संपादकीय@एडवोकेट हरेश पंवार
लड़ाई पद की नहीं, अहंकार की है — और कीमत समाज का भविष्य चुका रहा है
डॉ. अंबेडकर मेमोरियल वेलफेयर सोसाइटी के हालिया चुनाव के बाद जो वातावरण बना है, वह केवल एक संस्था के भीतर सत्ता-संघर्ष का मामला नहीं रह गया है, बल्कि यह पूरे समाज के आत्ममंथन का विषय बन चुका है। यह लड़ाई किसी अध्यक्ष पद, सचिव पद या पैनल की नहीं है; यह लड़ाई उस छुपे हुए अहंकार की है, जो वर्दी उतरने के बाद भी मन से नहीं उतरता और जो अपने प्रभाव, रुतबे और सत्ता-लालसा के लिए समाज को मोहरे की तरह इस्तेमाल करता है। मैं यहां बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।
सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि इस पूरी लड़ाई में असली नुकसान युवाओं का हो रहा है। सांड-सांड लड़ रहे हैं और खेत नौजवान रौंदे जा रहे हैं। सोशल मीडिया पर भड़काऊ भाषण, गाली-गलौज, धमकियां, हुड़दंग और फिर कार्यालय का ताला तोड़ना—यह सब किस लोकतांत्रिक मूल्य का प्रतिनिधित्व करता है? क्या यही बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर का सपना था?
बाबा साहब ने कहा था— “शिक्षित बनो, संगठित रहो और संघर्ष करो।”
लेकिन आज का दृश्य देखकर लगता है मानो इस नारे का अर्थ ही बदल दिया गया है। शिक्षा की जगह उन्माद, संगठन की जगह गुटबाजी और संघर्ष की जगह अराजकता ने ले ली है। यदि बाबा साहब आज जीवित होते, तो शायद वे यह देखकर आत्मग्लानि से भर जाते कि जिन संस्थाओं को उन्होंने सामाजिक चेतना का माध्यम माना था, वही संस्थाएं आज व्यक्तिगत अहंकार का अखाड़ा बन गई हैं।
राजस्थान में अंबेडकर मेमोरियल वेलफेयर सोसाइटी के चुनाव ने कई गंभीर प्रश्न खड़े किए हैं—
कौन लड़ रहा है?
किसलिए लड़ रहा है?
और किसकी कीमत पर यह लड़ाई लड़ी जा रही है?
दुखद यह है कि इन सवालों के स्पष्ट जवाब किसी के पास नहीं हैं, फिर भी समाज खेमों में बंट चुका है। सोशल मीडिया की तथाकथित यूनिवर्सिटी से निकली अफवाहें, आरोप-प्रत्यारोप और प्रोपेगेंडा ने पूरे वातावरण को विषाक्त बना दिया। जो चुप हैं, वे गूंगे या बहरे नहीं हैं; वे इस पूरे तमाशे से आहत हैं।
यह निर्विवाद तथ्य है कि सोसाइटी के भीतर सत्ता-संघर्ष लंबे समय से चल रहा है। कभी चुनाव न कराने के आरोप, कभी कब्जे की बातें, कभी समानांतर संस्थाएं खड़ी करने के प्रयास—यह सब समाज ने देखा है। सेवानिवृत्त आईपीएस अधिकारी सतवीर सिंह और पूर्व डीजीपी डॉ. रवि प्रकाश मेहरड़ा के बीच चली यह जंग किसी वैचारिक मतभेद की नहीं, बल्कि वर्चस्व की लड़ाई प्रतीत होती है। दुर्भाग्य यह है कि दोनों ही पक्ष अपने-अपने नैरेटिव को सही ठहराने के लिए समाज को बार-बार इस्तेमाल करते रहे।
जिस तरह से पहले चुनावों में पैनल बनाए गए, त्यागपत्र दिलवाए गए, फिर परिस्थितियां बदलते ही उन्हीं निर्णयों से मुकरा गया—यह सब राजनीति के वही पुराने हथकंडे हैं, जिन्हें समाज अब अच्छी तरह पहचान चुका है। सत्ता के खेल में “निष्पक्षता”, “संविधान”, “बाबा साहब” जैसे शब्द केवल ढाल बनकर रह गए हैं।
सबसे शर्मनाक दृश्य वह था जब चुनाव परिणाम के बाद वेलफेयर सोसाइटी के कार्यालय में ताला तोड़ने और तोड़फोड़ का वीडियो सामने आया। यह दृश्य केवल कानून-व्यवस्था का प्रश्न नहीं है, यह नैतिक दिवालियापन का प्रमाण है। क्या सत्ता इतनी जरूरी है कि उसके लिए संस्था की गरिमा, समाज की प्रतिष्ठा और युवाओं का भविष्य दांव पर लगा दिया जाए?
यह भी सोचने की बात है कि युवाओं को इस टकराव की ओर किसने धकेला। कौन उन्हें उकसा रहा है कि वे “संघर्ष” के नाम पर अपराध के वारिस बनें? युवा साथियों को यह समझना होगा कि हर बहती नदी में कूदना बहादुरी नहीं होती। अच्छे तैराक होना अलग बात है, लेकिन बेमतलब उफनती धारा में छलांग लगाना मूर्खता है।
आज आवश्यकता है आत्मचिंतन की। यह समय किसी एक गुट को सही और दूसरे को गलत ठहराने का नहीं है। यह समय है दोनों पक्षों को कठघरे में खड़ा करने का—उनके अहंकार, उनकी चालबाजियों और उनके दोहरे चरित्र के लिए। जो लोग समाज की लीडरशिप का दावा करते हैं, उन्हें पहले अपने आचरण का मूल्यांकन करना होगा।
वेलफेयर सोसाइटी किसी व्यक्ति की बपौती नहीं है। यह संस्था समाज की धरोहर है, और इसे बचाने की जिम्मेदारी भी समाज की है। यदि आज भी स्पष्ट सवाल नहीं पूछे गए, पारदर्शिता की मांग नहीं की गई और युवाओं को सचेत नहीं किया गया, तो आने वाला समय और अधिक भयावह होगा।
अंत में समाज से यही अपील है—
नेताओं की नहीं, नीतियों की पहचान कीजिए।
नारों की नहीं, नीयत की जांच कीजिए।
और सबसे जरूरी—अपने युवाओं को अहंकार की लड़ाई का ईंधन बनने से बचाइए।
क्योंकि अगर आज हमने यह नहीं किया, तो कल इतिहास हमें माफ नहीं करेगा।
