29-30 नवंबर 2025 को सांची में लगा श्रद्धालुओं का तांता, देश-विदेश से लाखों लोगों ने किए सारिपुत्त और महामोग्गलायन के पवित्र अस्थि अवशेषों के दर्शन
भीम प्रज्ञा न्यूज़.सांची/मध्य प्रदेश। ऐतिहासिक बौद्ध तीर्थ स्थल सांची में 29 और 30 नवंबर 2025 को दो दिवसीय भव्य सांची महोत्सव का आयोजन किया गया, जिसमें तथागत बुद्ध की विरासत को नमन करने के लिए देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु उमड़े। सिरीलंका की महाबोधि सोसाइटी द्वारा किया जाता है, जिसके कारण ही सांची विश्वपटल पर अपनी चमक बिखेर पाया है। महोत्सव में वक्ताओं ने जोर दिया कि सिरीलंका का भारत पर बड़ा एहसान है, जिसने भारत से विलुप्त हुए धम्म को न केवल बचाया, बल्कि अपने देश में सुरक्षित भी रखा। सांची-विदिशा वही ऐतिहासिक स्थल है जहां से भिक्षु महेंद्र और भिक्षुणी संघमित्रा धम्म के प्रचार के लिए सिरीलंका गए थे।पवित्र अस्थि अवशेषों के दर्शन
महोत्सव का मुख्य आकर्षण भगवान बुद्ध के दो प्रमुख धम्म सेनापति और ज्येष्ठ भिक्षुओं, सारिपुत्त और महामोग्गलायन के पवित्र अस्थि अवशेषों का प्रदर्शन रहा। इस पावन दिन इन अवशेषों को लोगों के दर्शनार्थ रखा गया। इसके उपरांत, इन पवित्र अवशेषों को एक भव्य झांकी में सजाकर शोभायात्रा के द्वारा चेतियागिरी विहार से स्तूपों तक ले जाया गया, जहां श्रद्धालुओं ने परिदक्षिणा की। दर्शन के बाद अस्थि अवशेषों को वापस विहार में सुरक्षित बंद कर दिया गया। ये अवशेष सन् 1851 में सर अलेक्जेंडर कनिंघम द्वारा स्तूप संख्या तीन की खुदाई के दौरान प्राप्त किए गए थे। देश-विदेश से आए लाखों लोगों ने इस गौरवशाली ऐतिहासिक स्मारक के महोत्सव में शामिल होकर बुद्ध, धम्म और संघ के प्रति अपनी कृतज्ञता और गहरी श्रद्धा प्रकट की। सारिपुत्त और महामोग्गलायन राजगीर के अति अमीर ब्राह्मण परिवारों में जन्मे परममित्र थे, जिन्होंने एक साथ भिक्षु बनकर धम्म के प्रचार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।श्रद्धालुओं ने उनके महान योगदान को नमन किया, जिसके कारण बुद्ध का मानव कल्याणकारी धम्म विश्व में इतना विराट स्वरूप धारण कर सका। सिरीलंका महाबोधी सोसायटी का सांची के म्यूजियम के पास एक बहुत बड़ा सुंदर विहार भी है, जहाँ सांची आने वाला कोई भी यात्री ठहर सकता है।
