भीम प्रज्ञा अलर्ट- तकनीक जीवन को आसान बनाती है, लेकिन यदि उसने रिश्तों से समय छीन लिया तो वही सुविधा हमारी सबसे बड़ी कमजोरी बन जाती है। सच्ची प्रगति वही है, जहाँ मोबाइल हाथ में हो, पर दिल अपनों के पास रहे।
संपादकीय@एडवोकेट हरेश पंवार 11 jan.2026
“ऑफलाइन मां चाहिए, ऑनलाइन नहीं”
— तकनीक के दौर में खोता बचपन और मां का बदलता स्वरूप
आज का समय तकनीक का समय है। मोबाइल, इंटरनेट, ऑनलाइन शिक्षा, डिजिटल भुगतान और सोशल मीडिया ने जीवन को सुविधाजनक तो बनाया है, लेकिन इसी सुविधा की चकाचौंध में हम अनजाने ही सबसे कीमती चीज़ को खोते जा रहे हैं—बचपन और माँ की ममता का जीवंत स्पर्श। “ऑफलाइन माँ चाहिए, ऑनलाइन नहीं” जैसा विचार केवल एक बच्चे का निबंध नहीं, बल्कि हमारे समय का आईना है, जो समाज को कठोर सच दिखा रहा है। यहां मैं बोलूगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।
सर्दी की छुट्टियों में एक शिक्षक ने बच्चों को मां पर निबंध लिखने का कार्य दिया। अधिकांश बच्चों ने माँ के त्याग, प्रेम और संघर्ष को शब्दों में सजाया, लेकिन एक बच्चा—जो शांत, एकांतप्रिय और सृजनशील था—उसने जो लिखा, उसने पूरे तंत्र को झकझोर दिया। उसके निबंध का शीर्षक था— “मुझे ऑफलाइन मां चाहिए, ऑनलाइन नहीं।”
यह शीर्षक अपने आप में एक प्रश्न नहीं, बल्कि आरोप है—हम सब पर।
उस बच्चे ने लिखा कि उसे पढ़ी-लिखी, मोबाइल में उलझी, हर सवाल का जवाब गूगल से खोजने वाली माँ नहीं चाहिए। उसे अनपढ़ या कम पढ़ी-लिखी मां चाहिए, जो साड़ी पहनकर अपने आँचल में उसे समेट सके, लोरी सुना सके, मिट्टी से सने कपड़ों को प्यार से झाड़ सके। उसे जींस-टॉप वाली, ऑनलाइन पिज़्ज़ा-बर्गर ऑर्डर करने वाली माँ नहीं, बल्कि घर में गुलगुले, पकोड़े और खीर बनाने वाली मां चाहिए।
यह किसी आधुनिक मां का अपमान नहीं था, बल्कि उस भावनात्मक खालीपन की पुकार थी, जिसे तकनीक ने जन्म दिया है।
बच्चा यह नहीं कह रहा था कि तकनीक गलत है। वह यह कह रहा था कि तकनीक ने मां को उससे दूर कर दिया है। माँ पास में होते हुए भी दूर हो गई है—मोबाइल की स्क्रीन के पीछे। वह माँ जो पहले बच्चे के स्कूल से लौटते ही काम छोड़कर उसे गले लगाती थी, आज “एक मिनट” कहकर स्क्रीन में खोई रहती है।
यही “एक मिनट” धीरे-धीरे बच्चे के जीवन से माँ को बाहर कर देता है।
आज बच्चे सवाल पूछते हैं, तो जवाब गूगल से आता है। कहानी माँ की ज़ुबान से नहीं, यूट्यूब से सुनाई जाती है। खिलौने ऑनलाइन ऑर्डर होते हैं, रिश्ते नहीं। माँ की गोद, जो कभी दुनिया की सबसे सुरक्षित जगह होती थी, आज मोबाइल और लैपटॉप के बीच सिमटती जा रही है।
यह निबंध पढ़ते हुए शिक्षक की आँखों में आँसू आ गए, क्योंकि यह किसी एक बच्चे की पीड़ा नहीं थी, बल्कि एक पूरी पीढ़ी की चुप चीख थी। बच्चे स्तब्ध थे, क्योंकि वे उसी सच्चाई से रूबरू हो रहे थे, जिसे वे जी रहे हैं, लेकिन शब्द नहीं दे पा रहे थे।
और वह बच्चा—जिसने यह लिखा—स्वाभिमान के साथ खड़ा था, क्योंकि उसने सच लिखा था।
यहाँ सवाल यह नहीं है कि ऑनलाइन शिक्षा या तकनीक गलत है। सवाल यह है कि क्या हमने संतुलन खो दिया है? क्या हमने सुविधा के नाम पर संवेदना को त्याग दिया है?
एक बच्चा दिन में घंटों मोबाइल पर रहता है—कभी पढ़ाई के नाम पर, कभी खेल के नाम पर। माँ भी मोबाइल पर—कभी सोशल मीडिया, कभी चैट, कभी ऑनलाइन काम। दोनों एक ही कमरे में होते हैं, लेकिन दोनों की दुनिया अलग-अलग होती है। इसे ही सबसे खतरनाक दूरी कहा जा सकता है—भावनात्मक दूरी।
बचपन स्क्रीन से नहीं, स्पर्श से बनता है।
संस्कार ऐप से नहीं, अनुभव से आते हैं।
मां का आँचल कोई वाई-फाई नेटवर्क नहीं, जिसे जब चाहा जोड़ा और जब चाहा काट दिया।
यदि आज हम बच्चों को समय नहीं देंगे, तो कल वे हमें समय नहीं देंगे।
यदि आज मां केवल “ऑनलाइन” रहेगी, तो कल बच्चे रिश्तों से “ऑफलाइन” हो जाएंगे।
यह भीम प्रज्ञा का संपादकीय चिंतन किसी माँ को दोषी ठहराने के लिए नहीं है, बल्कि एक चेतावनी है—समय रहते संभलने की। तकनीक का उपयोग करें, लेकिन उसे रिश्तों पर हावी न होने दें। मां आधुनिक हो सकती है, शिक्षित हो सकती है, कामकाजी हो सकती है—लेकिन माँ का मूल स्वरूप नहीं खोना चाहिए।
क्योंकि बच्चा अंत में यही कहेगा—
“मुझे नेटवर्क वाली मां नहीं चाहिए,
मुझे मेरी मां चाहिए।”
