संपादकीय@Haresh Panwar
यूजीसी कानून में बदलाव : शिक्षा सुधार या भ्रम का विरोध?
देश में शिक्षा केवल डिग्री हासिल करने का माध्यम नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और समरसता की नींव है। इसी उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए केंद्र सरकार और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) द्वारा शिक्षा व्यवस्था में सुधार के लिए कानूनों में समय-समय पर बदलाव किए जाते रहे हैं। हाल ही में यूजीसी कानून में हुए संशोधनों को लेकर देश के कुछ हिस्सों में विरोध प्रदर्शन देखने को मिल रहे हैं। यह विरोध कई सवाल खड़े करता है—क्या यह कानून वास्तव में किसी वर्ग के खिलाफ है या फिर शिक्षा व्यवस्था को अधिक पारदर्शी और न्यायपूर्ण बनाने की कोशिश? यह मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।
कानून का उद्देश्य क्या है?
यूजीसी से जुड़े कानूनों का मूल उद्देश्य विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में शिक्षा की गुणवत्ता बनाए रखना, प्रशासनिक अनियमितताओं पर रोक लगाना और यह सुनिश्चित करना है कि किसी भी छात्र के साथ जाति, वर्ग या सामाजिक पहचान के आधार पर भेदभाव न हो। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 14 समानता का अधिकार देता है, अनुच्छेद 15 भेदभाव को रोकता है और अनुच्छेद 21 जीवन के साथ गरिमा का अधिकार सुनिश्चित करता है। शिक्षा से जुड़ा हर कानून इन्हीं संवैधानिक मूल्यों की कसौटी पर खरा उतरना चाहिए।
यूजीसी कानून में बदलाव इसी संवैधानिक भावना से प्रेरित हैं। इसका मकसद दोषी को दंडित करना नहीं, बल्कि उन स्थितियों को रोकना है, जहां शिक्षा संस्थानों में भेदभाव, शोषण या अनियमितता पनपती है।
विरोध का आधार और सवाल
यह प्रश्न स्वाभाविक है कि यदि कोई व्यक्ति या संस्था कानून के दायरे में ईमानदारी से कार्य कर रही है, तो उसे ऐसे कानून से डर क्यों होना चाहिए? कानून अपराध रोकने के लिए होते हैं, न कि सामान्य नागरिक को भयभीत करने के लिए।
जब अस्पृश्यता, जातिगत भेदभाव या मानसिक उत्पीड़न जैसे अपराध किए ही नहीं जा रहे हों, तो उनके खिलाफ बने कानून का विरोध किस कारण से? यही विरोध यह संकेत देता है कि कहीं न कहीं मानसिकता की समस्या है, कानून की नहीं।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को समझना जरूरी
भारत का सामाजिक इतिहास यह बताता है कि एक बड़े वर्ग ने सदियों तक अपमान, बहिष्कार और अन्याय सहा है। इसी अनुभव से सीख लेते हुए संविधान निर्माताओं ने सामाजिक न्याय को संविधान की आत्मा बनाया। डॉ. भीमराव अंबेडकर ने स्पष्ट कहा था कि जब तक समाज में समानता नहीं आएगी, तब तक लोकतंत्र अधूरा रहेगा।
यूजीसी कानून में बदलाव भी इसी सोच की निरंतरता हैं, ताकि शिक्षा संस्थान केवल पढ़ाई के केंद्र न रहें, बल्कि समानता और सम्मान के भी उदाहरण बनें।
लोकतंत्र में कानून और संस्थाओं की भूमिका
भारतीय लोकतंत्र तीन स्तंभों—विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका—पर टिका है। संसद कानून बनाती है, सरकार उन्हें लागू करती है और न्यायपालिका उनकी संवैधानिक समीक्षा करती है। यूजीसी से जुड़े कानून भी इसी लोकतांत्रिक प्रक्रिया से होकर आए हैं।
यदि किसी कानून में खामी होती है, तो न्यायालय का दरवाजा खुला है। लेकिन सड़कों पर उतरकर बिना पूरी समझ के विरोध करना, शिक्षा व्यवस्था में अनावश्यक भ्रम और तनाव पैदा करता है।
कानून दंड के लिए नहीं, संतुलन के लिए
यह समझना जरूरी है कि कानून का मकसद सजा देना नहीं, बल्कि गलत कार्यों को रोकना है। कानून तभी सक्रिय होता है, जब उसका उल्लंघन होता है। यदि कानून का दुरुपयोग होता है, तो वह भी अपराध है और उस पर भी संवैधानिक उपाय मौजूद हैं।
अच्छी मानसिकता वाले समाज में कानूनों का प्रयोग कम और उनका सम्मान अधिक होता है। इसलिए असली चुनौती कानून की कठोरता नहीं, बल्कि समाज की सोच है।
शिक्षा सुधार की दिशा में अवसर
यूजीसी कानून में बदलाव को एक अवसर के रूप में देखा जाना चाहिए—एक ऐसे अवसर के रूप में, जहां शिक्षा संस्थान आत्ममंथन करें, अपनी कमियों को सुधारें और विद्यार्थियों के लिए सुरक्षित व समान वातावरण बनाएं।
आज आवश्यकता है संवाद की, न कि टकराव की। सुधार का विरोध करने के बजाय यह देखना चाहिए कि शिक्षा व्यवस्था कैसे अधिक पारदर्शी, गुणवत्तापूर्ण और न्यायपूर्ण बन सकती है।
यूजीसी कानून में बदलाव शिक्षा सुधार और सामाजिक न्याय की दिशा में एक संवैधानिक कदम है। इसका विरोध करने से पहले इसके उद्देश्य और कानूनी आधार को समझना आवश्यक है। कानून से डरने की जरूरत केवल उन्हें होती है, जो कानून तोड़ने की मानसिकता रखते हैं।
ईमानदार शिक्षक, विद्यार्थी और संस्थानों के लिए यह कानून सुरक्षा कवच है। यदि हम वास्तव में मजबूत लोकतंत्र और समावेशी शिक्षा चाहते हैं, तो सुधारों का स्वागत करना ही समय की मांग है।
भीम प्रज्ञा अलर्ट
जो समाज सवाल पूछने से डरने लगे, समझ लीजिए वहां जवाबों पर पहरा बैठ चुका है।
