41 रोगीयों को बीडीके अस्पताल में सेवाएं प्रदान की गई
प्रारंभिक तौर पर लेक्टोज फर्मेटिंग बैक्टीरिया की वृद्धि आई है। जिस पर सामान्य एंटीबायोटिक दवाएं असरदार नहीं है।
भीम प्रज्ञा न्यूज़.झुंझुनूं।
जिले के सबसे बड़े राजकीय बीडीके अस्पताल झुंझुनूं में फूड पाॅइजनिंग से ग्रसित रोगीयों को उपचार के उपरांत छुट्टी प्रदान की गई। निजी होटल में हुए शादी समारोह में सैंकड़ों की संख्या में आमजन को उल्टी-दस्त, पेट दर्द की शिकायते हुई। जिन्हें सरकारी एवं निजी अस्पतालों में भर्ती कराया गया था।
पीएमओ एवं वरिष्ठ शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ जितेन्द्र भाम्बू ने बताया कि फूड पाॅइजनिंग से ग्रसित होकर आए रोगीयों का निरंतर उपचार किया जा रहा है। रोगीयों में मुख्यतः डिहाइड्रेशन के लक्षण मिले थे।
क्यों होता है फूड पाॅइजनिंग
पीएमओ डॉ जितेन्द्र भाम्बू ने बताया कि आमतौर खाद्य पदार्थों में किसी भी प्रकार से जीवाणुओं की संख्या में अप्रत्याशित बढ़ोतरी हो जाती है। जिससे मानव शरीर सामान्य तौर पर सामान्य प्रतिरोधक क्षमता से लड़ने में असमर्थ होता है।
कौनसे जीवाणु फूड पाॅइजनिंग करते हैं
बैक्टीरिया-ई.कोली,सालमोनैला,बैसिलस,कोलेरा,कैम्पाईलोबैक्टर,
वायरस -रोटा,एस्ट्रो, मुख्यतः खाने में पूर्व निर्मित टाॅक्सिन तुरंत लक्षण उत्पन्न करते हैं। जो एकसाथ कई लोगों को बिमार कर सकते हैं।
फ़ूड पाइजनिंग के कारक -दुग्ध उत्पाद -समुद्र तटिय इलाकों में मांस, मछली, अंडे रहते हैं ।
दुध एवं दूध से निर्मित खाद्य पदार्थ मुख्यतः पूर्णतः पाश्चूराईज नहीं होने एवं बैक्टीरिया की वृद्धि के लिए अच्छा मिडिया बनने से तीव्र वृद्धि करते हैं। दुग्ध जनित खाद्य पदार्थों का सही तरीके से उचित तापमान पर गर्म करने पाश्चुराइज्ड कर ही संग्रहित किया जाए।
दुग्ध से बनने वाले उत्पाद-पनीर, दही, छाछ, मावा, आइसक्रीम का प्रयोग शादी समारोह में अधिकता से किया जाता है। बैक्टीरिया की वृद्धि उक्त दुग्ध जनित खाद्य पदार्थों के रंग,स्वाद,गंध में अप्रत्याशित बदलाव लाती है। जिसकी शंका होने पर सैम्पलिंग कर जांच करवायी जा सकतीं हैं। इसी के साथ दुग्ध जनित खाद्य पदार्थों में विभिन्न प्रकार की मिलावट इस समस्या को और बढ़ावा दे सकती है। अत्यधिक मात्रा में बनने वाले खाने की परिवारजनों द्वारा खाने से पूर्व जांच करवाकर फूड पाॅइजनिंग से बचा जा सकता है।
फूड पाइजनिंग के लक्षण
फूड पाइजनिंग के लक्षण जी मिचलाना, उल्टी जैसा होना, उल्टी, दस्त, पेट दर्द, बुखार, दस्त में खून आना, पीला पड़ना, अर्दनिद्रा में जाना, बेहोशी आना आदि दिखाई देते हैं।
उपचार-
फिजिशियन डॉ उमेश चाहर ने बताया कि सामान्यतः टाक्सिन उल्टी के द्वारा मुख से अथवा दस्त के द्वारा शरीर से बाहर आता है। इसके साथ शरीर से अनेको स्राव होने से शरीर में पानी की कमीं होने लगती है। जो हृदय,लीवर,किडनी, मस्तिष्क जैसे अंगों पर आक्सीजन आपूर्ति प्रभावित करती है। अतः निर्जलीकरण की प्रक्रिया को समयबद्ध तरीके से सही करना आवश्यक होता है। नींबू पानी, नारियल पानी का थोड़ा-थोड़ा बार-बार सेवन करना चाहिए ।
-ओआरएस का प्रयोग -आराम
-चिकित्सक से परामर्श, फूड पाइजनिंग में मुख्यतः सहयोगात्मक एवं लक्षणात्मक उपचार से अधिकांश रोगीयों को बचाया जा सकता है। 90 प्रतिशत रोगीयों को रोग प्रतिरोधक क्षमता के अनुसार घरेलू उपचार, ओपीडी उपचार से स्वस्थ किया जा सकता है। 10 प्रतिशत रोगीयों को लक्षणों में वृद्धि होने पर भर्ती की आवश्यकता पड़ सकती है।
लैब प्रभारी डॉ सपना झाझडिया ने बताया कि सैम्पलिंग में प्रारंभिक तौर पर लेक्टोज फर्मेटिंग बैक्टीरिया की वृद्धि आ रही है। जिसका सत्यापन पूर्ण वृद्धि के बाद ही हो सकेंगा। जिस पर सामान्य एंटीबायोटिक दवाएं असरदार नहीं है।
दुग्ध जनित खाद्य पदार्थों से फूड पाॅइजनिंग से बचाव
-दुग्ध एवं दुग्ध जनित खाद्य पदार्थों यथा पनीर,मावा,दही,छाछ, आईसक्रीम की शुद्धता की जांच समय-समय पर अवश्य करवाएं।
-खाद्य पदार्थ बनाने वाले हलवाई एवं परोसने वाले व्यक्ति साफ-सफाई,हैंड हाईजीन,मक्खी एवं कीट-पतंगों का विशेष ध्यान रखें। संदिग्ध दुग्ध जनित खाद्य पदार्थों की सूचना चिकित्सा विभाग को देवे ताकि सैम्पलिंग कर जांच उपरांत दूषित सामग्री को नष्ट किया जा सके। समूह में एक-साथ उल्टी-दस्त, पेट दर्द,जी मिचलाना जैसे लक्षण आने पर अविलंब नजदीकी स्वास्थ्य केंद्र एवं आपातकालीन सेवा केन्द्र पर सूचना देवें एवं परामर्श लेवें। दुग्ध जनित खाद्य पदार्थों के रंग में बदलाव, दही एवं छाछ की गंध में खट्टापन आना, पनीर में फैलाव आना,रंग में बदलाव आना,मावा में ऱग,गंध में बदलाव आना जीवाणुओं की अप्रत्याशित बढ़ोतरी का आरंभिक संकेत है । जिसे जांच उपरांत टाला जा सकता है। बिना पाश्चुराइज्ड किए दुग्ध जनित खाद्य पदार्थों के सेवन से परहेज़ करें।
