संपादकीय@Haresh Panwar
सेल्फी संस्कृति : राष्ट्रीय सेवा योजना की आत्मा पर औपचारिकता का हमला
राष्ट्रीय सेवा योजना (एनएसएस) का जन्म किसी प्रमाण-पत्र उत्पादन केंद्र के रूप में नहीं हुआ था। इसका मूल उद्देश्य था—युवाओं में राष्ट्रबोध, सेवा-भाव, श्रम की गरिमा और सामाजिक संवेदना का विकास। यह योजना विद्यार्थियों को कक्षा की चारदीवारी से बाहर निकालकर समाज की वास्तविकताओं से जोड़ने का माध्यम बनी थी। लेकिन वर्तमान परिप्रेक्ष्य में यह गंभीर प्रश्न खड़ा हो गया है कि क्या राष्ट्रीय सेवा योजना आज भी अपने मूल उद्देश्य को साध पा रही है, या फिर यह भी हमारी शिक्षा व्यवस्था की तरह औपचारिकता की भेंट चढ़ चुकी है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।
आज अधिकांश कॉलेजों में एनएसएस शिविरों का स्वरूप चिंताजनक रूप से सतही होता जा रहा है। शिविर का अर्थ अब सामाजिक सरोकार नहीं, बल्कि “फोटो अवसर” बनकर रह गया है। हाथ में झाड़ू, चेहरे पर बनावटी मुस्कान, मोबाइल कैमरे की ओर झुका हुआ सिर और अगले दिन अखबार के कोने में छपी एक तस्वीर—यहीं पर शिविर की इतिश्री मान ली जाती है। कई जगह तो स्थिति इससे भी आगे बढ़ चुकी है, जहां पुरानी तस्वीरें चिपकाकर, कागज़ी रिपोर्ट तैयार कर, सरकारी अनुदान का औपचारिक हिसाब देकर शिविर संपन्न होने का नाटक कर लिया जाता है।
यह व्यंग्य नहीं, बल्कि कड़वी सच्चाई है कि सेवा अब “सेल्फी-संस्कृति” में बदलती जा रही है। राष्ट्र सेवा का भाव, समाज के प्रति उत्तरदायित्व और श्रमदान की चेतना—ये शब्द अब फाइलों और भाषणों तक सीमित रह गए हैं। प्रश्न यह नहीं है कि युवा में जिज्ञासा या ऊर्जा की कमी है; प्रश्न यह है कि क्या हम उन्हें सही दिशा दे पा रहे हैं?
राष्ट्रीय सेवा योजना के शिविरों का उद्देश्य विद्यार्थियों को जीवन-कौशल सिखाना, आत्मनिर्भरता का अनुभव कराना और सामाजिक समस्याओं को समझने की दृष्टि देना था। ग्रामीण विकास, स्वच्छता, नशामुक्ति, पर्यावरण संरक्षण, साक्षरता, महिला सशक्तिकरण जैसे विषय केवल पोस्टर लगाने या भाषण सुनने के लिए नहीं थे, बल्कि उन्हें जमीन पर उतरकर समझने के लिए थे। किंतु आज स्थिति यह है कि न छात्रों में उत्साह बचा है, न आयोजकों में प्रतिबद्धता। शिविर कई बार केवल उपस्थिति और प्रमाण-पत्र का सौदा बनकर रह गया है।
यह भी एक कटु सत्य है कि मोबाइल स्क्रीन और आभासी दुनिया ने युवाओं को वास्तविक समाज से काट दिया है। राष्ट्रीय सेवा योजना इस दूरी को पाटने का एक सशक्त माध्यम हो सकती थी, लेकिन जब स्वयं योजना ही औपचारिकता में उलझ जाए, तो परिणाम वही होता है जो आज दिख रहा है—युवा ऊर्जा का क्षरण। राष्ट्र की युवा संपदा, जो परिवर्तन की वाहक हो सकती थी, वह या तो निष्क्रिय हो रही है या फिर दिशाहीन।
इस पूरे परिदृश्य में शिक्षकों और एनएसएस प्रभारियों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। शिक्षक यदि यह कहकर अपनी जिम्मेदारी से बच निकलें कि “आज का युवा सुनता नहीं”, तो यह भविष्य के लिए खतरनाक संकेत है। शिक्षक केवल पाठ्यक्रम पढ़ाने वाला नहीं, बल्कि दिशा देने वाला होता है। यदि शिक्षक स्वयं समय के साथ अपडेट नहीं होंगे, सामाजिक यथार्थ से नहीं जुड़ेंगे और नई तकनीकों—जैसे एआई, डिजिटल टूल्स और आधुनिक ज्ञान-प्रणालियों—के साथ कदमताल नहीं करेंगे, तो उनका प्रभाव धीरे-धीरे क्षीण होता जाएगा।
राष्ट्रीय सेवा योजना को पुनः जीवंत बनाने के लिए आवश्यक है कि इसे कागज़ से निकालकर धरातल पर उतारा जाए। शिविरों में केवल साफ-सफाई का दिखावा नहीं, बल्कि वास्तविक समस्याओं पर काम हो। छात्रों को फील्डवर्क, ग्राउंड रिपोर्टिंग, सामाजिक सर्वेक्षण, संवाद और सामूहिक श्रम के अनुभव दिए जाएं। जब छात्र स्वयं किसी बस्ती की समस्या को समझेगा, समाधान खोजेगा और उसमें अपनी भूमिका देखेगा, तभी उसके भीतर सेवा-भाव का अंकुर फूटेगा।
युवाओं को भी आत्ममंथन करना होगा। राष्ट्रीय सेवा योजना को बोझ या मजबूरी नहीं, बल्कि साधना के रूप में देखना होगा। राष्ट्रभक्ति केवल नारों से नहीं, बल्कि समाज के अंतिम व्यक्ति के साथ खड़े होने से पैदा होती है। श्रम सेवा, सामाजिक सद्भाव और संवेदनशीलता—ये ऐसे मूल्य हैं जो शिविरों के अनुभव से ही विकसित हो सकते हैं, बशर्ते उन्हें ईमानदारी से जिया जाए।
आज आवश्यकता इस बात की है कि राष्ट्रीय सेवा योजना को प्रमाण-पत्र आधारित कोर्स नहीं, बल्कि चरित्र निर्माण की प्रयोगशाला बनाया जाए। यदि यह योजना सही मायने में लागू हो, तो यही शिविर युवा को आत्मनिर्भर, आत्मसम्मानी और जिम्मेदार नागरिक बना सकते हैं। अन्यथा, झाड़ू हाथ में लेकर खिंचवाई गई तस्वीरें और फाइलों में सजी रिपोर्टें इतिहास के पन्नों में एक और खोखली योजना के रूप में दर्ज हो जाएंगी।
अंततः सवाल यह नहीं है कि शिविर लगे या नहीं, सवाल यह है कि शिविरों में “सेवा” जीवित है या केवल उसका अभिनय चल रहा है। यदि हमने अब भी आत्ममंथन नहीं किया, तो राष्ट्रीय सेवा योजना का नाम तो बचेगा, लेकिन उसकी आत्मा कहीं खो जाएगी—और यह क्षति केवल एक योजना की नहीं, बल्कि राष्ट्र के भविष्य की होगी।
भीम प्रज्ञा अलर्ट
जो समाज युवाओं को केवल प्रमाण-पत्र देना सीखाता है और सेवा करना भूल जाता है,
वह भविष्य में भीड़ तो पैदा करता है, लेकिन जिम्मेदार नागरिक नहीं।

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