फतेहाबाद में ‘ऑपरेशन जीवन ज्योति’ बना नशा पीड़ितों के लिए जीवनदान
रजत विजय रंगा
भीम प्रज्ञा न्यूज़.फतेहाबाद। नशा सिर्फ शरीर को नहीं खाता, वह इंसान की आत्मा को धीरे-धीरे खोखला कर देता है, रिश्तों से रंग छीन लेता है, घर की हंसी को खामोशी में बदल देता है और सपनों की जगह आंखों में आंसू भर देता है। नशे की गिरफ्त में फंसा इंसान सबसे पहले खुद से हारता है, फिर परिवार से और आखिरकार समाज से कट जाता है। लेकिन कहते हैं—अगर अंधेरे में कोई सच्चे मन से हाथ थाम ले, तो बुझती हुई जिंदगी फिर से रोशन हो सकती है।फतेहाबाद जिले के गांव भरपूर से सामने आई अरुण कुमार की कहानी इसी सच्चाई की मिसाल है। अरुण कभी एक साधारण, मेहनती युवक था। माता-पिता की उम्मीदें उसी से जुड़ी थीं, पत्नी के लिए वह सहारा था और दो छोटे बच्चों का भविष्य उसके कंधों पर टिका था। लेकिन करीब आठ साल पहले नशे ने चुपचाप उसकी जिंदगी में दस्तक दी। पहले चिट्टा और उसके बाद मेडिकल नशा—हर कदम के साथ अरुण अपने परिवार और समाज से दूर होता चला गया। पिता बनने के बाद भी हालात नहीं बदले। घर में गरीबी, कलह और निराशा ने डेरा डाल लिया और रिश्ते टूटने लगे। परिवार की आंखों में केवल दर्द बचा। अक्सर ऐसे समय में समाज मुंह मोड़ देता है, कहता है—“यह तो खुद की गलती है।” लेकिन फतेहाबाद में कहानी कुछ और ही लिखी जा रही थी। यहां प्रशासन और समाज ने मिलकर यह तय किया कि नशे में फंसा युवक अपराधी नहीं, बल्कि मदद का हकदार इंसान है। पुलिस अधीक्षक सिद्धांत जैन, आईपीएस की यही सोच ‘ऑपरेशन जीवन ज्योति’ का आधार बनी—एक ऐसा अभियान जो सजा नहीं देता, बल्कि सहारा देता है; जो डांट नहीं, दिशा देता है।
इसी अभियान से प्रेरित होकर गांव भरपूर के सरपंच प्रतिनिधि दिनेश कुमार भारती आगे आए। उन्होंने अरुण को नशेड़ी नहीं, बल्कि अपने गांव का भटका हुआ बेटा माना। उन्होंने अरुण के भाई प्रहलाद से बात की, पुलिस अधीक्षक से मार्गदर्शन लिया और मन में ठान लिया—“इस युवक को नशे में नहीं, जिंदगी में लौटाना है।
इसके बाद शुरू हुआ भरोसे और धैर्य का सफर। पुलिस अधीक्षक के निर्देश पर नशा मुक्ति टीम प्रभारी सुंदर लाल ने अरुण की लगातार काउंसलिंग की। उसे समझाया गया, संभाला गया और बार-बार यह एहसास दिलाया गया कि वह अकेला नहीं है। करीब तीन महीने तक अरुण को नशा मुक्ति केंद्र में रखा गया। इलाज चला, दवाइयां मिलीं और हर दिन उसे यह सिखाया गया कि जिंदगी अभी खत्म नहीं हुई है। इस कहानी का सबसे भावुक पहलू यह है कि अरुण के इलाज का खर्च सरपंच प्रतिनिधि दिनेश कुमार भारती ने खुद उठाया। न कोई प्रचार, न कोई दिखावा—बस एक सच्चा संकल्प कि एक परिवार टूटने से बच जाए। और आज वही अरुण कुमार पूरी तरह नशा मुक्त है। उसकी आंखों में अब शर्म नहीं, आत्मसम्मान है। पत्नी प्रीतम देवी की आंखों में डर की जगह सुकून है। बेटे रचित और जतिन आज गर्व से अपने पिता का हाथ थामे चलते हैं। जो घर कभी उजड़ चुका था, वहां फिर से हंसी लौट आई है। साथ ही नशे की जड़ों पर सख्त कार्रवाई भी लगातार जारी है। पुलिस अधीक्षक सिद्धांत जैन, आईपीएस के नेतृत्व में जिले में करीब 347 अभियोग दर्ज किए गए, जिसमें 725 नशा तस्करों को जेल भेजा गया और करोड़ों रुपये का मादक पदार्थ जब्त किया गया। यह दर्शाता है कि यह लड़ाई सिर्फ भावनाओं की नहीं, बल्कि ठोस कार्रवाई की भी है।
अरुण की कहानी ने कई और कहानियों को जन्म दिया। प्रेरित होकर जिले के 9 गांवों की पंचायतों—फूला, बुर्जा, चिम्मो, चदों, मुशींवाला, लधुवास, अलीपूर बरोटा और कुनाल ने आगे आकर अपने-अपने गांवों के नशे से ग्रस्त दो-दो युवाओं को गोद लेने का संकल्प लिया। सरपंच अपने स्तर पर उनके इलाज, भोजन और देखभाल की जिम्मेदारी उठा रहे हैं। यह दिखाता है कि जब समाज जागता है, तो बदलाव सिर्फ संभव नहीं, बल्कि स्थायी होता है। यह कहानी सिर्फ अरुण कुमार की नहीं है। यह हर उस परिवार की कहानी है, जो किसी अपने को नशे में खो चुका है। यह उस सोच की कहानी है, जो कहती है कि “अगर एक युवा बच गया, तो एक परिवार बच गया… और अगर परिवार बचा, तो समाज बच गया।” आज ‘ऑपरेशन जीवन ज्योति’ केवल एक सरकारी अभियान नहीं रहा। यह नशे के अंधेरे में भटके हर इंसान के लिए उम्मीद की किरण बन चुका है—एक नई शुरुआत, एक नई रोशनी।
