संपादकीय @Advocate Haresh Panwar
खाकी बनाम काली वर्दी: टकराव नहीं, न्याय की राह पर संवाद की ज़रूरत
राजस्थान में पुलिस और वकालत—दोनों ही लोकतंत्र की रीढ़ माने जाते हैं। एक समाज को कानून का पालन करवाती है, दूसरी कानून की व्याख्या कर जनता को न्याय दिलाती है। परंतु हाल के दिनों में जोधपुर के बाद उदयपुर की घटना ने “खाकी वर्दी” और “काली वर्दी” के बीच बढ़ते तनाव को उजागर कर दिया है। उदयपुर के नाई थाना क्षेत्र में वकील और हेड कांस्टेबल के बीच कहासुनी से शुरू हुआ विवाद थप्पड़ तक पहुँच गया और उसके बाद जो हुआ, वह पूरे प्रदेश की कानून व्यवस्था के लिए एक चेतावनी की घंटी है। वकीलों का लामबंद होना, DSP की गाड़ी रोकना और पुलिस प्रशासन का दबाव में आकर तुरंत हेड कांस्टेबल को लाइन हाजिर करना—ये सभी घटनाएं बताती हैं कि मामला कितना संवेदनशील है और जनता इस संघर्ष को किस नजर से देख रही है। यह मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह नहीं है कि गलती किसकी थी। सबसे बड़ा सवाल यह है कि गलती इन दोनों के रिश्ते में क्या है? क्योंकि पुलिस और वकील दो पहिये हैं—कानून और न्याय के। एक पहिया भी लड़खड़ा जाए तो व्यवस्था की पूरी गाड़ी पलट जाती है। जोधपुर और उदयपुर की घटनाओं ने उस कड़वे सच को सामने ला दिया है, जिसका सामना हम वर्षों से कर रहे हैं—दोनों वर्दियों के बीच अविश्वास गहराता जा रहा है। और जितना अविश्वास बढ़ता है, जनता उतनी ही असुरक्षित होती जाती है।
दरअसल, समस्या घटनाओं की नहीं—सोच की टकराहट की है।
पुलिसकर्मी दबाव में काम करते हैं, लगातार तनाव, एस्केलेशन और तत्काल कार्रवाई का बोझ उनके कंधों पर रहता है। दूसरी तरफ वकील न्याय के लिए लड़ते हैं और अधिकार की भावना उनमें गहराई तक होती है। दोनों अपनी-अपनी जगह सही भी हैं, ज़रूरी भी। लेकिन जब संवाद की जगह अहंकार आ जाए तो टकराव तय है।
थानों में वकीलों का अपमान हो या अदालत परिसरों में पुलिस पर हमले—दोनों ही लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए घातक हैं। कानून के रक्षक और कानून के व्याख्याता जब एक-दूसरे से लड़ने लगें, तब अपराधी मुस्कुराने लगते हैं और आम नागरिक सबसे ज्यादा भयभीत होता है। यह स्थिति किसी भी परिपक्व समाज के लिए उचित नहीं।
सवाल उठता है—फिर समाधान क्या?
क्या केवल लाइन हाजिर कर देना ही न्याय है?
क्या पुलिस के खिलाफ कार्रवाई कर देना ही वकालत की जीत है?
या क्या वकीलों का विरोध थाम लेना ही पुलिस की प्रतिष्ठा बचा लेगा?
नहीं।
समाधान “कार्रवाई” में नहीं—समाधान “संवाद” में है।
जहाँ मुकदमे अदालत में तय होते हैं, पर रिश्ते हमेशा टेबल पर तय होते हैं।
राज्य सरकार और पुलिस विभाग को चाहिए कि हर जिले में पुलिस-वकील समन्वय समिति बनाई जाए, जहां हर महीने बैठक हो, शिकायतें सुनी जाएं, और कार्यप्रणाली का समन्वय बढ़ाया जाए। इसी तरह बार काउंसिल को भी अपने सदस्यों को कानून, अनुशासन और पेशेवर व्यवहार के मानकों का प्रशिक्षण समय-समय पर देना चाहिए। खाकी और काली—दोनों वर्दियों को यह समझना होगा कि सम्मान एक-दूसरे से छीना नहीं जाता, व्यवहार से कमाया जाता है।
एक और कठोर सच भी स्वीकार करना होगा—
थाने हों या अदालतें, इन जगहों पर शक्ति प्रदर्शन नहीं, संयम सबसे बड़ी ताकत है।
क्योंकि जैसी व्यवस्था लोग बनाते हैं, वैसी ही व्यवस्था उनके लिए भविष्य बनाती है।
असल प्रश्न यह नहीं है कि उदयपुर में किसने थप्पड़ मारा, किसने गुस्सा किया, किसने गाड़ी रोकी। सही प्रश्न यह है कि “क्या थप्पड़ ही अब संवाद की भाषा बन गई है?”
क्या कानून के संरक्षक और न्याय के साधक बातों से नहीं—बल प्रयोग से रास्ते तय करेंगे? अगर यह सोच पनपने लगी तो समाज का संतुलन टूटने में देर नहीं लगेगी।
एक कलमकार का धर्म है—साहस के साथ सत्य कहना।
और सत्य यही है कि दोनों वर्दियां सम्मान की पात्र हैं, पर कोई भी वर्दी कानून से ऊपर नहीं।
जो गलत है, वह चाहे सिपाही करे या वकील—गलत ही है।
और जो सही है, वह बिना भय और बिना पक्षपात के कहा जाना चाहिए।
आज ज़रूरत है कि हम भावनाओं से नहीं—विवेक से सोचें।
क्योंकि अगर खाकी और काली वर्दी के बीच दूरियाँ बढ़ीं, तो नुकसान पूरे समाज को होगा।
और अगर दोनों मिलकर चलें, तो न्याय और सुरक्षा दोनों मजबूत होंगे।
राजस्थान में हो रही ये घटनाएँ चेतावनी हैं—
अब वक्त टकराव का नहीं, सुधार का है।
और सुधार वही कर सकते हैं, जिनके हाथ में व्यवस्था की दोनों तरफ की डोर है—पुलिस और वकील।
दोनों को याद रखना चाहिए—
“सम्मान दो… तभी सम्मान मिलेगा, वरना व्यवस्था नहीं—अराजकता बढ़ेगी।”
ये टकराव नहीं, विश्वास पुनर्स्थापना का समय है।
और अगर इस सच को स्वीकार कर लिया जाए तो राजस्थान ही नहीं, पूरा देश राहत की साँस लेगा।
भीम प्रज्ञा अलर्ट
“मन का बोझ जितना हल्का होगा, जीवन की यात्रा उतनी ही सरल होगी…
लेकिन लोग सामान कम करने के बजाय, शिकायतें और अपेक्षाएँ ज़्यादा जुटाते जाते हैं।”
