संपादकीय@एडवोकेट हरेश पंवार
कहावत है—“कुछ लोग भरोसे के लिए रोते हैं और कुछ लोग भरोसा करके रोते हैं।”
यह वाक्य आधुनिक समाज की उस कड़वी सच्चाई का आईना है, जिसमें भरोसा अब भावनाओं का नहीं, बल्कि परिस्थितियों का सौदा बन गया है। आज विश्वास एक ऐसी पूँजी है जिसकी कीमत तो बहुत है, पर जिसका संरक्षण सबसे कठिन है। समाज के बदलते चरित्र, रिश्तों का व्यावसायीकरण, राजनीति की चालाकी और सोशल मीडिया की कृत्रिम चमक ने भरोसे की असलियत को लेकर लोगों को गहरे भ्रम में डाल दिया है।
विश्वास किसी भी सभ्य समाज की नींव होता है—पर जब वही नींव चटकने लगे, तो इमारत चाहे रिश्तों की हो या संस्थाओं की, उसका गिरना निश्चित है। आज जो लोग भरोसे की तलाश में रोते हैं, वे अकेले नहीं; उतने ही लोग भरोसा करके भी आहें भर रहे हैं। सवाल यह है कि आखिर समाज किस मोड़ पर आकर खड़ा हो गया है!
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भरोसा—अब एक दुर्लभ भावनात्मक संपत्ति
आज रिश्ते पहले से कहीं अधिक जटिल हो गए हैं।
लोग कहते हैं कि भरोसा कम हो गया है, पर सच यह है कि भरोसा तो वही है—
कम लोग अब उसके योग्य रह गए हैं।
मित्रता में विश्वास टूटता है,
परिवार में आपसी समझ घटती है,
प्रेम में छल की कहानियाँ बढ़ती हैं,
राजनीति में वादों का अंतिम संस्कार हो चुका है,
सोशल मीडिया पर सच्चाई ढूँढने से भी नहीं मिलती।
नतीजा यह है कि लोग भरोसे की तलाश में भटक रहे हैं—
और जब किसी पर भरोसा करते हैं तो उसके टूटने का डर उन्हें अंदर से खोखला कर देता है।
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भरोसे का टूटना—आज की सबसे बड़ी सामाजिक त्रासदी
भरोसे का टूटना सिर्फ भावनात्मक चोट नहीं देता,
यह इंसान के भीतर के ‘मानव’ को भी घायल कर देता है।
जो व्यक्ति एक बार धोखा खाता है, वह अगली बार भरोसा करने से डरता है।
धीरे-धीरे समाज अविश्वास की दीवारों से घिर जाता है—
जहाँ हर व्यक्ति दूसरे को शक की नज़र से देखने लगता है।
यही कारण है कि—
घरों में संवाद टूट रहा है,
दोस्ती में दूरी बढ़ रही है,
रिश्ते दिखावे के बंधनों में बदलते जा रहे हैं।
एक समय था जब लोग भरोसा करके सहारा पाते थे,
आज भरोसा करके ही घाव पा रहे हैं।
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व्यंग—भरोसा अब “इंश्योरेंस पॉलिसी” की तरह हो गया है
यदि भरोसे की वर्तमान स्थिति को व्यंगात्मक रूप में देखें,
तो लगता है कि भरोसा अब एक “इंश्योरेंस पॉलिसी” जैसा हो गया है—
जो लेने से पहले भी डराती है और लेने के बाद भी शर्तों में उलझाए रखती है।
आजकल के लोग भरोसा देते हुए भी फुटनोट लगा देते हैं—
> “Terms and conditions apply.”
दोस्त कहते हैं—
“हम पर भरोसा करो, पर ज़्यादा मत करो।”
राजनेता कहते हैं—
“हम पर भरोसा रखें, बाकी ईश्वर की मर्जी!”
रिश्ते कहते हैं—
“हम तुम्हारे हैं, जब तक हालात अनुकूल रहें।”
और सोशल मीडिया तो खुलकर कहता है—
“हम पर जो दिख रहा है, उस पर भरोसा मत करना!”
समाज इस आत्मविरोधाभासी मोड़ पर खड़ा है कि भरोसा करने वाले को भी दोषी ठहरा दिया जाता है—
जैसे विश्वास करना उसका अपराध हो।
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भरोसे की मृत्यु—और उसका सामाजिक प्रभाव
जब समाज में विश्वास की मृत्यु होती है,
तो उसके परिणाम बहुत व्यापक होते हैं—
1. तनाव और मानसिक अवसाद बढ़ता है
धोखा खाया इंसान दूसरों से कटने लगता है।
भय और अविश्वास उसे मानसिक रूप से कमजोर कर देते हैं।
2. रिश्ते खोखले और औपचारिक हो जाते हैं
जहां भरोसा नहीं, वहाँ भावनाएँ भी अस्थायी होती हैं।
3. सामाजिक ताना-बाना बिखरने लगता है
विश्वास समाज की अदृश्य दीवार है—
इसके बिना कोई समुदाय लंबे समय तक नहीं टिक सकता।
4. अपराध और छल की प्रवृत्ति का विस्तार होता है
जब भरोसे का मूल्य घटता है,
तो छल सस्ता और सामान्य बन जाता है।
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समाज को क्या करना चाहिए?—विश्वास का पुनर्निर्माण
आज आवश्यकता है कि समाज में भरोसे को पुनर्जीवित किया जाए।
इसके लिए—
1. संवाद बढ़ाएं
जहाँ संवाद खुला होता है, वहाँ संदेह की दीवारें नहीं बनतीं।
2. वादे छोटे करें, निभाने की क्षमता बड़ी रखें
लोग बड़े वादे करके छोटे निकल आते हैं;
यह भरोसे की सबसे बड़ी हत्या है।
3. पारदर्शिता अपनाएँ
सच्चाई कभी धोखा नहीं देती, लेकिन धोखा हमेशा सच्चाई को मारता है।
4. भावनाओं का मूल्य समझें
किसी का दिल जीतना कठिन है, पर उसे तोड़ना आसान।
समाज को सहजता नहीं, संवेदनशीलता चुननी होगी।
5. भरोसे को कमजोरी नहीं, शक्ति मानें
जिस समाज में विश्वास जीवित है,
वह किसी भी संकट से पार हो सकता है.
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निष्कर्ष—भरोसा मत छोड़िए, भरोसे का चुनाव सही कीजिए
भरोसे की समस्या भरोसा करने में नहीं है—
समस्या गलत व्यक्ति पर भरोसा करने में है।
इसलिए रोना बंद करें,
सही लोगों को पहचानें,
और अपने विश्वास को योग्य व्यक्तियों में निवेश करें।
यदि समाज के हर व्यक्ति में भरोसे की थोड़ी-सी रोशनी बची रहे,
तो यह रोशनी मिलकर पूरे राष्ट्र को प्रकाशित कर सकती है।
अंततः—
भरोसा टूटा नहीं करता,
उसे तोड़ने वाले लोग छोटे पड़ जाते हैं।
और समाज तब ही महान बनता है
जब भरोसा उसके लोगों के दिलों में जीवित रहता है—
न कि उनकी आँखों के आँसुओं में।
भीम प्रज्ञा अलर्ट
“समय सबका इम्तिहान लेता है। जो काम में ईमान रखते हैं, वे जीतते है और जो बहाने ढूंढते हैं, वे पीछे छूटते जाते हैं।”
