संपादकीय@एडवोकेट हरेश पंवार
“संविधान : भारत की आत्मा, समाज का दर्पण और भविष्य का मार्गदर्शक”
26 नवंबर 1949—यह तिथि भारतीय इतिहास में केवल एक संवैधानिक दस्तावेज़ के स्वरूप में नहीं आकर एक नई चुनौतिपूर्ण आशा का उद्घोष करती है। इसी दिन संविधान सभा ने नए भारत का संविधान प्रस्तुत कर अपनाया; परंतु इसका संवैधानिक अंगीकरण और प्रभावी रूप से लागू होना 26 जनवरी 1950 को हुआ — तभी से भारत एक सम्पूर्ण गणतंत्र बना। यह केवल तारीखों का खेल नहीं; यह एक विचारधारा का रूपांतरण है—सदियों से चली आ रहीं विसंगतियों, भेदभाव और अन्याय के विरुद्ध एक राष्ट्र ने अपनी नई पहचान लिखी। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।
संविधान का निर्माण कोई सादा तकनीकी कार्य नहीं था। यह विचारों, वाद-विवाद और दूरदर्शिता का सम्मिलित उत्पाद था। पर इस संपूर्ण प्रक्रिया का नेतृत्व जिस विद्वान ने किया, वह न केवल संविधान सभा के अध्यक्ष थे, बल्कि भारतीय लोकतंत्र के स्तम्भ — डॉ. भीमराव आंबेडकर थे। उनके नेतृत्व, तर्कशीलता और सामाजिक संवेदना ने यह सुनिश्चित किया कि संविधान केवल शासन-व्यवस्था नहीं, बल्कि समाज को न्याय और समता की ओर मोड़ने वाला निर्देशक बने।
संविधान केवल कलम की स्याही से बना कागज़ नहीं है; यह भारत की नैतिकता और सामाजिक आकांक्षा का लिखित रूप है। यह दस्तावेज़ हमें बताता है कि लोकतंत्र केवल चुनाव नहीं, बल्कि जीवन की शैली है—मानव के अधिकार, गरिमा और समान अवसर की गारंटी। संविधान ने व्यक्तियों को मौलिक अधिकार दिए, पर इसके साथ जिम्मेदारियां भी सौंपीं; यही इसका असली सामंजस्य है।
भारतीय संविधान की विशिष्टताएं हमारे राजनीतिक और सामाजिक जीवन को मार्गदर्शित करती हैं। यह विश्व के सबसे व्यापक लिखित संविधानों में से एक है—यहां व्यक्ति की गरिमा को सर्वोपरि रखा गया; सामाजिक न्याय का सिद्धांत लागू किया गया; धर्मनिरपेक्षता को संवैधानिक मान्यता दी गई; और संघीय ढांचे में केन्द्र व राज्यों के अधिकारों का संतुलन सुनिश्चित किया गया। संविधान ने यह संदेश दिया कि देश का सबसे बड़ा स्वरूप उसकी विविधता में एकता है—भाषा, धर्म, परंपरा और जाति के भेदों के बावजूद एक साझा नैतिक आधार होना चाहिए।
डॉ. आंबेडकर ने बार-बार यह स्पष्ट किया कि संविधान केवल कानूनी प्रावधान नहीं बल्कि सामाजिक और आर्थिक लोकतंत्र की दिशा है। इसी सोच के कारण संविधान ने केवल राजनीतिक अधिकार ही नहीं दिए, बल्कि समाज के पिछड़े वर्गों के लिए समुचित संरक्षण, आरक्षण और अवसरों की व्यवस्था भी की गई—ताकि वह इतिहास की दीवारों से टूट कर मुख्यधारा में आ सकें।
