संस्कार विकसित करे।
इस प्रकार वीर बाल दिवस केवल इतिहास के दो वीर बालकों को श्रद्धांजलि नहीं है। यह वर्तमान के लिए एक आह्वान और भविष्य के लिए एक संकल्प है। यह हमें ऐसे भारत के निर्माण की प्रेरणा देता है जहां आस्था का सम्मान हो, विवेक की रक्षा हो और साहस को अपवाद नहीं बल्कि साझा मूल्य के रूप में देखा जाए।
वीर बाल दिवस पर हम शोक में नहीं, कृतज्ञता में नतमस्तक होते हैं। उस विरासत के प्रति कृतज्ञता जो हमें सिखाती है कि इतिहास के सबसे अंधकारमय क्षणों में भी धर्म और सत्य का प्रकाश बच्चों के हृदय से सबसे उज्ज्वल रूप में प्रकट हो सकता है।
