Holi festival in India with colorful hands
संपादकीय@Haresh Panwar
धुलंडी: रंगों में घुलती दूरी, मन में खिलती नई शुरुआत
होली के अगले दिन मनाया जाने वाला धुलंडी का पर्व केवल रंग खेलने की परंपरा भर नहीं है, बल्कि यह भारतीय सामाजिक जीवन की गहरी संवेदनाओं और सामूहिकता का उत्सव है। यदि होलिका दहन बुराई के दहन का प्रतीक है, तो धुलंडी अच्छाई, अपनत्व और नए आरंभ का उत्सव है। यह वह दिन है जब लोग एक-दूसरे को रंग लगाकर मन की दूरी मिटाते हैं, वर्ष भर की भूलों को क्षमा करते हैं और रिश्तों में नई ताजगी का संचार करते हैं। मैं यहां बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।
धुलंडी का मूल संदेश है—“मन का मैल धो डालो।” रंगों का स्पर्श केवल चेहरे को नहीं, बल्कि मन के भीतर जमी कड़वाहट को भी धोने का प्रतीक है। जब कोई व्यक्ति अपने से बड़े या छोटे, मित्र या पड़ोसी, सभी को समान भाव से रंग लगाता है, तो वह सामाजिक भेदभाव की दीवारों को कमजोर करता है। यह पर्व हमें सिखाता है कि रिश्तों में आई दरारों को समय रहते भर देना चाहिए, क्योंकि मन में पनपी दूरी समाज को भी कमजोर करती है।
भारतीय संस्कृति में त्योहारों का महत्व केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है। वे सामाजिक समरसता के सशक्त माध्यम हैं। विविधताओं से भरे इस देश में भाषा, वेशभूषा, रीति-रिवाज और परंपराएँ भिन्न हो सकती हैं, पर त्योहार सबको एक सूत्र में बांधते हैं। धुलंडी भी इसी सांस्कृतिक विरासत का जीवंत उदाहरण है। यह दिन हमें याद दिलाता है कि हम चाहे कितने भी अलग क्यों न हों, रंगों की तरह मिलकर ही सुंदरता का सृजन करते हैं।
धुलंडी का एक और महत्वपूर्ण पक्ष है—हंसी, मजाक और स्वांग की परंपरा। इस दिन व्यंग्य, ठिठोली और हास-परिहास के माध्यम से लोग मन का बोझ हल्का करते हैं। समाज में जो तनाव वर्ष भर जमा होता है, वह इस दिन हंसी में घुल जाता है। यह सामूहिक मनोरंजन केवल आनंद का साधन नहीं, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य का भी आधार है। जब लोग खुलकर हंसते हैं, एक-दूसरे को छेड़ते हैं और मिलकर गीत गाते हैं, तो उनके बीच आत्मीयता का भाव मजबूत होता है।
त्योहारों के पीछे केवल दंतकथाओं का महत्व नहीं है। वे प्रकृति और ऋतु परिवर्तन से भी गहराई से जुड़े हैं। फाल्गुन मास के अंत और वसंत ऋतु के आगमन के साथ धुलंडी मनाई जाती है। यह वह समय है जब सर्दी विदा लेती है और मौसम में गर्माहट आने लगती है। खान-पान में भी परिवर्तन का यही अवसर है। पारंपरिक व्यंजन, मिठाइयाँ और पेय पदार्थ शरीर को बदलते मौसम के अनुरूप ढालने में सहायक होते हैं। इस प्रकार त्योहार केवल आध्यात्मिक ही नहीं, बल्कि व्यावहारिक और वैज्ञानिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण हैं।
आज के समय में जब समाज अनेक प्रकार की वैचारिक, सामाजिक और व्यक्तिगत दूरियों से जूझ रहा है, धुलंडी का संदेश और अधिक प्रासंगिक हो जाता है। आधुनिक जीवन की व्यस्तता, प्रतिस्पर्धा और डिजिटल दूरी ने मानवीय संवाद को सीमित कर दिया है। ऐसे में रंगों का यह पर्व हमें आमने-सामने आकर संवाद करने और संबंधों को पुनर्जीवित करने का अवसर देता है।
हालांकि यह भी आवश्यक है कि हम इस पर्व की मर्यादा और मूल भावना को बनाए रखें। रंगों की आड़ में किसी की भावनाओं को ठेस पहुँचाना, जबरदस्ती करना या असंयमित व्यवहार करना इस उत्सव की आत्मा के विपरीत है। धुलंडी का अर्थ है—सहमति, सम्मान और सौहार्द के साथ रंगों का आदान-प्रदान। यदि हम इस संतुलन को बनाए रखें, तो यह पर्व सचमुच समाज को जोड़ने का माध्यम बन सकता है।
धुलंडी हमें यह भी सिखाती है कि जीवन में रंगों की आवश्यकता है। यदि केवल श्वेत-श्याम दृष्टिकोण अपनाया जाए, तो जीवन नीरस हो जाएगा। विविध विचार, विविध व्यक्तित्व और विविध संस्कृतियाँ मिलकर ही समाज को समृद्ध बनाती हैं। रंगों का यह प्रतीकात्मक संदेश हमें सहिष्णुता और स्वीकार्यता की सीख देता है।
अंततः, धुलंडी केवल रंगों का खेल नहीं, बल्कि आत्मिक शुद्धि और सामाजिक समरसता का उत्सव है। यह हमें अवसर देता है कि हम वर्ष भर की गलतियों को स्वीकार कर क्षमा माँगें और दूसरों को क्षमा करें। मन की बुराइयों को त्यागकर अच्छाई और खुशी को जागृत करें।
यदि हम इस पर्व के मूल संदेश को समझ लें और उसे व्यवहार में उतारें, तो धुलंडी केवल एक दिन का उत्सव नहीं, बल्कि पूरे वर्ष की सकारात्मकता का आधार बन सकती है। रंगों में घुलती यह आत्मीयता ही भारतीय संस्कृति की असली पहचान है—जहाँ विविधताओं के बीच एकता का इंद्रधनुष सदा चमकता रहता है।
भीम प्रज्ञा अलर्ट
“रिश्तों की मिठास शब्दों से नहीं, व्यवहार से बनी रहती है;
इसलिए बोलने से पहले सोचें और निभाने से पहले समझें।”