संविधान दिवस (जिसे हम 26 नवंबर के संविधान अपनाने के निर्णय के संदर्भ में याद करते हैं और 26 जनवरी को उसका अंगीकरण मनाते हैं) का अर्थ केवल उत्सव मनाना नहीं है। यह जागरूकता का दिन है—यह याद दिलाने का दिन है कि संविधान को केवल पुस्तक में कैद नहीं रहने देना है; इसे जीवन में उतारना है। संविधान का सार तब तक जीवित नहीं रहेगा जब तक नागरिक उसे अपने आचरण और निर्णयों का आधार नहीं बनाएंगे।
आज के समय में, जब समाज अनेक तरह की चुनौतियों—असमानता, सामाजिक खण्डन, अलगाववाद और हेट स्पीच—का सामना कर रहा है, संविधान हमें प्रत्याशित मूल्य सिखाता है: सहिष्णुता, समता, बंधुत्व और कानूनी शासन। यदि हम इन मूल्यों को अपनाएं तो ही हमारा लोकतंत्र सशक्त रहेगा। वरना, रूप मात्र का संविधान भी मायने खो देगा—डॉ. आंबेडकर की किसी चेतावनी की तरह कि “संविधान कितना भी उत्तम हो, उसे चलाने वाले यदि वह करप्ट या अनैतिक हों तो संविधान विफल हो सकता है।”
संविधान ने हमें अधिकार दिए, पर साथ ही कर्तव्यों का भी बोध कराया—नागरिक होने के नाते प्रत्येक व्यक्ति का दायित्व है कि वह समाज के कमजोर वर्गों की सुरक्षा करे, नियमों का पालन करे और सार्वजनिक हित में कार्य करे। स्वतंत्रता का अर्थ केवल अपना अधिकार चलाना नहीं, बल्कि दूसरों के अधिकारों का सम्मान करना भी है। यही संवैधानिक शिक्षा हर नागरिक को दिल में बैठनी चाहिए।
आज जब डिजिटल युग में असंख्य सूचना उपलब्ध है और राजनीति-समाज के स्वर तेज़ हो गए हैं, संविधान हमें संयम, विवेक और संवाद का पाठ पढ़ाता है। भेदभाव, हिंसा या असहिष्णुता कोई समाधान नहीं, बल्कि वह निशान है उस असफल समाज का जिसने संवैधानिक मूल्यों को भूल दिया। इसलिए संविधान दिवस पर हमारा प्रण यह होना चाहिए कि हम संवैधानिक सिद्धांतों को सिर्फ पाठ्यपुस्तक में न रखें, बल्कि अपने व्यवहार, राजनीति और सामाजिक जुड़ाव में इन्हें प्रतिष्ठित करें।
संविधान हमें यह भी सिखाता है कि देश की मजबूती केवल सत्तारूढ़ संस्थाओं से नहीं, बल्कि जागरूक और जिम्मेदार नागरिकों से आती है। यदि हम अपने अधिकारों के साथ-साथ अपने कर्तव्यों का भी निर्वहन करें—वोट डालें, कानून का पालन करें, अन्याय के खिलाफ आवाज उठाएं, और समाज के कमजोरों की सहायता करें—तो हमारा संविधान अपने वास्तविक लक्ष्यों की दिशा में पहुंचेगा।
अंत में, 26 नवंबर 1949 का दिन और 26 जनवरी 1950 का अंगीकरण—दोनों मिलकर हमें याद दिलाते हैं कि संविधान केवल एक टेक्स्ट नहीं, बल्कि एक जीवंत अनुबंध है—नागरिक और राष्ट्र के बीच। आज हमें इसे पढ़ने के साथ-साथ उसे जीने की ज़रूरत है। यही डॉ. आंबेडकर को सच्ची श्रद्धांजलि होगी—जब हमारा समाज समतामूलक, न्यायसंगत और बंधुत्वपूर्ण बनेगा।
भीम प्रज्ञा अलर्ट
“मनुष्य की असली पहचान उसके शब्दों में नहीं, उसके व्यवहार में दिखाई देती है।
क्योंकि शब्द किसी भी क्षण बदल सकते हैं, पर व्यवहार वही बदलता है, जब भीतर की सोच और चरित्र बदल जाए।”
