भीम प्रज्ञा अलर्ट-जो इंसान बाहर की दुनिया में सब कुछ सह लेता है, यदि वही धैर्य घर के रिश्तों में भी ले आए, तो जीवन की सबसे बड़ी जीत वहीं हासिल हो जाए।
संपादकीय@हरेश पंवार Date 10 jan.2026
जीवन की यात्रा और घर की परीक्षा : क्यों बाहर सहनशील, भीतर असहिष्णु हो जाते हैं हम
जीवन को अक्सर एक यात्रा कहा जाता है, और यह उपमा केवल काव्यात्मक नहीं, बल्कि व्यवहारिक सत्य भी है। हम रोज़ किसी न किसी रूप में यात्रा करते हैं—कभी बस में, कभी ट्रेन में, कभी हवाई जहाज में और कभी जीवन की अनदेखी पगडंडियों पर। आश्चर्य की बात यह है कि जब हम सार्वजनिक परिवहन में सफर कर रहे होते हैं, तब हमारे भीतर सहनशीलता, धैर्य और समायोजन (एडजस्टमेंट) का अद्भुत गुण स्वतः जागृत हो जाता है। तंग सीट, देर से चलती ट्रेन, शोर मचाता सह-यात्री या सामान रखने की असुविधा—इन सबके बावजूद हम प्रायः मुस्कुराकर या चुप रहकर यात्रा पूरी कर लेते हैं।
लेकिन विडंबना यह है कि वही व्यक्ति जब अपने घर की दहलीज पर कदम रखता है, तो उसके व्यवहार में एक अजीब सा परिवर्तन आ जाता है। जो इंसान सफर में हर असुविधा को सहजता से स्वीकार कर लेता है, वही घर में छोटी-छोटी बातों पर झुंझला उठता है। कभी खाने में नमक कम होने पर, कभी बच्चों की शरारत पर, तो कभी जीवनसाथी की किसी बात पर उसका धैर्य जवाब दे जाता है। यहीं से परिवार के प्रेम, विश्वास और एकता में दरारें पड़ने लगती हैं। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।
दरअसल, परिवार वह नाव है जो हमें जीवन रूपी सागर के पार ले जाती है। इस नाव में माता-पिता का अनुभव, जीवनसाथी का साथ, बच्चों की मुस्कान और रिश्तों की डोर जुड़ी होती है। यदि इस नाव के भीतर ही कलह, तकरार और असहिष्णुता का तूफान उठने लगे, तो बाहर का सागर कितना ही शांत क्यों न हो, यात्रा कठिन हो जाती है। दुख की बात यह है कि हम इस सत्य को समझते तो हैं, पर अपनाने में अक्सर चूक जाते हैं।
सफर के दौरान हम ‘एडजस्ट’ क्यों कर लेते हैं? क्योंकि हमारे मन में यह स्पष्ट होता है कि यह स्थिति अस्थायी है, और मंज़िल तक पहुँचना अधिक महत्वपूर्ण है। हम जानते हैं कि थोड़ी देर की असुविधा के बाद हम अपने गंतव्य पर होंगे। शायद इसी सोच के कारण हम सह-यात्रियों की कमियों को नजरअंदाज कर देते हैं। हम उनसे भावनात्मक अपेक्षाएँ नहीं रखते, इसलिए उनके व्यवहार से अधिक आहत भी नहीं होते।
इसके विपरीत, परिवार में हमारी अपेक्षाएँ बहुत अधिक होती हैं। हम चाहते हैं कि हमारे अपने हर बात समझें, हर भावना का सम्मान करें और हर परिस्थिति में हमारे अनुसार ही चलें। जब ऐसा नहीं होता, तो निराशा, क्रोध और कटुता जन्म ले लेती है। हम यह भूल जाते हैं कि परिवार के सदस्य भी इंसान हैं—उनकी अपनी सीमाएं, कमजोरियां और परिस्थितियां हैं।
यहीं पर ‘एडजस्टमेंट’ का सही अर्थ समझना आवश्यक हो जाता है। एडजस्टमेंट का मतलब यह नहीं कि हम अपने आत्मसम्मान या मूल्यों से समझौता कर लें। इसका अर्थ है—अपनों के प्रति थोड़ा झुक जाना, थोड़ा धैर्य रखना और उनकी कमियों को उतनी ही सहजता से स्वीकार करना, जितनी सहजता से हम सफर में किसी अनजान सह-यात्री की आदतों को स्वीकार कर लेते हैं।
यदि हम घर को भी एक यात्रा मान लें, तो दृष्टिकोण बदल सकता है। जैसे हम यात्रा के दौरान सोचते हैं कि “चलो, थोड़ी देर की बात है”, वैसे ही यदि घर में किसी बात पर मन खिन्न हो, तो हम यह सोचें कि “यह रिश्ता जीवन भर का है, एक क्षण की नाराज़गी से इसे क्यों बिगाड़ें?”
यह सोच हमें संयम सिखाती है।
आज के समय में जब जीवन की गति तेज़ है, तनाव और प्रतिस्पर्धा हर व्यक्ति को थका रही है, तब घर ही वह स्थान होना चाहिए जहाँ मन को विश्राम मिले। लेकिन यदि घर ही तनाव का केंद्र बन जाए, तो व्यक्ति भीतर से टूटने लगता है। इसका प्रभाव न केवल मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ता है, बल्कि समाज की संरचना भी कमजोर होती है। क्योंकि परिवार मजबूत होगा, तभी समाज मजबूत होगा।
यह भी सच है कि बच्चों का व्यक्तित्व परिवार के वातावरण से ही आकार लेता है। यदि वे रोज़ घर में कलह, ताने और असहिष्णुता देखेंगे, तो वही व्यवहार वे जीवन में अपनाएंगे। इसके विपरीत, यदि वे माता-पिता को एक-दूसरे के प्रति धैर्यवान, सम्मानपूर्ण और समझदार देखेंगे, तो उनके भीतर भी वही संस्कार विकसित होंगे।
अंततः यह स्वीकार करना होगा कि जीवन की सबसे लंबी और महत्वपूर्ण यात्रा घर से शुरू होकर घर पर ही समाप्त होती है। बाहर की यात्राएँ हमें मंज़िल तक पहुँचा सकती हैं, लेकिन भीतर की यात्रा हमें इंसान बनाती है। जिस दिन हम यह सीख लेंगे कि घर में भी उसी तरह एडजस्ट करना है जैसे हम सफर में करते हैं, उस दिन परिवार बोझ नहीं, बल्कि सबसे सुंदर सहयात्री बन जाएगा।
याद रखें, एडजस्टमेंट कमजोरी नहीं, बल्कि परिपक्वता का संकेत है। यह प्रेम का वह रूप है जिसमें अहंकार नहीं, अपनापन बोलता है। यदि हम परिवार में इस भाव को जगा सकें, तो जीवन का हर दिन केवल जीने का नहीं, बल्कि आनंद लेने का सफर बन जाएगा
भीम प्रज्ञा अलर्ट
जो इंसान बाहर की दुनिया में सब कुछ सह लेता है, यदि वही धैर्य घर के रिश्तों में भी ले आए, तो जीवन की सबसे बड़ी जीत वहीं हासिल हो जाए।
