संपादकीय @ Advocate Haresh panwar
*आलोचना के बीच स्थिर रहना ही सच्ची शिक्षा का प्रमाण*
आधुनिक समाज में मनुष्य हर पल किसी न किसी मूल्यांकन से गुजर रहा है। कभी मंच पर बोलते हुए, कभी कार्यस्थल पर काम करते हुए, कभी सोशल मीडिया पर अपनी राय रखते हुए—हर जगह प्रशंसा के साथ आलोचना भी सामने आ जाती है। अक्सर देखा जाता है कि लोग आलोचना सुनते ही या तो अपना आत्मविश्वास खो बैठते हैं या फिर दूसरों को संतुष्ट करने के लिए अपने मूल विचारों और मूल्यों से समझौता कर लेते हैं। यही वह बिंदु है जहां शिक्षा की वास्तविक भूमिका सामने आती है। सच्ची शिक्षा मनुष्य को केवल बोलना या तर्क देना नहीं सिखाती, बल्कि उसे आलोचना के शोर में भी शांत और स्थिर रहना सिखाती है। यहां यदि मैं बोलूंगा तो फिर कहोगी कि बोलता है।
आज शिक्षा को हमने डिग्री, अंक और पद तक सीमित कर दिया है, जबकि उसका वास्तविक उद्देश्य व्यक्ति के भीतर आत्मबोध पैदा करना है। जब किसी व्यक्ति को यह स्पष्ट हो जाता है कि वह कौन है, उसकी सोच क्या है और उसकी दिशा क्या है, तब बाहरी टिप्पणियाँ उसे आसानी से विचलित नहीं कर पातीं। आत्मविश्वास का जन्म इसी स्पष्टता से होता है। यह आत्मविश्वास अहंकार नहीं होता, क्योंकि अहंकार दूसरों की बात सुनने से इनकार करता है, जबकि आत्मविश्वास दूसरों की बात सुनकर भी स्वयं पर भरोसा बनाए रखता है।
अक्सर आलोचना से डरने का कारण स्वयं को पूरी तरह न जानना होता है। जब व्यक्ति अपने अस्तित्व, क्षमताओं और सीमाओं को नहीं समझता, तब हर नकारात्मक टिप्पणी उसे भीतर तक हिला देती है। शिक्षा का असली काम इसी डर को दूर करना है। वह हमें यह सिखाती है कि हर सुनी हुई बात सच नहीं होती और हर असहमति हमारे अस्तित्व पर हमला नहीं होती। शिक्षित व्यक्ति आलोचना को व्यक्तिगत अपमान नहीं, बल्कि एक विचार के रूप में ग्रहण करता है और विवेक से तय करता है कि उसमें से क्या स्वीकार करना है और क्या छोड़ देना है।
आज के समय में समाज को अच्छे वक्ताओं से अधिक अच्छे श्रोताओं की आवश्यकता है। सच्ची शिक्षा वही है जो व्यक्ति को ऐसा श्रोता बनाती है, जो असहमति में भी शांत रहे, जो दूसरे की बात पूरी सुने और जो प्रतिक्रिया देने से पहले सोच सके। जब कोई व्यक्ति विपरीत परिस्थितियों में भी संतुलन बनाए रखता है, बिना उग्र हुए या टूटे बिना, तब यह स्पष्ट हो जाता है कि उसकी शिक्षा केवल किताबों तक सीमित नहीं रही, बल्कि जीवन की समझ में बदल चुकी है।
शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य मनुष्य को मानसिक रूप से इतना मजबूत बनाना है कि वह न तो बेवजह प्रशंसा में बहक जाए और न ही अनावश्यक आलोचना में टूट जाए। ऐसा व्यक्ति जानता है कि उसकी पहचान दूसरों की राय से नहीं, बल्कि उसके चरित्र, ज्ञान और कर्मों से तय होती है। जब यह समझ विकसित हो जाती है, तब व्यक्ति आलोचना के बीच भी अपनी दिशा नहीं खोता।
ऐसी शिक्षा का प्रभाव केवल व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरे समाज में दिखाई देता है। जब लोग एक-दूसरे की बात सुनना सीखते हैं, तो मतभेद संघर्ष में नहीं बदलते। संवाद बढ़ता है, समझ विकसित होती है और समाज अधिक सहनशील बनता है। आलोचना तब विनाश का कारण नहीं बनती, बल्कि सुधार और प्रगति का माध्यम बन जाती है।
अंततः यह कहा जा सकता है कि शिक्षा का असली मापदंड यही है कि व्यक्ति आलोचना के बीच कितना स्थिर रह पाता है। जो व्यक्ति कठिन समय में भी शांत रहकर दूसरों की बात सुन सकता है, अपने आत्मविश्वास को बनाए रख सकता है और विवेकपूर्ण निर्णय ले सकता है, वही वास्तव में शिक्षित है। ऐसी शिक्षा ही व्यक्ति को भीतर से मजबूत बनाती है और समाज को शांति, समझ और प्रगति की ओर ले जाती है।
*भीम प्रज्ञा अलर्ट*
जो व्यक्ति दूसरों की बात सुनते हुए भी अपने विचारों की जड़ें मजबूत रखता है, वही जीवन के हर तूफ़ान में संतुलन और सम्मान दोनों बचा लेता है।
